Navratri 2020: नवरात्रि के पहले दिन करें देवी शैलपुत्री की पूजा, जानें उनसी जुड़ी पौराणिक कथा

देवी शैलपुत्री की सवारी नंदी बैल होती है, जो स्वंय महादेव की भी सवारी मानी जाती है.
देवी शैलपुत्री की सवारी नंदी बैल होती है, जो स्वंय महादेव की भी सवारी मानी जाती है.

हिन्दू धर्म के अनुसार नवरात्रि (Navratri) के प्रथम दिन, घटस्थापना के बाद मां शैलपुत्री (Maa Shailputri) की पूजा करने का विधान है. दरअसल मां दुर्गा (Maa Durga) के नौ रूपों में पहला रूप देवी शैलपुत्री का माना गया है, इसलिए इस दिन भक्तगण उनकी पूजा-अर्चना करते हैं.

  • News18Hindi
  • Last Updated: October 6, 2020, 5:33 PM IST
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Navratri 2020: वर्ष 2020 में शरद नवरात्रि (Sharad Navratri) 17 अक्टूबर, शनिवार से प्रारंभ हो रही है और 10 दिनों तक चलने वाला देवी शक्ति (Devi Shakti) को समर्पित ये पर्व 26 अक्टूबर, सोमवार तक देशभर में हर्षोल्लास के साथ मनाया जाएगा. इस बार अधिकमास (Adhik Maas 2020) लगने के कारण शारदीय नवरात्रि एक महीने की देरी से शुरू होगी. हिंदू पंचांग के अनुसार हर वर्ष पितृपक्ष के समाप्ति के बाद अगले दिन से ही शारदीय नवरात्रि शुरू हो जाती है लेकिन इस बार अधिक मास होने के कारण पितरों की विदाई के बाद नवरात्रि का त्योहार शुरू नहीं हो सका. इस बार नवरात्रि 17 अक्टूबर 2020 से शुरू होकर 25 अक्टूबर तक चलेगी. हिंदू धर्म में नवरात्रि का विशेष महत्व होता है. नवरात्रि के नौ दिनों में मां दुर्गा के अलग-अलग स्वरूपों की पूजा-अर्चना की जाती है. इस पावन पर्व की शुरुआत घटस्थापना के साथ होती है, जिसका महत्व विशेष माना गया है.

हिन्दू धर्म के अनुसार नवरात्रि के प्रथम दिन, घटस्थापना के बाद मां शैलपुत्री की पूजा करने का विधान है. दरअसल दुर्गा के नौ रूपों में पहला रूप देवी शैलपुत्री का माना गया है, इसलिए इस दिन भक्तगण उनकी पूजा-अर्चना करते हैं. मां दुर्गा का ये स्वरूप बेहद सुंदर होता है. जिनके माथे पर अर्ध चंद्र होता है, इसलिए माना जाता है कि देवी का ये स्वरूप चंद्रमा का प्रतिनिधित्व करता है. ऐसे में उनकी उपासना करने से, व्यक्ति चंद्रमा के सभी प्रकार के दोषों और दुष्प्रभाव से अपना बचाव कर सकता है. देवी के दाहिने हाथ में त्रिशूल और बाएं हाथ में कमल होता है. देवी शैलपुत्री की सवारी नंदी बैल होती है, जो स्वंय महादेव की भी सवारी मानी जाती है.

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पूजा मंत्र
-घटस्थापना हेतु मंत्र

ॐ विष्णुः विष्णुः विष्णुः, अद्य ब्राह्मणो वयसः परार्धे श्रीश्वेतवाराहकल्पे जम्बूद्वीपे भारतवर्षे, अमुकनामसम्वत्सरे
आश्विनशुक्लप्रतिपदे अमुकवासरे प्रारभमाणे नवरात्रपर्वणि एतासु नवतिथिषु
अखिलपापक्षयपूर्वक-श्रुति-स्मृत्युक्त-पुण्यसमवेत-सर्वसुखोपलब्धये संयमादिनियमान् दृढ़ं पालयन् अमुकगोत्रः
अमुकनामाहं भगवत्याः दुर्गायाः प्रसादाय व्रतं विधास्ये

-देवी शैलपुत्री की पूजा हेतु मंत्र

ॐ देवी शैलपुत्र्यै नमः
वन्दे वाञ्छितलाभाय चन्द्रार्धकृतशेखराम्
वृषारुढां शूलधरां शैलपुत्रीं यशस्विनीम्

देवी शैलपुत्री से जुड़ी धार्मिक व पौराणिक कथा
शैलपुत्री का संस्कृत अर्थ ‘पर्वत की बेटी’ होता है. इसलिए मां दुर्गा के इस स्वरूप को पर्वत की बेटी माना गया है. इस संदर्भ में आपको कई पौराणिक कथाएं सुनने को मिल जाएंगी. उन्हीं में से एक कथा के अनुसार, माना जाता है कि मां शैलपुत्री ने अपने पिछले जन्म में भगवान शिव की अर्धांगिनी यानि सती और दक्ष की पुत्री के रूप में जन्म लिया था. उस दौरान उनके पिता दक्ष ने एक महायज्ञ का आयोजन किया, जिसमें उन्होंने सभी लोकों के समस्त देवताओं को तो निमंत्रित किया लेकिन महादेव को नहीं बुलाया. बावजूद इसके पिता द्वारा आयोजित महायज्ञ में जाने के लिए देवी सती की व्याकुल देख, महादेव ने उन्हें यज्ञ में जाने की अनुमति दी.

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महायज्ञ में पहुंचकर देवी सती ने वहां, महादेव के प्रति तिरस्कार का भाव देखा. उन्होंने पिता दक्ष से भी अपने पति (महादेव) के प्रति अपमानजनक शब्द सुनें, जिससे वो बहुत आहत हुईं. समस्त देवी-देवताओं के बीच हुए अपने पति का अपमान, देवी सती सह न सकीं और उन्होंने उसी महायज्ञ में स्वयं को जलाकर भस्म कर दिया. माना जाता है कि अपनी अर्धांगिनी के इस तरह भस्म होने पर, महादेव अत्यंत क्रोधित हुए और उन्होंने उस यज्ञ को ही बाद में विध्वंस कर दिया था. शास्त्रों के अनुसार देवी सती ने ही शैलराज हिमालय की पुत्री के रूप में दोबारा जन्म लिया, जिसका नाम शैलपुत्री पड़ा. हिमालय के राजा का नाम हिमावत होने के चलते, उन्हें देवी हेमवती के नाम से भी जाना गया. (साभार- Astrosage.com)
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