Navratri 2021: शिव तांडव में यहां गिरे थे मां के अधर, अबुर्दा देवी दर्शन से होते हैं कष्ट दूर 

Navratri 2021: अर्बुदा देवी माउंटआबू की अधिष्ठात्री देवी हैं. 

Navratri 2021: अर्बुदा देवी माउंटआबू की अधिष्ठात्री देवी हैं. 

Navratri 2021: अर्बुदा देवी (Arbuda Devi) मां दुर्गा (Maa Durga) के नौ रूपों में से कात्यायनी (Katyayani Devi) का ही रूप हैं, जिनकी विशेष पूजा नवरात्रि के छठवें दिन होती है.

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  • Last Updated: April 18, 2021, 2:04 PM IST
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Navratri 2021: नवदुर्गा में आज मां के कात्यायनी (Maata Katyayani) रूप की पूजा की जाती है. माउंट आबू में अर्बुदा देवी (Arbuda Devi) मां दुर्गा के नौ रूपों में से कात्यायनी का ही रूप हैं, जिनकी विशेष पूजा नवरात्रि के छठवें दिन होती है. आबू राजस्थान का इकलौता हिल स्टेशन है. इसका नाम माता अर्बुदा देवी के नाम पर ही है. दरअसल, अर्बुदा का अपभ्रंश होकर इसे आबू कहा जाने लगा, जिसे बाद में पहाड़ी क्षेत्र होने के कारण माउंटआबू नाम दिया गया. अर्बुद पर्वत पर मां अर्बुदा देवी का मंदिर है जो देश की 51 शक्तिपीठों (Shakti Pith) में से एक है. अर्बुदादेवी आबू की अधिष्ठात्री देवी हैं.

अर्बुदा देवी मंदिर माउंटआबू से 3 किलोमीटर दूर पहाड़ी पर स्थित है. यह अर्बुदा देवी, अधर देवी, अम्बिका और कात्यायनी देवी के नाम से भी प्रसिद्ध है. समुद्र तल से साढ़े पांच हजार फीट ऊंचा अर्बुद पर्वत यानी अर्बुदांचल पर अर्बुदा देवी का मंदिर हजारों साल पुराना है. यह मंदिर यहां के लोकप्रिय तीर्थ स्थलों में से एक है. मंदिर एक प्राकृतिक गुफा में प्रतिष्ठित है. अर्बुदा देवी मन्दिर में प्रवेश के लिए श्रद्धालुओं को गुफा के संकरे मार्ग में होकर बैठकर जाना पड़ता है. मन्दिर की गुफा के प्रवेश द्वार के समीप एक शिव मन्दिर भी बना है. अष्टमी की रात्रि यहां महायज्ञ होता है जो नवमी के सुबह तक पूर्ण होता है. नवरात्रों में यहां निरंतर दिन-रात अखंड पाठ होता है.

चरणों से दबाकर बासकली का किया संहार 

मां अर्बुदा द्वारा बासकली दैत्य का वध करने की एक पौराणिक कथा है. दानव राजा कली, जिसे बासकली के नाम से भी जाना जाता था. उसने कई सालों तक तपस्या करके शिव को प्रसन्न किया. भोलेनाथ ने प्रसन्न होकर कली को अजेय होने का वरदान दिया. वरदान को पाकर बासकली घमंड से चूर—चूर हो गया. बासकली देवलोक में इंद्र सहित सभी देवताओं को परेशान करने लगा. उसके उत्पात से दुखी होकर देवताओं ने अर्बुदा देवी को प्रसन्न करने के लिए तपस्या की. देवी तीन रूप में प्रकट हुईं. देवताओं ने बासकली से बचाने की प्रार्थना की. मां ने देवताओं और ऋषियों को तथास्तु कहा. भगवान शिव का वरदान पाने वाले बासकली को मां ने अपने चरणों के नीचे दबा कर उसका संहार कर दिया. इसके बाद से अर्बुदा मंदिर के पास स्थित माता के पादुका की पूजा होने लगी.
यह देवी परमार और परिहार जाति के राजपूतों की कुलदेवी कहलाईं.
यह देवी परमार और परिहार जाति के राजपूतों की कुलदेवी कहलाईं.


