Parivartini Ekadashi 2020: परिवर्तिनी एकादशी कथा से कटेंगे पाप, मिलेगा पुण्य फल

Parivartini Ekadashi 2020: परिवर्तिनी एकादशी कथा से कटेंगे पाप, मिलेगा पुण्य फल
पीली चीजें भगवान विष्णु को अत्याधिक प्रिय है. इसलिए भगवान विष्णु को पीले फूल और पीले फल का भोग लगाएं.

परिवर्तिनी एकादशी (Parivartini Ekadashi 2020): श्रीकृष्ण कहने लगे कि हे राजन! अब आप सब पापों को नष्ट करने वाली कथा का श्रवण करें. त्रेतायुग में बलि नामक एक दैत्य था. वह मेरा परम भक्त था.

  • News18Hindi
  • Last Updated: August 27, 2020, 6:32 PM IST
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परिवर्तिनी एकादशी (Parivartini Ekadashi 2020): परिवर्तिनी एकादशी व्रत 29 अगस्त रविवार को है. परिवर्तिनी एकादशी भगवान विष्णु के वामन अवतार को समर्पित है. पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, परिवर्तिनी एकादशी के दिन ही योगनिद्रा में नींद के दौरान भगवान विष्णु करवट लेते हैं. यही वजह है इसे परिवर्तिनी एकादशी कहा जाता है.इस दिन भक्त वामन अवतार की पूजा अर्चना करते हैं. हर साल परिवर्तिनी एकादशी भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी को पड़ती है. आइए जानते हैं परिवर्तिनी एकादशी की कथा...
युधिष्ठिर कहने लगे कि हे भगवान! भाद्रपद शुक्ल एकादशी का क्या नाम है? इसकी विधि तथा इसका माहात्म्य कृपा करके कहिए. तब भगवान श्रीकृष्ण कहने लगे कि इस पुण्य, स्वर्ग और मोक्ष को देने वाली तथा सब पापों का नाश करने वाली, उत्तम वामन एकादशी का माहात्म्य मैं तुमसे कहता हूं तुम ध्यानपूर्वक सुनो.

यह पद्मा/परिवर्तिनी एकादशी जयंती एकादशी तथा वामन एकादशी भी कहलाती है. इसका यज्ञ करने से वाजपेय यज्ञ का फल मिलता है. पापियों के पाप नाश करने के लिए इससे बढ़कर कोई उपाय नहीं. जो मनुष्य इस एकादशी के दिन मेरी (वामन रूप की) पूजा करता है, उससे तीनों लोक पूज्य होते हैं. अत: मोक्ष की इच्छा करने वाले मनुष्य इस व्रत को अवश्य करें.

जो कमलनयन भगवान का कमल से पूजन करते हैं, वे अवश्य भगवान के समीप जाते हैं. जिसने भाद्रपद शुक्ल एकादशी को व्रत और पूजन किया, उसने ब्रह्मा, विष्णु सहित तीनों लोकों का पूजन किया. अत: हरिवासर अर्थात एकादशी का व्रत अवश्य करना चाहिए. इस दिन भगवान करवट लेते हैं, इसलिए इसको परिवर्तिनी एकादशी भी कहते हैं.
भगवान के वचन सुनकर युधिष्ठिर बोले कि भगवान! मुझे अतिसंदेह हो रहा है कि आप किस प्रकार सोते और करवट लेते हैं तथा किस तरह राजा बलि को बांधा और वामन रूप रखकर क्या-क्या लीलाएं कीं? चातुर्मास के व्रत की क्या ‍विधि है तथा आपके शयन करने पर मनुष्य का क्या कर्तव्य है. सो आप मुझसे विस्तार से बताइए.



श्रीकृष्ण कहने लगे कि हे राजन! अब आप सब पापों को नष्ट करने वाली कथा का श्रवण करें. त्रेतायुग में बलि नामक एक दैत्य था. वह मेरा परम भक्त था. विविध प्रकार के वेद सूक्तों से मेरा पूजन किया करता था और नित्य ही ब्राह्मणों का पूजन तथा यज्ञ के आयोजन करता था, लेकिन इंद्र से द्वेष के कारण उसने इंद्रलोक तथा सभी देवताओं को जीत लिया.

इस कारण सभी देवता एकत्र होकर सोच-विचारकर भगवान के पास गए. बृहस्पति सहित इंद्रादिक देवता प्रभु के निकट जाकर और नतमस्तक होकर वेद मंत्रों द्वारा भगवान का पूजन और स्तुति करने लगे. अत: मैंने वामन रूप धारण करके पांचवां अवतार लिया और फिर अत्यंत तेजस्वी रूप से राजा बलि को जीत लिया.

इतनी वार्ता सुनकर राजा युधिष्ठिर बोले कि हे जनार्दन! आपने वामन रूप धारण करके उस महाबली दैत्य को किस प्रकार जीता? >
श्रीकृष्ण कहने लगे- मैंने (वामन रूपधारी ब्रह्मचारी) बलि से तीन पग भूमि की याचना करते हुए कहा- ये मुझको तीन लोक के समान है और हे राजन यह तुमको अवश्य ही देनी होगी.

राजा बलि ने इसे तुच्छ याचना समझकर तीन पग भूमि का संकल्प मुझको दे दिया और मैंने अपने त्रिविक्रम रूप को बढ़ाकर यहां तक कि भूलोक में पद, भुवर्लोक में जंघा, स्वर्गलोक में कमर, मह:लोक में पेट, जनलोक में हृदय, यमलोक में कंठ की स्थापना कर सत्यलोक में मुख, उसके ऊपर मस्तक स्थापित किया.

सूर्य, चंद्रमा आदि सब ग्रह गण, योग, नक्षत्र, इंद्रादिक देवता और शेष आदि सब नागगणों ने विविध प्रकार से वेद सूक्तों से प्रार्थना की. तब मैंने राजा बलि का हाथ पकड़कर कहा कि हे राजन! एक पद से पृथ्वी, दूसरे से स्वर्गलोक पूर्ण हो गए. अब तीसरा पग कहां रखूं?

तब बलि ने अपना सिर झुका लिया और मैंने अपना पैर उसके मस्तक पर रख दिया जिससे मेरा वह भक्त पाताल को चला गया. फिर उसकी विनती और नम्रता को देखकर मैंने कहा कि हे बलि! मैं सदैव तुम्हारे निकट ही रहूंगा. विरोचन पुत्र बलि से कहने पर भाद्रपद शुक्ल एकादशी के दिन बलि के आश्रम पर मेरी मूर्ति स्थापित हुई.

इसी प्रकार दूसरी क्षीरसागर में शेषनाग के पष्ठ पर हुई! हे राजन! इस एकादशी को भगवान शयन करते हुए करवट लेते हैं, इसलिए तीनों लोकों के स्वामी भगवान विष्णु का उस दिन पूजन करना चाहिए. इस दिन तांबा, चांदी, चावल और दही का दान करना उचित है. रात्रि को जागरण अवश्य करना चाहिए.

जो विधिपूर्वक इस एकादशी का व्रत करते हैं, वे सब पापों से मुक्त होकर स्वर्ग में जाकर चंद्रमा के समान प्रकाशित होते हैं और यश पाते हैं. जो पापनाशक इस कथा को पढ़ते या सुनते हैं, उनको हजार अश्वमेध यज्ञ का फल प्राप्त होता है. (Disclaimer: इस लेख में दी गई जानकारियां और सूचनाएं सामान्य मान्यताओं पर आधारित हैं. Hindi news18 इनकी पुष्टि नहीं करता है. इन पर अमल करने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से संपर्क करें.)
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