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Shukravar Vrat: शुक्रवार को मां लक्ष्मी को न चढ़ाएं यह वस्तु, बनता काम बिगड़ जाएगा

Shukravar Vrat: शुक्रवार को मां लक्ष्मी को न चढ़ाएं यह वस्तु, बनता काम बिगड़ जाएगा

शुक्रवार को करें मां लक्ष्मी की पूजा.

शुक्रवार को करें मां लक्ष्मी की पूजा.

Shukravar Vrat: धन, धान्य, वैभव और सुख-समृद्धि की देवी मां लक्ष्मी (Mata Lakshmi) को प्रसन्न करने के लिए शुक्रवार का व्रत रखा जाता है. शुक्रवार के दिन मां दुर्गा (Maa Durga) और शीतला माता (Sheetala Mata) की भी पूजा की जाती है. ये दो देवियों जब प्रसन्न होती हैं, तो व्यक्ति की मनोकामनाएं पूरी करती हैं और आरोग्य का आशीर्वाद देती हैं.

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    Shukravar Vrat: धन, धान्य, वैभव और सुख-समृद्धि की देवी मां लक्ष्मी (Mata Lakshmi) को प्रसन्न करने के लिए शुक्रवार का व्रत रखा जाता है. शुक्रवार के दिन मां दुर्गा (Maa Durga) और शीतला माता (Sheetala Mata) की भी पूजा की जाती है. ये दो देवियों जब प्रसन्न होती हैं, तो व्यक्ति की मनोकामनाएं पूरी करती हैं और आरोग्य का आशीर्वाद देती हैं. जो लोग शुक्रवार का व्रत रखते हैं, उनको विधि विधान से मां लक्ष्मी की पूजा करनी चाहिए. लक्ष्मी जी की पूजा में कमल का फूल, सफेद मिठाई या बताशा, मखाना, शमी का पत्ता आदि अर्पित करना चाहिए. इससे माता लक्ष्मी प्रसन्न होती हैं. हालांकि माता लक्ष्मी की पूजा में एक वस्तु को कभी भी अर्पित नहीं करना चाहिए. इससे माता लक्ष्मी नाराज हो सकती हैं. आइए जानते हैं इसके बारे में.

    लक्ष्मी पूजा में वर्जित है तुलसी
    माता लक्ष्मी की पूजा में कभी भी तुलसी का प्रयोग नहीं करना चाहिए. तुलसी का प्रयोग करने से माता लक्ष्मी रुष्ट हो सकती हैं. उनको तुलसी का पत्ता या तुलसी की मंजरी अर्पित नहीं की जाती है.

    माता लक्ष्मी को क्यों पसंद नहीं है तुलसी
    पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, तुलसी का विवाह भगवान विष्णु के साथ शालिग्राम स्वरुप में हुआ है. इस कारण से हर साल तुलसी विवाह भी आयोजित होता है. विष्णु जी के आशीर्वाद से ही तुलसी को उनकी पूजा में अवश्य शामिल किया जाता है. शालिग्राम स्वरुप में ​विवाह होने के कारण माता लक्ष्मी को तुलसी प्रिय नहीं हैं. तुलसी एक प्रकार से उनके लिए सौत जैसी हुईं.

    कौन हैं तुलसी
    वृंदा नाम की कन्या का विवाह असुरराज जालंधर से हुआ था. वह विष्णु भक्त थी. वृंदा पतिव्रता थी, जालंधर का वध तब तक नहीं हो सकता था, जब तक की वृंदा का पतिव्रता धर्म भंग न हो. तब भगवान विष्णु ने अपनी माया से जालंधर का स्वरुप धारण किया, जिससे वृंदा ने उनको स्पर्श कर दिया और उसका पतिव्रता धर्म भंग हो गया. जालंधर शिवजी से युद्ध में मारा गया. पति वियोग में वृंदा ने विष्णु जी को पत्थर होने का श्राप दिया. वे पत्थर हो गए.

    माता लक्ष्मी और देवताओं की प्रार्थना पर वृंदा ने पुन: उनको उनका वास्तविक स्वरुप दिया. इसके बाद वृंदा ने आत्मदाह कर लिया. उसके शरीर के राख वाले स्थान पर एक पौधा उग आया. भगवान विष्णु ने उसका नामकरण किया- तुलसी. उन्होंने तुलसी को आशीर्वाद दिया कि शालिग्राम स्वरुप में उनका विवाह तुलसी से होगा और उनके प्रसाद में तुलसी अवश्य शामिल होगा.

    (Disclaimer: इस लेख में दी गई जानकारियां और सूचनाएं सामान्य मान्यताओं पर आधारित हैं. Hindi news18 इनकी पुष्टि नहीं करता है. इन पर अमल करने से पहले संबधित विशेषज्ञ से संपर्क करें)

    Tags: Dharma Aastha, Spirituality

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