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    Navratri 2020: 9 शक्तिपीठों में से एक है मां तारा शक्तिपीठ, जानिए महत्‍व

    शक्तिपीठ मां तारापीठ मंदिर. Image Credit /Instagram #tarapith
    शक्तिपीठ मां तारापीठ मंदिर. Image Credit /Instagram #tarapith

    नवरात्रि 2020: नवरात्रि (Navratri) का हर दिन मां दुर्गा (Maa Durga) को समर्पित है. नवरात्रि के नौ दिनों तक दुर्गा मां के अलग-अलग नौ रूपों की पूजा की जाती है. इस दौरान नौ दिनों तक घरों, मन्दिरों में पूजन-अर्चन कर भक्त मां भगवती से आशीष प्राप्त करते हैं.

    • News18Hindi
    • Last Updated: October 21, 2020, 11:00 PM IST
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    नवरात्रि (Navratri) का हर दिन मां दुर्गा को समर्पित है. नवरात्रि के नौ दिनों तक दुर्गा मां के अलग-अलग नौ रूपों की पूजा की जाती है. नवरात्रि के दौरान नौ दिनों तक घरों, मन्दिरों में विधिविधान से पूजन-अर्चन कर भक्त मां भगवती से आशीष प्राप्त करते हैं. मान्यता है कि नवरात्रि में मां दुर्गा के अलग-अलग स्वरूपों की पूजा करने से विशेष कृपा प्राप्त होती है. हवन और पूजा पाठ करने से न केवल मानसिक शक्ति मिलती है, बल्कि इससे विचारों में भी शुद्धि आती है. प्रत्येक वर्ष नवरात्रि के साथ एक नए जोश का आगाज माना जाता है, क्योंकि उसके बाद से एक के बाद एक त्योहारों का अम्बार लग जाता है.

    शक्तिपीठ की कहानी
    जब माता सती ने पिता के द्वारा भगवान शिव के अपमान पर यज्ञ कुंड में कूदकर अपनी जान दे दी, तब भगवान शिव, माता के मृत शरीर को कंधे पर लेकर महातांडव करने लगे और ब्रह्मांड को विनाश करने पर आतुर हो गए. ब्रह्मांड को बचाने के लिए भगवान विष्णु ने माता सती के शव को अपने चक्र से टुकड़ों में काट दिया. जहां-जहां माता सती के शरीर के टुकड़े वस्त्र या आभूषण गिरे, वहां-वहां शक्तिपीठ अस्तित्व में आया हैं. ये शक्तिपीठ पूरे भारतीय उपमहाद्वीप में फैले हैं. देवी पुराण में 51 शक्तिपीठ बताए गए हैं.

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    शक्तिपीठ मां तारापीठ मंदिर
    51 शक्तिपीठों में से पांच शक्तिपीठ पश्चिम बंगाल के बीरभूम जिले में है जो बकुरेश्वर, नालहाटी, बन्दीकेश्वरी, फुलोरा देवी और तारापीठ के नाम से विख्यात है. इनमें तारापीठ सबसे प्रमुख धार्मिक स्थल और सिद्धपीठ हैं. पश्चिम बंगाल के वीरभूम जिला में रामपुरहाट से 8 किमी की दूरी पर द्वारका नदी के तट पर मां तारा का प्रसिद्ध सिद्धपीठ है. पौराणिक मान्यताओं के अनुसार इस महातीर्थ में माता सती के दाहिनी आंख की पुतली का तारा गिरा था. इसलिए इस धार्मिक स्थल को नयन तारा भी कहते हैं और इसी को लेकर मंदिर का नाम तारापीठ पड़ा और उसी के नाम पर इस स्थान को तारापीठ कहा जाने लगा.

    शारदीय नवरात्र में नौ दिनों तक चलने वाले नवरात्र पर्व में श्रद्धालु बड़ी संख्या में यहां माता के दर्शन के लिए आते हैं. नवरात्रि में अष्टमी के दिन मां तारा की तीन बार आरती होती है, जबकि पूरे साल दो बार आरती होती है. विजया दशमी के दो दिन बाद त्रयोदशी के दिन मां तारा को गर्भ गृह से बाहर मंदिर परिसर में लाकर उनकी पूजा की जाती हैं. इस मंदिर को लेकर यह भी मान्यता है कि मां तारा की आराधना से लोगों को हर बीमारी से मुक्ति मिलती है.

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    सिद्ध पुरुष वामाखेपा
    तारापीठ साधना का केंद्र भी है और इसकी वजह से यहां साधु-संत श्रद्धा के साथ साधना करते हैं. तारापीठ धाम की खासियत यहां का महाश्मशान है जो मंदिर से थोड़ा दूर ब्रह्माक्षी नदी के किनारे स्थित हैं. महाश्मशान में वामाखेपा और उनके शिष्य ताराखेपा की साधनाभूमि हैं. इन्हीं दोनों की साधनाभूमि होने के चलते तारापीठ को सिद्धपीठ के रूप में जाना गया हैं. ऐसी मान्यता है कि वामाखेपा यहां मां तारा को अपने हाथों से भोग खिलाते थे. इस संत की याद में यहां एक मंदिर बनाया गया हैं. इन्हें लोग तारापीठ का पागल संत के नाम से भी जानते हैं. (Disclaimer: इस लेख में दी गई जानकारियां और सूचनाएं सामान्य जानकारी पर आधारित हैं. Hindi news18 इनकी पुष्टि नहीं करता है. इन पर अमल करने से पहले संबधित विशेषज्ञ से संपर्क करें.)
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