त्रिदेव ने अंश देकर कात्यायनी को उत्पन्न कियास्कंद पुराण के अर्बुद खंड में माता के चरण पादुका की महिमा खूब गायी गई है. पादुका के दर्शन मात्र से ही मोक्ष यानी सद्गति मिलने की बात भी कही गई है. यह वही चरण पादुका है, जिससे मां ने बासकली का वध किया था. एक ऋषि ने मां भगवती की कठोर तपस्या की थी. जब दानव महिषासुर का संहार करने के लिये, त्रिदेव ब्रह्मा, विष्णु और महेश ने अपने तेज का एक-एक अंश देकर देवी को उत्पन्न किया था, तब महर्षि कात्यायन ने ही सर्वप्रथम इनकी पूजा की थी. इसी वजह से ये कात्यायनी कहलायीं.

मां पार्वती के अधर गिरने से बना शक्तिपीठ



पौराणिक कथाओं के मुताबिक जब भगवान शंकर ने मां पार्वती के शरीर के साथ तांडव शुरू किया था, तो माता पार्वती के होंठ यहीं गिरे थे. तभी से ये जगह अर्बुदा देवी (अर्बुदा मतलब होंठ) यानी अधर देवी के नाम से प्रसिद्ध है. अर्बुद पहाड़ को हिमालय पुत्र भी कहा गया है जो सर्प रूप में आबू पहाड़ को स्थित किए हुए है. नंदी गाय को बचाने के लिए भगवान शिव ने अपने अंगूठे से अर्बुद पर्वत को स्थिर किया था. उल्लेखनीय है कि स्कंद पुराण में एक अर्बुद खंड भी है जिसमें अर्बुदांचल का पूरा जिक्र है.

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मंदिर तक जाने के लिए 365 सीढ़ियां

अर्बुदा देवी मंदिर का निर्माण ठोस चट्टानों से किया गया है और यह भारत में रॉक-कट मंदिरों के सर्वश्रेष्ठ नमूनों में से एक है. सफेद संगमरमर से बना यह मन्दिर एक ऊंची और विशाल पहाड़ी के बीचों-बीच बना है और बहुत भव्य और आकर्षक लगता है. मंदिर तक जाने के लिए 365 सीढ़ियां बनी हैं. रास्ते में सुंदर नजारों की भरमार है और जय माता की बोलों के साथ सीढ़ियां कब ख़त्म हो जाती हैं पता ही नही चलता. ऊपर पहुंचने पर सुंदर दृश्य और शान्ति मन मोह लेती है और थकान पल भर में दूर हो जाती है. पास ही नव दुर्गा, गणेशजी और नीलकंठ महादेव मंदिर भी है. स्कंद पुराण के अर्बुद खंड में माता अर्बुदा देवी को भवतारिणी, दुखहारिणी, मोक्षदायिनी और सर्वफलदायिनी माना गया है.

परमार-परिहार राजपूतों की कुलदेवी

देवी ने अपनी लीला से यज्ञ कुण्ड की ज्वाला से परमार और परिहार राजपूतों के आदि-पुरुषों को प्रकट किया. अतः यह देवी परमार और परिहार जाति के राजपूतों की कुलदेवी कहलाईं. कुछ इतिहासकारों का मानना है कि परमार शासकों की उत्पत्ति 'अग्निकुंड' से माउंट आबू में हुई थी, इस वजह से अर्बुदा देवी अभी भी परमार क्षत्रियों की पैतृक देवी हैं.

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नवरात्रि में होती है विशेष पूजा

अर्बुदा देवी के बारे में यह भी कहा जाता है कि नवरात्रि के दौरान माता के सिर्फ दर्शन करने से ही भक्तों को सारे दुखों से मुक्ति मिल जाती है. नवरात्रि के पूरे नौ दिनों में माता के मंदिर में भक्तों की भीड़ बनी रहती है. नवरात्रि के छटवें दिन मां अर्बुदा यानी कात्यायनी के दर्शन करने के लिए भक्तों की भीड़ जमा होने लगती है. नवरात्रि के बाद भी अर्बुदा देवी की पूजा कई दिनों तक की जाती है. (Disclaimer: इस लेख में दी गई जानकारियां और सूचनाएं सामान्य जानकारी पर आधारित हैं. Hindi news18 इनकी पुष्टि नहीं करता है. इन पर अमल करने से पहले संबधित विशेषज्ञ से संपर्क करें)
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