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Navratri 2019: नवरात्रि पर करें नैना देवी मंदिर के दर्शन, नेत्र रोगों से मिल जाती है मुक्ति

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Updated: October 3, 2019, 4:10 AM IST
Navratri 2019: नवरात्रि पर करें नैना देवी मंदिर के दर्शन, नेत्र रोगों से मिल जाती है मुक्ति
उत्तराखंड के नैनीताल में नैनी झील के किनारे स्थित नैना देवी मंदिर

नैनी झील के पास देवी सती के नेत्र गिरे थे. इसी से प्रेरित होकर इस मंदिर की स्‍थापना की गई है. कहते हैं कि इस मंदिर के दर्शन करने से नेत्र रोगों से मुक्ति मिल जाती है.

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  • Last Updated: October 3, 2019, 4:10 AM IST
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नैनीताल (Nainital) में नैनी झील के उत्तरी किनारे पर नैना देवी (Naina Devi) मंदिर स्थित है. 1880 में भूस्‍खलन में यह मंदिर बिल्कुल नष्‍ट हो गया था. बाद में इसे दोबारा बनाया गया. यहां सती के शक्ति रूप की पूजा की जाती है. वैसे तो इस मंदिर में हर समय भक्तों का तांता लगा रहता है लेकिन नवरात्रि पर इसकी महिमा अलग ही दिखती है. मंदिर में दो नेत्र हैं जो नैना देवी को दर्शाते हैं.

दरअसल, जब शिव सती की मृत देह को लेकर कैलाश पर्वत जा रहे थे, तब जहां-जहां उनके शरीर के अंग गिरे वहां-वहां शक्तिपीठों की स्‍थापना हुई. नैनी झील के पास देवी सती के नेत्र गिरे थे. इसी से प्रेरित होकर इस मंदिर की स्‍थापना की गई है. कहते हैं कि नवरात्रि पर इस मंदिर के दर्शन करने से नेत्र रोगों से मुक्ति मिल जाती है.

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दक्ष प्रजापति की पुत्री सती का विवाह शिव से हुआ था

पौराणिक कथा के अनुसार दक्ष प्रजापति की पुत्री सती का विवाह शिव से हुआ था. शिव को दक्ष प्रजापति पसंद नहीं करते थे लेकिन वह देवताओं के आग्रह को टाल नहीं सकते थे, इसलिए उन्होंने अपनी पुत्री का विवाह न चाहते हुए भी शिव के साथ कर दिया था. एक बार दक्ष प्रजापति ने सभी देवताओं को अपने यहां यज्ञ में बुलाया लेकिन अपने दामाद शिव और बेटी सती को निमंत्रण तक नहीं दिया.

सती यज्ञ के हवनकुण्ड में कूद पड़ीं

सती हठ कर इस यज्ञ में पहुंची. जब उसने हरिद्वार स्थित कनरवन में अपने पिता के यज्ञ में सभी देवताओं का सम्मान और अपने पति और अपना निरादर होते हुए देखा तो वह अत्यन्त दुखी हो गई. यह अपमान देख सती यज्ञ के हवनकुण्ड में कूद पड़ीं. जब शिव को यह ज्ञात हुआ कि सती हवनकुंड में समा गई हैं तो उनके क्रोध का पारावार न रहा. उन्होंने अपने गणों के द्वारा दक्ष प्रजापति के यज्ञ को नष्ट-भ्रष्ट कर डाला.
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नयनों की अश्रुधार ने यहां पर ताल का रूप ले लिया

सभी देवी-देवता शिव के इस रौद्र रूप को देखकर सोच में पड़ गए कि शिव प्रलय न कर डालें. देवी-देवताओं ने महादेव शिव से प्रार्थना की और उनके क्रोध को शांत किया. दक्ष प्रजापति ने भी शिव से क्षमा मांगी. शिव ने इन्हें क्षमा तो कर दिया लेकिन सती के जले हुए शरीर को देखकर उनका वैराग्य उमड़ पड़ा. उन्होंने सती के जले हुए शरीर को कंधे पर डालकर आकाश-भ्रमण करना शुरू कर दिया. ऐसी स्थिति में जहां-जहां पर मां सती के शरीर के अंग गिरे वहां-वहां पर शक्ति पीठ हो गया. जहां पर सती के नयन गिरे थे, वहीं पर नैना देवी के रूप में उनकी पूजा की जाती है. मान्यता है कि नयनों की अश्रुधार ने यहां पर ताल का रूप ले लिया.

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First published: October 2, 2019, 7:40 PM IST
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