Guru Nanak Dev Death Anniversary: पढ़ें गुरु नानक देव के ये दोहे, जानें कैसे हुई सिख धर्म की स्थापना

'गुरु नानक देव' की पुण्यतिथि
'गुरु नानक देव' की पुण्यतिथि

गुरु नानक (Guru Nanak Dev) ने अपने से पहले के निर्गुण संतों जैसे कबीर (Kabir) आदि के उपदेशों और शिक्षाओं को आत्मसात करके अपने मत का प्रचार किया. गुरु नानक देव ने हिंदू धर्मस्थलों के साथ-साथ मुस्लिम धर्मस्थलों की यात्रा की थी.

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  • Last Updated: September 22, 2020, 8:00 AM IST
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'गुरु नानक देव' की पुण्यतिथि: गुरु नानक देव ने ही सिख धर्म की स्थापना की थी. गुरु नानक को हिंदी, संस्कृत और फारसी भाषा का अच्छा ज्ञान था. गुरु नानक एक सूफी कवि भी थे. सिख धर्म भारत के सबसे नए धर्मों में से एक है. इस धर्म की स्थापना गुरु नानक देव ने ही की थी. सिख धर्म एकेश्वरवादी धर्म है. अक्सर ऐसा कहा और माना जाता है कि सिख धर्म का उदय इस्लाम के एकेश्वरवाद के प्रभाव में हुआ. हालांकि यह भी एक तथ्य है कि इस्लाम के आने से पहले भी भारत में एकेश्वरवाद या सिर्फ एक ही ईश्वर को मानने वाले कई धर्मों जैसे बौद्ध और जैन धर्मों का उदय हुआ था.

बौद्ध-जैन के साथ-साथ सिद्धों-नाथों की एक परंपरा भी थी जो एक ईश्वर में विश्वास करते थे और जातिप्रथा का विरोध करते थे. लेकिन इन धर्मों और संप्रदायों को इनके विधि-विधान की जटिलता की वजह से आम जनता में कोई खास लोकप्रियता नहीं मिली. गुरु नानक ने अपने से पहले के निर्गुण संतों जैसे कबीर आदि के उपदेशों और शिक्षाओं को आत्मसात करके अपने मत का प्रचार किया. गुरु नानक देव ने हिंदू धर्मस्थलों के साथ-साथ मुस्लिम धर्मस्थलों की यात्रा की थी. इस वजह से दोनों धर्मों की शक्ति और कमजोरी को समझते थे.

गुरु नानक इस बात को समझते थे कि जाति प्रथा के विरोध में अभी तक जितने मत या धर्म पैदा हुए हैं, उनका पालन करना आम जनता के लिए कठिन था. इस वजह से उन्होंने जाति प्रथा के विरोध की भारतीय परंपरा और इस्लाम के भाईचारे के भाव का अपने उपदेशों में समन्वय किया. मध्यकालीन निर्गुण संतों की तरह गुरु नानक देव ने भी अपनी बातों को जनता में फैलाने के लिए दोहों और पदों का सहारा लिया.



गुरु नानक ने सांसारिक माया जाल से बचने की शिक्षा अपने पदों और दोहों में जरूर दी है लेकिन साथ ही यह भी कहते हैं कि इसके लिए जंगल या वन जाने की जरूरत नहीं है. ऐसा कहकर गुरु नानक देव उस प्राचीन भारतीय मान्यता का विरोध कर रहे थे जिसमें संसार के माया-मोह से छूटने का एकमात्र रास्ता संन्यासी बनना माना जाता था. उन्होंने कई कविताओं और दोहों की रचना की. आइए आज उनकी पुण्य तिथि पर पढ़ते हैं उनके कुछ दोहे...
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एक ओंकार सतिनाम, करता पुरखु निरभऊ.
निरबैर, अकाल मूरत, अजुनी, सैभं गुर प्रसादि.

अर्थ: ईश्वर एक है और वह सर्वत्र (हर जगह), हर कोने में व्याप्त है,
वही परमपिता है. इसलिए सबके साथ मिलजुलकर प्यार से रहना चाहिए.

साचा साहिबु साचु नाइ
भाखिआ भाउ अपारू
आखहि मंगहि देहि देहि.

अर्थ: प्रभु सत्य एवं उसका नाम सत्य है.
अलग अलग विचारों एवं भावों तथा बोलियों में उसे भिन्न भिन्न नाम दिये गये हैं.
प्रत्येक जीव उसके दया की भीख माॅगता है तथा सब जीव उसके कृपा का अधिकारी है
और वह भी हमें अपने कर्मों के मुताबिक अपनी दया प्रदान करता है.

करमी आवै कपड़ा, नदरी मोखु दुआरू,
नानक एवै जाणीऐ, सभु आपे सचिआरू,
दाति करे दातारू.

अर्थ: अच्छे बुरे कर्मों से यह शरीर बदल जाता है-मोक्ष नही मिलती है.
मुक्ति तो केवल प्रभु कृपा से संभव है.
हमें अपने समस्त भ्रमों का नाश करके ईश्वर तत्व का ज्ञान प्राप्त करना चाहिये.
हमें प्रभु के सर्वकत्र्ता एवं सर्वब्यापी सत्ता में विश्वास करना चाहिये.

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हरि बिनु तेरो को न सहाई,
काकी मात-पिता सुत बनिता, को काहू को भाई.
धनु धरनी अरु संपति सगरी जो मानिओ अपनाई,
तन छूटै कुछ संग न चालै, कहा ताहि लपटाई.

अर्थ: ईश्वर (हरि) के बिना तेरा कोई सहारा नहीं है,
मां, काकी, पिता और पुत्र, तू ही तो है दूसरा कोई नहीं.(Disclaimer: इस लेख में दी गई जानकारियां और सूचनाएं मान्यताओं पर आधारित हैं. Hindi news18 इनकी पुष्टि नहीं करता है. इन पर अमल करने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से संपर्क करें.)
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