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सूर्यदेव की चालीसा का पाठ करने से मिलता है धन और आरोग्य का वरदान, दूर होती है दरिद्रता

रविवार को सूर्यदेव की पूजा की जाती है. (Image-Canva)

रविवार को सूर्यदेव की पूजा की जाती है. (Image-Canva)

सूर्य देव की विधि विधान से आराधना करने से तेज और सकारात्मक शक्ति प्राप्त होती है. सूर्य देव का आशीर्वाद प्राप्त करने के ...अधिक पढ़ें

हाइलाइट्स

सूर्य देव की आराधना से सकारात्मक शक्ति प्राप्त होती है.
रविवार को सूर्य चालीसा का पाठ करना चाहिए.

Surya Dev Chalisa: हिंदू धर्म में सभी देवताओं के पूजा-पाठ के नियम और महत्व अलग-अलग है. प्रत्येक देवता की कृपा पाने के लिए विशेष नियमों के अनुसार पूजा-अर्चना करनी होती है. भगवान सूर्य देव को राजा की उपाधि प्राप्त है. सूर्य देव यश, बल और वैभव के लिए जाने जाते हैं. सूर्य देव की विधि विधान से आराधना करने से तेज और सकारात्मक शक्ति प्राप्त होती है.

पंडित इंद्रमणि घनस्याल बताते हैं कि सूर्य देव का आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए रविवार को सूर्य चालीसा का पाठ करना चाहिए. इससे सूर्य देव की विशेष कृपा होती है. प्रतिदिन सूर्या चालीसा पाठ करने से सुख-समृद्धि मिलती है, साथ में घर की दरिद्रता, वास्तुदोष दूर होते हैं और हर कार्य में सफलता प्राप्त होती है.

सूर्य चालीसा पाठ के लाभ

ज्योतिषियों के अनुसार, सूर्य चालीसा पाठ से भक्त को लंबी आयु का आशीर्वाद मिलता है. नियमित रूप से सूर्य चालीसा पढ़ने से शारीरिक कष्ट दूर होते हैं. रोगों से मुक्ति मिलने के साथ आरोग्य का वरदान प्राप्त होता है. समाज में यश और कीर्ति में वृद्धि होती है. कहते हैं कि सूर्य चालीसा पाठ करने से अकाल मृत्यु से बचा जा सकता है.

सूर्य देव चालीसा का पाठ

दोहा॥
कनक बदन कुण्डल मकर, मुक्ता माला अङ्ग,
पद्मासन स्थित ध्याइए, शंख चक्र के सङ्ग॥
॥चौपाई॥
जय सविता जय जयति दिवाकर,
सहस्त्रांशु सप्ताश्व तिमिरहर॥
भानु पतंग मरीची भास्कर,
सविता हंस सुनूर विभाकर॥ 1॥

विवस्वान आदित्य विकर्तन,
मार्तण्ड हरिरूप विरोचन॥
अम्बरमणि खग रवि कहलाते,
वेद हिरण्यगर्भ कह गाते॥ 2॥

सहस्त्रांशु प्रद्योतन, कहिकहि,
मुनिगन होत प्रसन्न मोदलहि॥
अरुण सदृश सारथी मनोहर,
हांकत हय साता चढ़ि रथ पर॥3॥

मंडल की महिमा अति न्यारी,
तेज रूप केरी बलिहारी॥
उच्चैःश्रवा सदृश हय जोते,
देखि पुरन्दर लज्जित होते॥4

मित्र मरीचि, भानु, अरुण, भास्कर,
सविता सूर्य अर्क खग कलिकर॥
पूषा रवि आदित्य नाम लै,
हिरण्यगर्भाय नमः कहिकै॥5॥

द्वादस नाम प्रेम सों गावैं,
मस्तक बारह बार नवावैं॥
चार पदारथ जन सो पावै,
दुःख दारिद्र अघ पुंज नसावै॥6॥

नमस्कार को चमत्कार यह,
विधि हरिहर को कृपासार यह॥
सेवै भानु तुमहिं मन लाई,
अष्टसिद्धि नवनिधि तेहिं पाई॥7॥

बारह नाम उच्चारन करते,
सहस जनम के पातक टरते॥
उपाख्यान जो करते तवजन,
रिपु सों जमलहते सोतेहि छन॥8॥

धन सुत जुत परिवार बढ़तु है,
प्रबल मोह को फंद कटतु है॥
अर्क शीश को रक्षा करते,
रवि ललाट पर नित्य बिहरते॥9॥

सूर्य नेत्र पर नित्य विराजत,
कर्ण देस पर दिनकर छाजत॥
भानु नासिका वासकरहुनित,
भास्कर करत सदा मुखको हित॥10॥

ओंठ रहैं पर्जन्य हमारे,
रसना बीच तीक्ष्ण बस प्यारे॥
कंठ सुवर्ण रेत की शोभा,
तिग्म तेजसः कांधे लोभा॥11॥

पूषां बाहू मित्र पीठहिं पर,
त्वष्टा वरुण रहत सुउष्णकर॥
युगल हाथ पर रक्षा कारन,
भानुमान उरसर्म सुउदरचन॥12॥

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बसत नाभि आदित्य मनोहर,
कटिमंह, रहत मन मुदभर॥
जंघा गोपति सविता बासा,
गुप्त दिवाकर करत हुलासा॥13॥

विवस्वान पद की रखवारी,
बाहर बसते नित तम हारी॥
सहस्त्रांशु सर्वांग सम्हारै,
रक्षा कवच विचित्र विचारे॥14॥

अस जोजन अपने मन माहीं,
भय जगबीच करहुं तेहि नाहीं ॥
दद्रु कुष्ठ तेहिं कबहु न व्यापै,
जोजन याको मन मंह जापै॥15॥
अंधकार जग का जो हरता,
नव प्रकाश से आनन्द भरता॥

ग्रह गन ग्रसि न मिटावत जाही,
कोटि बार मैं प्रनवौं ताही॥
मंद सदृश सुत जग में जाके,
धर्मराज सम अद्भुत बांके॥16॥

धन्य-धन्य तुम दिनमनि देवा,
किया करत सुरमुनि नर सेवा॥
भक्ति भावयुत पूर्ण नियम सों,
दूर हटतसो भवके भ्रम सों॥17॥

परम धन्य सों नर तनधारी,
हैं प्रसन्न जेहि पर तम हारी॥
अरुण माघ महं सूर्य फाल्गुन,
मधु वेदांग नाम रवि उदयन॥18॥

भानु उदय बैसाख गिनावै,
ज्येष्ठ इन्द्र आषाढ़ रवि गावै॥
यम भादों आश्विन हिमरेता,
कातिक होत दिवाकर नेता॥19॥

अगहन भिन्न विष्णु हैं पूसहिं,
पुरुष नाम रविहैं मलमासहिं॥20॥

॥दोहा॥
भानु चालीसा प्रेम युत, गावहिं जे नर नित्य,
सुख सम्पत्ति लहि बिबिध, होंहिं सदा कृतकृत्य॥

Tags: Dharma Aastha, Dharma Culture, Religion

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