पितृपक्ष 2019: पढ़िए पितृ देव की आरती, जानिए इसका अर्थ

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Updated: September 13, 2019, 10:14 AM IST
पितृपक्ष 2019: पढ़िए पितृ देव की आरती, जानिए इसका अर्थ
व्रत पूर्णिमा और पितृपक्ष: पढ़ें पितृदेव की आरती

पितृपक्ष (Pitrupaksha 2019), श्राद्ध (Shraddha 2019): गरुण पुराण में उल्लेखित है कि पितृ स्तुति और पितृ आरती का विधिवत पाठ करने से पूर्वजों की आत्मा को मुक्ति और संतुष्टि मिलती है साथ ही जातक पर पूर्वजों का आशीर्वाद भी बना रहता है.

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आज 13 सितंबर से पितृपक्ष (Pitrupaksha 2019) की शुरुआत हो गई है. यह 15 दिनों तक चलेगा. इस दौरान लोग अपने पितरों का श्राद्ध (Shraddha 2019) करते हैं. मान्यता है कि श्राद्ध और तर्पण करने से पितरों की आत्मा को शान्ति मिलती है और उनकी तृप्ति होती है. इसलिए इस दौरान यमराज उनकी आत्मा को मुक्ति देते हैं ताकि वो पृथ्वी पर जाकर अपने परिजनों से श्राद्ध ग्रहण कर सकें. आइए जानते हैं इससे जुड़ी कुछ महत्वपूर्ण बातें...

वेबसाइट पत्रिका के हवाले से गरुण पुराण में उल्लेखित है कि पितृ स्तुति और पितृ आरती का विधिवत पाठ करने से पूर्वजों की आत्मा को मुक्ति और संतुष्टि मिलती है साथ ही जातक पर पूर्वजों का आशीर्वाद भी बना रहता है. आइए जानते हैं पूर्वजों की आरती के बारे में...

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पितृ देव की आरती:

अर्चितानाममूर्तानां पितृणां दीप्ततेजसाम् ।

नमस्यामि सदा तेषां ध्यानिनां दिव्यचक्षुषाम्।।

इन्द्रादीनां च नेतारो दक्षमारीचयोस्तथा ।
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सप्तर्षीणां तथान्येषां तान् नमस्यामि कामदान् ।।

मन्वादीनां मुनीन्द्राणां सूर्याचन्द्रमसोस्तथा ।

तान् नमस्याम्यहं सर्वान् पितृनप्सूदधावपि ।।

नक्षत्राणां ग्रहाणां च वाय्वग्न्योर्नभसस्तथा।

द्यावापृथिवोव्योश्च तथा नमस्यामि कृताञ्जलि:।।

देवर्षीणां जनितृंश्च सर्वलोकनमस्कृतान्।

अक्षय्यस्य सदा दातृन् नमस्येsहं कृताञ्जलि:।।

प्रजापते: कश्यपाय सोमाय वरुणाय च ।

योगेश्वरेभ्यश्च सदा नमस्यामि कृताञ्जलि:।।

नमो गणेभ्य: सप्तभ्यस्तथा लोकेषु सप्तसु ।

स्वयम्भुवे नमस्यामि ब्रह्मणे योगचक्षुषे ।।

सोमाधारान् पितृगणान् योगमूर्तिधरांस्तथा ।

नमस्यामि तथा सोमं पितरं जगतामहम् ।।

अग्रिरूपांस्तथैवान्यान् नमस्यामि पितृनहम् ।

अग्नीषोममयं विश्वं यत एतदशेषत:।।

ये तु तेजसि ये चैते सोमसूर्याग्निमूर्तय:।

जगत्स्वरूपिणश्चैव तथा ब्रह्मस्वरूपिण:।।

तेभ्योsखिलेभ्यो योगिभ्य: पितृभ्यो यतमानस:।

नमो नमो नमस्ते मे प्रसीदन्तु स्वधाभुज:।।.

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इस आरती का अर्थ:
जय जय पितर महाराज, मैं शरण पड़यों हूँ थारी ।
शरण पड़यो हूँ थारी बाबा, शरण पड़यो हूँ थारी ।।

आप ही रक्षक आप ही दाता, आप ही खेवनहारे ।
मैं मूरख हूँ कछु नहिं जाणूं, आप ही हो रखवारे ।। जय।।

आप खड़े हैं हरदम हर घड़ी, करने मेरी रखवारी ।
हम सब जन हैं शरण आपकी, है ये अरज गुजारी ।। जय।।

देश और परदेश सब जगह, आप ही करो सहाई ।
काम पड़े पर नाम आपको, लगे बहुत सुखदाई ।। जय।।

भक्त सभी हैं शरण आपकी, अपने सहित परिवार ।
रक्षा करो आप ही सबकी, रटूँ मैं बारम्बार।। जय ।।

जय जय पितर महाराज, मैं शरण पड़यों हूँ थारी ।
शरण पड़यो हूँ थारी बाबा, शरण पड़यो हूँ थारी ।।

Disclaimer: इस लेख में दी गई जानकारियां और सूचनाएं सामान्य मान्यताओं पर आधारित हैं. Hindi news18 इनकी पुष्टि नहीं करता है. इन पर अमल करने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से संपर्क करें.

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First published: September 13, 2019, 8:00 AM IST
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