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रमा एकदशी आज, इस कथा को पढ़े बिना अधूरा है व्रत

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Updated: October 24, 2019, 4:55 PM IST
रमा एकदशी आज, इस कथा को पढ़े बिना अधूरा है व्रत
रमा एकादशी व्रत कथा

शोभन ने व्रत रख लिया बिना बिना कुछ खाए पिए उसकी हालत बिगड़ती जा रही थी. जब सूर्यास्त हो गया तो लोग विष्णु भगवान के भक्त ख़ुशी ख़ुशी रात्रि जागरण करने लगे लेकिन शोभन की भूख से जान जा रही थी.

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रमा एकदशी व्रत कथा
पुराने समय की बात है मुचुकुंद नाम का एक राजा था. देवराज इंद्र, यम, कुबेर, वरुण और विभीषण उसके बहुत अच्छे दोस्त थे. मुचुकुंद धर्म का पालन करने वाला , न्यायप्रिय राज था. वो विष्णु भगवान का बड़ा भक्त था. राजा की एक बेटी थी जिसका नाम चंद्रभागा था. जिसकी शादी राजा ने चंद्रसेन के पुत्र शोभन के साथ की. शादी के बाद जब पहली बार सोभन पत्नी के साथ ससुराल आया तो कुछ दिन बाद ही रमा एकादशी का व्रत पड़ा.

इस बात को सोचकर चंद्रभागा काफी परेशान हो गयी क्योंकि शोभन शरीर से बेहद कमजोर था और व्रत रखने की हालत में नहीं था. जबकि उसके पिता ने पूरे राज्य में मुनादी करवा दी थी कि एकादशी के लिए कोई भी राज्य में खाना नहीं खायेगा और व्रत रहेगा. ये सुनकर शोभन ने पत्नी से कहा कि मैं बिना खाना खाए ज़िंदा नहीं रह सकता, अब मैं क्या करूं, कुछ ऐसी तरकीब सोचो कि मेरी जान ना चली जाए.

इसपर चंद्रभागा ने बताया कि मेरे स्वामी! पिता जी के राज्य में एकादशी के दिन कोई भी भोजन नहीं करता. हाथी, घोड़ा, ऊंट, बिल्ली, गौ आदि भी तृण, अन्न, जल आदि ग्रहण नहीं कर सकते, फिर मनुष्य का तो कहना ही क्या है. अगर आप भोजन के बिना जीवित नहीं रह सकते हैं तो किसी दूसरी जगह चले जाइए. पत्नी की बात सुनकर शोभन ने व्रत करने का संकल्प किया और सोचा जो होगा देखगा जाएगा.

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शोभन ने व्रत रख लिया बिना बिना कुछ खाए पिए उसकी हालत बिगड़ती जा रही थी. जब सूर्यास्त हो गया तो लोग विष्णु भगवान के भक्त ख़ुशी ख़ुशी रात्रि जागरण करने लगे लेकिन शोभन की भूख से जान जा रही थी. सुबह होते होते शोभन की मृत्यु हो गई. राजा ने विधि विधान से उसका कर्मकांड कराया. पति की मौत के बाद चंद्रभागा अपने मायके में ही रहने लगी.

लेकिन रमा एकादशी व्रत के प्रभाव से मृत्यु के बाद भी शोभन को मंदराचल पर्वत पर सारी सुविधाओं से भरापूरा देवपुर प्राप्त हुआ. वहां की दीवारें सुंदर रत्न और वैदुर्यमणि जटित स्वर्ण के खंभों पर निर्मित अनेक प्रकार की स्फटिक मणियों से सुशोभित भवन में बहुमूल्य वस्त्राभूषणों तथा छत्र व चंवर से विभूषित, गंधर्व और अप्सराओं से युक्त सिंहासन पर आरूढ़ था मानो स्वर्गलोक हो.
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लंबे समय बाद मुचुकुंद के राज्य में निवास करने वाला सोम शर्मा नामक ब्राह्मण तीर्थयात्रा करता हुआ शोभन के देवकुल पहुंचा. शोभन को देखते ही वह उसे पहचान गया और उसका हालचाल पूछा. साथ ही हैरान होकर यह भी पुछा उसके कि हे राजन! हमें आश्चर्य हो रहा है. आप अपना वृत्तांत कहिए कि ऐसा सुंदर नगर जो न कभी देखा, न सुना, आपको कैसे प्राप्त हुआ.

