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छुआछूत का भेद-भाव मिटाने से ही दिल पर पड़ेगा ईश्वर के प्रकाश का प्रतिबिम्ब : रामकृष्ण परमहंस

छुआछूत का भेद-भाव मिटाने से ही दिल पर पड़ेगा ईश्वर के प्रकाश का प्रतिबिम्ब : रामकृष्ण परमहंस

छुआछूत और ऊंच-नीच की भावना से दूर रहें-Image/shutterstock

छुआछूत और ऊंच-नीच की भावना से दूर रहें-Image/shutterstock

Motivational Story: महापुरुषों के प्रेरक प्रसंगों (Motivational story) पर अगर अमल किया जाये, तो ये साधारण (Normal) मनुष्य को भी समाज में विशेष व्यक्ति का दर्जा दिला सकते हैं.

  • News18Hindi
  • Last Updated :

    Motivational story: संतों, ज्ञानियों और महापुरुषों के प्रेरक प्रसंगों (Motivational story) पर अगर अमल किया जाये, तो ये साधारण मनुष्य को भी समाज में विशेष व्यक्ति का दर्जा दिला सकते हैं. ऐसे ही महापुरुष रामकृष्ण परमहंस (Ramakrishna Paramhansa) भी रहे हैं. जिनके सानिध्य में आकर नरेन्द्र नाम का एक साधारण (Normal) बालक, स्वामी विवेकानंद के तौर पर समाज में प्रसिद्ध हुआ. प्रेरक प्रसंग के इस क्रम में आज हम आपको रामकृष्ण परमहंस के प्रेरित करने वाले एक प्रसंग के बारे में बताते हैं.

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    प्रेरक प्रसंग

    एक समय की बात है रामकृष्ण परमहंस, तोतापुरी नाम के एक संत के साथ ईश्वर व आध्यात्म पर चर्चा कर रहे थे. ठंड का मौसम था और शाम हो चली थी. इसलिए दोनों एक जलती हुई धूनी के समीप बैठे हुए थे. उस समय बगीचे का माली भी वहां कुछ काम कर रहा था. जब माली को भी ठंड का अहसास हुआ तो उसको भी आग जलाने की ज़रुरत महसूस हुई और उसने तोतापुरी जी द्वारा जलाई गयी धूनी में से एक लकड़ी का एक जलता हुआ टुकड़ा उठा लिया.

    इस पर तोतापुरी जी माली पर जोर से चिल्लाते हुए बोले, “धूनी छूने की तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई? तुमको पता नहीं कि ये कितनी पवित्र है.”? इसके बाद उन्होंने माली को दो चांटे मार दिए. ये सब देख कर पास बैठे रामकृष्ण परमहंस मुस्कुराने लगे.  जिसे देख कर तोतापुरी और भी ज्यादा खिन्न हो गए. उन्होंने रामकृष्ण जी से कहा, ”आप हंस रहे हैं, यह आदमी कभी पूजा-पाठ नहीं करता है और कभी भी भगवान का भजन नहीं गाता है. फिर भी इसने मेरे द्वारा जलाई गई पवित्र धूनी को अपने गंदे हाथों से छुआ. इसीलिए मैंने उसे ये दंड दिया.”

    यह सुनकर रामकृष्ण परमहंस ने तोतापुरी से कहा, ”मुझे तो पता ही नहीं था कि कोई चीज छूने मात्र से अपवित्र हो जाती है. अभी कुछ ही क्षण पहले आप ही तो हमें “एको ब्रह्म द्वितीयो नास्ति” का पाठ पढ़ा  रहे थे. आप ही तो समझा रहे थे कि ये सारा संसार ब्रह्म के प्रकाश-प्रतिबिम्ब के अलावा और कुछ भी नहीं है. अभी इतनी जल्दी आप अपने माली के धूनी स्पर्श कर देने मात्र से अपना सारा ज्ञान भूल गए और उसे मारने तक लगे. भला मुझे इस पर हंसी नहीं आएगी तो और क्या होगा?” तोतापुरी कुछ बोल पाते इससे पहले परमहंस ने गंभीरता से कहा, ” इसमें आपका कोई दोष नहीं है, आप जिससे हारे हैं वो कोई मामूली शत्रु नहीं है. वह आपके अन्दर का अहंकार है, जिससे जीत पाना आसान नहीं है.” ये सुनकर तोतापुरी ने अपनी गलती समझी और मान भी ली. इसके बाद  उन्होंने सौगंध खायी कि अब वो अपने अहंकार को त्याग देंगे और कभी भी छुआछूत और ऊंच-नीच का भेद-भाव नहीं करेंगे.

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    ये शिक्षा मिलती है

    स्वामी रामकृष्ण परमहंस का उपदेश है कि किसी भी व्यक्ति को, चाहे वो किसी भी कुल का हो, चाहे वो धनवान हो या निर्धन, कभी ये नहीं भूलना चाहिए कि हम सबको बनाने वाला एक ही है. हम सभी परमात्मा की संतान हैं और एक सामान हैं. जिस प्रकार मैले शीशे में सूरज की किरणों का प्रतिबिम्ब नहीं पड़ता है, उसी प्रकार यदि  किसी व्यक्ति का अंतः करण छुआछूत और ऊंच -नीच जैसे भेद-भाव से भरा हुआ है , तो उसके हृदय पर ईश्वर के प्रकाश का प्रतिबिम्ब नहीं पड़ सकता है. (Disclaimer: इस लेख में दी गई जानकारियां और सूचनाएं सामान्य मान्यताओं पर आधारित हैं. Hindi news18 इनकी पुष्टि नहीं करता है. इन पर अमल करने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से संपर्क करें.)

    Tags: Motivational Story, Religion

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