रविवार को करें सूर्य देव की पूजा, कल्याणकारी सूर्य स्त्रोत के पाठ से मिलेगी जीवन ऊर्जा

सूर्य स्त्रोत में सूर्य देव के कई गोपनीय नामों का वर्णन है (फोटो साभार: instagram/kedarnatemple_)

सूर्य स्त्रोत में सूर्य देव के कई गोपनीय नामों का वर्णन है (फोटो साभार: instagram/kedarnatemple_)

Sunday Worship Surya Dev Chant Surya Strota For Positivity-रविवार को जो जातक व्रत रखकर सूर्य देव की पूजा अर्चना करते हैं उन्हें जीवन में यश एवं सम्मान की प्राप्ति होती है. ऐसे जातकों का वैभव पूरे संसार में होता है.

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Sunday Worship Surya Dev Chant Surya Strota For Positivity- आज रविवार है. हिंदू धर्म में रविवार का दिन सूर्य देव को समर्पित माना जाता है. सूर्य देव को जीवनी शक्ति प्रदान करने वाला माना जाता है. पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, सूर्य से प्राप्त ऊर्जा से ही समस्त संसार का संचालन होता है. रविवार को जो जातक व्रत रखकर सूर्य देव की पूजा अर्चना करते हैं उन्हें जीवन में यश एवं सम्मान की प्राप्ति होती है. ऐसे जातकों का वैभव पूरे संसार में होता है. मान्यता यह भी है कि रविवार के दिन सूर्य देव का व्रत रखने और प्रातः काल सूर्य को जल अर्पित करने से सभी इच्छाएं पूर्ण होती हैं, शरीर निरोगी रहता है और समस्त प्रकार की पीड़ाओं से निजात मिलती है. आज रविवार के दिन हम आपके लिए लेकर आए हैं ऊर्जा स्रोत सूर्य स्तोत्र और सूर्य स्त्रोत. सूर्य रक्षा कवच जहां हर प्रकार की बाधाओं और परेशानियों से जातक की रक्षा करता हैं वहीं सूर्य स्त्रोत जातक का कल्याण करता है. सूर्य स्त्रोत में सूर्य देव के कई गोपनीय नामों का वर्णन है तो आइए पढ़ें सूर्य स्त्रोत और ऊर्जा स्रोत सूर्य स्तोत्र...

सूर्य स्तोत्र :

विकर्तनो विवस्वांश्च मार्तण्डो भास्करो रविः।

लोक प्रकाशकः श्री माँल्लोक चक्षुर्मुहेश्वरः॥
लोकसाक्षी त्रिलोकेशः कर्ता हर्ता तमिस्रहा।

तपनस्तापनश्चैव शुचिः सप्ताश्ववाहनः॥

गभस्तिहस्तो ब्रह्मा च सर्वदेवनमस्कृतः।



एकविंशतिरित्येष स्तव इष्टः सदा रवेः॥

'विकर्तन, विवस्वान, मार्तण्ड, भास्कर, रवि, लोकप्रकाशक, श्रीमान, लोकचक्षु, महेश्वर, लोकसाक्षी, त्रिलोकेश, कर्ता, हर्त्ता, तमिस्राहा, तपन, तापन, शुचि, सप्ताश्ववाहन, गभस्तिहस्त, ब्रह्मा और सर्वदेव नमस्कृत- इस प्रकार इक्कीस नामों का यह स्तोत्र भगवान सूर्य को सदा प्रिय है।' (ब्रह्म पुराण : 31.31-33)

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ऊर्जा स्रोत सूर्य स्तोत्र :

प्रातः स्मरामि खलु तत्सवितुर्वरेण्यं

रूपं हि मंडलमृचोऽथ तनुर्यजूंषि।

सामानि यस्य किरणाः प्रभवादिहेतुं

ब्रह्माहरात्मकमलक्ष्यमचिन्त्यरूपम्‌॥

प्रातर्नमामि तरणिं तनुवाङ्मनोभि-

र्ब्रह्मेन्द्रपूर्वकसुरैर्नुतमर्चितं च।

वृष्टिप्रमोचनविनिग्रहहेतुभूतं

त्रैलोक्यपालनपरं त्रिगुणात्मकं च॥

पापौघशत्रुभयरोगहरं परं च।

तं सर्वलोककलनात्मककालमूर्तिं

गोकण्ठबंधनविमचोनमादिदेवम्‌॥

श्लोकत्रयमिदं भानोः प्रातः प्रातः पठेत्‌ तु यः।

स सर्वव्याधिनिर्मुक्तः परं सुखमवाप्नुयात्‌॥ (Disclaimer: इस लेख में दी गई जानकारियां और सूचनाएं सामान्य मान्यताओं पर आधारित हैं. Hindi news18 इनकी पुष्टि नहीं करता है. इन पर अमल करने से पहले संबधित विशेषज्ञ से संपर्क करें)
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