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Navratri 2019: करणी माता मंदिर का जरूर करें दर्शन, मिलता है चूहों का जूठा प्रसाद

करणी माता को मां जगदम्बे का अवतार माना जाता है. बताया जाता है कि करणी माता का जन्म 1387 में एक चारण परिवार में हुआ था.

करणी माता को मां जगदम्बे का अवतार माना जाता है. बताया जाता है कि करणी माता का जन्म 1387 में एक चारण परिवार में हुआ था.

राजस्थान के ऐतिहासिक नगर बीकानेर से लगभग 30 किलोमीटर दूर देशनोक में करणी माता का मंदिर स्थित है. इस मंदिर में 20 हजार चूहे रहते हैं.

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    राजस्थान ऐतिहासिक धरोहरों और चमत्कारिक मंदिरों के लिए पूरी दुनिया में मशहूर है. राजस्थान में स्थित करणी माता का मंदिर भी बहुत प्रसिद्ध है. आपको बता दें कि इस मंदिर में भक्तों से ज्यादा काले चूहे नजर आते हैं. मान्यता है कि नवरात्रि पर इस मंदिर के दर्शन करने से भक्तों की मनोकामना पूरी होती है. नवरात्रि शुरू हो चुकी है और ऐसे में इस मंदिर में भक्तों का तांता लगा नजर आता है. वैसे तो साल के किसी भी समय आप यहां जा सकते हैं लेकिन नवरात्रि पर इसका एक अलग ही महत्व है. यहां चूहों को 'काबा' कहा जाता है और इन काबाओं को बाकायदा दूध, लड्डू और अन्य खाने-पीने की चीजें परोसी जाती हैं.

    भक्तों को चूहों का जूठा प्रसाद मिलता है

    माना जाता है कि इस मंदिर में दर्शन के लिए आने वाले श्रद्धालुओं की हर मुराद पूरी होती है. इसे चूहों वाली माता का मंदिर भी कहा जाता है. राजस्थान के ऐतिहासिक नगर बीकानेर से लगभग 30 किलोमीटर दूर देशनोक में करणी माता का मंदिर स्थित है. करणी माता का मंदिर एक ऐसा मंदिर है, जहां पर 20 हजार चूहे रहते हैं और मंदिर में आने वाले भक्तों को चूहों का जूठा किया हुआ प्रसाद ही मिलता है. आश्चर्य की बात यह है कि इतने चूहे होने के बाद भी मंदिर में बिल्कुल भी बदबू नहीं आती. यहां तक कि आज तक कोई भी बीमारी नहीं फैली. चूहों का जूठा प्रसाद खाने से कोई भी भक्त बीमार नहीं हुआ.

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    रिघुबाई को करणी माता के नाम से पूजने लगे

    करणी माता को मां जगदम्बे का अवतार माना जाता है. बताया जाता है कि करणी माता का जन्म 1387 में एक चारण परिवार में हुआ था. उनका बचपन का नाम रिघुबाई था. रिघुबाई की शादी साठिका गांव के किपोजी चारण से हुई थी लेकिन शादी के कुछ समय बाद ही उनका मन सांसारिक जीवन से उठ गया. बाद में रिघुबाई ने किपोजी चारण की शादी अपनी छोटी बहन गुलाब से करवाकर खुद को माता की भक्ति और लोगों की सेवा में लगा दिया था. जनकल्याण, अलौकिक कार्य और चमत्कारिक शक्तियों के कारण रिघुबाई को करणी माता के नाम से स्थानीय लोग पूजने लगे.

    करणी माता बीकानेर राजघराने की कुलदेवी भी हैं

    कहते हैं कि करणी माता 151 साल तक जीवित रहीं. वर्तमान में जहां ये मंदिर स्थित है, वहां पर एक गुफा में करणी माता अपनी ईष्ट देवी की पूजा किया करती थीं. ये गुफा आज भी मंदिर परिसर में ही स्थित है. कहते हैं करणी माता वर्ष 1538 को ज्योतिर्लीन हुई थीं. उनके ज्योतिर्लीन होने के पश्चात भक्तों ने उनकी मूर्ति की स्थापना करके उनकी पूजा शुरू कर दी, जो की अब भी जारी है. करणी माता बीकानेर राजघराने की कुलदेवी भी हैं. कहते है की उनके ही आशीर्वाद से बीकानेर और जोधपुर रियासत की स्थापना हुई थी. करणी माता के वर्तमान मंदिर का निर्माण बीकानेर रियासत के महाराजा गंगा सिंह ने बीसवीं शताब्दी के शुरुआत में करवाया था.

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    संगमरमर के मुख्य द्वार पर की गई शानदार कारीगरी

    इस मंदिर में चूहों के अलावा, संगमरमर के मुख्य द्वार पर की गई शानदार कारीगरी, मुख्य द्वार पर लगे चांदी के बड़े-बड़े किवाड़, माता के सोने के छत्र और चूहों के प्रसाद के लिए रखी चांदी की बहुत बड़ी परात भी मुख्य आकर्षण का केन्द्र हैं. करणी माता के मंदिर के अंदर हजारों चूहे घूमते रहते हैं. मंदिर के अंदर प्रवेश करते ही हर जगह चूहे ही चूहे नजर आते हैं. चूहों की अधिकता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है की मंदिर के अंदर मुख्य प्रतिमा तक पहुंचने के लिए आपको अपने पैर घसीटते हुए जा

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