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नारद मुनि राधा जी से क्यों करते थे ईर्ष्या? भगवान श्रीकृष्ण ने ऐसा तोड़ा उनका अहंकार

राधा और कृष्ण के बीच आध्यात्मिक प्रेम था., Image-Canva

राधा और कृष्ण के बीच आध्यात्मिक प्रेम था., Image-Canva

श्रीकृष्ण और राधा के बीच आध्यात्मिक प्रेम था. इस अटूट प्रेम के कारण ही राधा के बिना श्रीकृष्ण अधूरे माने जाते हैं, इसलि ...अधिक पढ़ें

हाइलाइट्स

श्रीकृष्ण और राधा के प्रेम, त्याग और समर्पण के कई प्रसंग मिलते हैं.
श्रीकृष्ण और राधा के प्रेम को देखकर नारद मुनि को राधा से ईर्ष्या होने लगी थी.
श्रीकृष्ण से पहले राधा का नाम लिया जाता है.

Radha Krishna Story: हम बचपन से राधा कृष्ण की प्रेम लीलाओं को सुनते आ रहे हैं.  हिंदू धर्म ग्रंथों में श्रीकृष्ण और राधा के प्रेम, त्याग और समर्पण के कई प्रसंग मिलते हैं. सभी जानते हैं कि श्रीकृष्ण और राधा के बीच आध्यात्मिक प्रेम था. पंडित इंद्रमणि घनस्याल के अनुसार, इस अटूट प्रेम के कारण ही राधा के बिना श्रीकृष्ण अधूरे माने जाते हैं, इसलिए श्रीकृष्ण से पहले राधा नाम लिया जाता है. आज आपको श्रीकृष्ण और राधा के असीम प्रेम की एक रोचक कथा बताते हैं. 

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नारद मुनि को थी राधा से ईर्ष्या
एक पौराणिक कथा के अनुसार, श्रीकृष्ण और राधा के प्रेम को देखकर नारद मुनि को राधा से ईर्ष्या होने लगी थी. श्रीकृष्ण को भी इस बात की जानकारी थी. एक बार नारद जी श्रीकृष्ण के पास आए. तब श्रीकृष्ण अपना सिर पकड़ कर बैठे थे. तब नारद मुनि ने कृष्ण ने पूछा कि आप इस तरह सिर पकड़कर क्यों बैठे हैं? तब श्रीकृष्ण ने कहा कि उनका सिर दर्द कर रहा है. नारद मुनि ने इसका उपाय पूछा तो श्रीकृष्ण ने कहा कि मेरा सिर दर्द मेरे सबसे बड़े भक्त के हाथों से चरणामृत पीने से दूर हो जाएगा.

नारद मुनि को हुआ अहंकार
तब नारद मुनि विचार करने लगे कि मैं भी तो श्रीकृष्ण का सबसे बड़ा भक्त हूं, लेकिन मैं उनको चरणामृत दूंगा तो मुझे नरक के समान पाप लगेगा. इसके बाद नारद जी के मन में राधा का विचार आया. इसके बाद नारद जी राधा के पास गए और श्रीकृष्ण के बारे में बताया. तब राधा ने एक बर्तन में अपने पैर धोकर चरणामृत नारद जी को दे दिया. 

राधा ने नारद मुनि से कहा, “हे मुनि! मैं नहीं जानती हूं कि मैं श्रीकृष्ण की कितनी बड़ी भक्त हूं, पर मेरे चरणामृत से मुझे नरक की यातनाएं भोगनी पड़ेंगी और वो मैं सहन कर लूंगी, लेकिन अपने स्वामी को पीड़ा में नहीं देख सकती. इसलिए ये चरणामृत ले जाइये.

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नारद मुनि बोले- राधे-राधे
राधा की बात सुनकर नारद मुनि का घमंड टूट गया और वो समझ गए कि श्रीकृष्ण ने यह लीला उनको समझाने के लिए रची थी. इसके बाद नारद मुनि ने श्रीकृष्ण को प्रणाम करते हुए कहा “राधे-राधे”.

Tags: Dharma Culture, Lord krishna

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