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Shardiya Navratri 2021: मां गढ़कालिका की कृपा से महाकवि कालीदास को हुआ था ज्ञान प्राप्त, यहां स्थित है माता का मंदिर

मां गढ़कालिका का मंदिर 51 शक्तिपीठों में से एक है.

मां गढ़कालिका का मंदिर 51 शक्तिपीठों में से एक है.

Shardiya Navratri: शारदीय नवरात्रि में मां दुर्गा अपने भक्तों पर विशेष कृपा बरसाती है. मां दुर्गा का एक स्वरुप मां गढ़कालिका का भी है. कहते हैं माता के मंदिर में दर्शन करने से कष्ट दूर हो जाते हैं.

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    Shardiya Navratri 2021: शारदीय नवरात्रि (Shardiya Navratri) के नौ दिनों में मां दुर्गा के विभिन्न रुपों की उपासना की जाती है. नवरात्रि यानी शक्ति की उपासना का पर्व. नवरात्रि के पावन दिनों में मां के 51 शक्तिपीठों (ShaktiPeeth)के दर्शन करने से विशेष लाभ मिलता है. धार्मिक मान्यता के अनुसार माता सती के शरीर के अंग जहां-जहां गिरे थे, वहां शक्तिपीठों की स्थापना हुई. माता के अंग 51 जगहों पर गिरे थे, इस वजह से 51 शक्तिपीठ कहलाए. ये सभी शक्तिपीठ भारतीय उपमहाद्वीप में फैले हुए हैं. इन्हीं शक्तिपीठों में से एक है गढ़कालिका धाम. यहां महाकवि कालीदास को मां की कृपा से ज्ञान प्राप्त हुआ था.

    यहां स्थित है माता गढ़कालिका का मंदिर
    मध्यप्रदेश का शहर उज्जैन वैसे तो 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक महाकालेश्वर की वजह से पूरी दुनिया में प्रसिद्ध है. लेकिन यहां स्थित मां गढ़कालिका का मंदिर भी इस स्थान की विशेषता को दर्शाता है. विक्रमादित्य की इस नगरी में ढ़ेरों इतिहास छुपे हैं. कहते हैं कि संस्कृत के प्रकांड विद्वान बने कालीदास जी को ज्ञानप्राप्ति मां गढ़कालिका की कृपा से ही हुई थी. यह शक्तिपीठ काफी सिद्ध माना जाता है, यही वजह है कि दूर-दूर से लोग सिद्धि हासिल करने के लिए यहां आते हैं.

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    नवरात्रि के दिनों में गढ़कालिका मंदिर की रौनक देखते बनती है. यहां इन दिनों में रोजाना सैंकड़ों भक्त माता के दर्शनों के लिए पहुंचते हैं. तांत्रिकों की देवी कालिका के इस चमत्कारिक मंदिर की स्थापना कब हुई थी इसे लेकर कोई स्पष्ट जानकारी नहीं है. हालांकि ये बात भी प्रचलित है कि यह मंदिर महाभारतकाल में बना था, लेकिन मूर्ति सतयुग के समय की है. बहुत बाद में प्राचीन मंदिर का जीर्णोद्धार सम्राट हर्षवर्धन द्वारा किए जाने का जरूर उल्लेख मिलता है.

    ऐसे हुई थी शक्तिपीठों की स्थापना
    पुराणों में कथा है कि देवी सती के पिता दक्ष द्वारा बृहस्पति सर्व नाम का एक यज्ञ कराया था. उसमें उन्होंने सभी देवी-देवताओं को बुलाया लेकिन जानबूझकर भगवान शंकर को निमंत्रण नहीं दिया. इसका माता सती द्वारा विरोध किया गया. इसके चलते राजा दक्ष द्वारा सती के सामने शिवजी को अपशब्द कहे गए. इससे दुखी होकर माता सती ने यज्ञ में अपनी ही आहुति दे दी.

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    इससे शिवजी इतने क्रोधित हुए कि उन्होंने अपना तीसरा नेत्र खोल दिया और तांडव करना शुरू कर दिया. इसके बाद वे मां सती के मृत शरीर को लेकर ब्रह्मांड में घूमने लगे. इस दौरान माता के शरीर के अंग जहां-जहां गिरे वहां शक्तिपीठों की स्थापना हुई. (Disclaimer: इस लेख में दी गई जानकारियां और सूचनाएं सामान्य जानकारियों पर आधारित हैं. Hindi news18 इनकी पुष्टि नहीं करता है. इन पर अमल करने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से संपर्क करें.)

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