इसपर शोभन ने बताया कि कार्तिक कृष्ण की रमा एकादशी का व्रत करने से मुझे यह नगर मिला है. लेकिन ऐसा ज्यादा समय तक नहीं रहेगा. परंतु यह अस्थिर है. यह स्थिर हो जाए ऐसा उपाय कीजिए. ब्राह्मण कहने लगा, "हे राजन! यह स्थिर क्यों नहीं है और कैसे स्थिर हो सकता है आप बताइए, फिर मैं अवश्यमेव वह उपाय करूंगा. मेरी इस बात को आप मिथ्या न समझिए." शोभन ने कहा कि उसने बिना श्रद्धा भाव से इस व्रत को किया है. अत: यह सब कुछ अस्थिर है. यदि आप मुचुकुंद की कन्या चंद्रभागा को यह सब वृत्तांत कहें तो यह स्थिर हो सकता है.

ऐसा सुनकर उस श्रेष्ठ ब्राह्मण ने अपने नगर लौटकर चंद्रभागा से सब वृत्तांत कह सुनाया. ब्राह्मण के वचन सुनकर चंद्रभागा बड़ी प्रसन्नता से ब्राह्मण से कहने लगी, "हे ब्राह्मण! ये सब बातें आपने प्रत्यक्ष देखी हैं या स्वप्न की बातें कर रहे हैं. ब्राह्मण कहने लगा, "हे पुत्री! मैंने महावन में तुम्हारे पति को प्रत्यक्ष देखा है. साथ ही किसी से विजय न हो ऐसा देवताओं के नगर के समान उनका नगर भी देखा है. उन्होंने यह भी कहा कि यह स्थिर नहीं है. जिस प्रकार वह स्थिर रह सके सो उपाय करना चाहिए.

चंद्रभागा ने ब्राह्मण से कहा, हे देव! मुझे वहां ले चलो, मैं अपने पति को देखना चाहती हूं. मैं अपने पुण्य से उस नगर को स्थिर बना दूंगी. आप मुझे मेरे पति से मिला दें. आपको पुण्य फल की प्राप्ति होगी. यह बात सुनकर ब्राह्मण चंद्रभागा को लेकर मंदराचल पर्वत के समीप वामदेव ऋषि के आश्रम पर गया. वामदेवजी ने सारी बात सुनकर वेद मंत्रों के उच्चारण से चंद्रभागा का अभिषेक कर दिया. तब ऋषि के मंत्र के प्रभाव और एकादशी के व्रत से चंद्रभागा का शरीर दिव्य हो गया और वह दिव्य गति को प्राप्त हुई.

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चंद्राभागा अपने पति को देखकर बेहद खुश हुई. शोभन भी अति प्रसन्न हुआ और उसे बुलाकर अपनी बाईं तरफ बिठा लिया. चंद्रभागा कहने लगी, हे स्वामी! आप मेरे पुण्य को ग्रहण कीजिए. अपने पिता के घर जब मैं आठ वर्ष की थी तब से विधिपूर्वक एकादशी के व्रत को श्रद्धापूर्वक करती आ रही हूं. इस पुण्य के प्रताप से आपका यह नगर स्थिर हो जाएगा और समस्त कर्मों से युक्त होकर प्रलय के अंत तक रहेगा.

Disclaimer: इस लेख में दी गई जानकारियां और सूचनाएं सामान्य मान्यताओं पर आधारित हैं. Hindi news18 इनकी पुष्टि नहीं करता है. इन पर अमल करने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से संपर्क करें.

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First published: October 24, 2019, 12:14 PM IST
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