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Surya Grahan 2021: आखिर क्यों लगता है सूर्यग्रहण? जानें क्या है राहू-केतू की पौराणिक कथा

Surya Grahan 2021: आखिर क्यों लगता है सूर्यग्रहण? जानें क्या है राहू-केतू की पौराणिक कथा

सूर्य ग्रहण के समय भगवान की मूर्तियों को स्पर्श न करें -Images - Shutterstock

सूर्य ग्रहण के समय भगवान की मूर्तियों को स्पर्श न करें -Images - Shutterstock

Surya Grahan 2021: सूर्य ग्रहण वैसे तो एक खगोलीय घटना है लेकिन धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, सूर्य ग्रहण के दौरान सूर्य पीड़ित हो जाते हैं, जिस कारण सूर्य की शुभता में कमी आ जाती है. इस साल 4 दिसंबर 2021 को लगने वाले सूर्य ग्रहण में सूतक काल मान्य नहीं होगा. यह सूर्य ग्रहण उपछाया ग्रहण होगा. ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, पूर्ण ग्रहण होने पर ही सूतक काल मान्य होता है.

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    Surya Grahan 2021: इस साल का आखिरी सूर्य ग्रहण (Solar Eclipse) 4 दिसंबर (शनिवार) को लगेगा. ज्योतिष शास्त्र में सूर्य ग्रहण को एक महत्वपूर्ण खगोलीय घटना माना जाता है. इसका वैज्ञानिक महत्व भी बहुत होता है. ग्रहण को ज्योतिष में अशुभ घटना के तौर पर लिया जाता है. यही वजह है कि इस दौरान पूजा-पाठ व शुभ कार्य नहीं किए जाते हैं. धार्मिक मान्यताओं के मुताबिक, सूर्य ग्रहण के दौरान सूर्य पीड़ित हो जाते हैं, जिस कारण सूर्य की शुभता में कमी आ जाती है. इस बार 4 दिसंबर 2021 को लगने वाले सूर्य ग्रहण में सूतक काल मान्य नहीं होगा. यह सूर्य ग्रहण उपछाया ग्रहण होगा. ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, सूतक काल पूर्ण ग्रहण होने पर ही मान्य होता है आंशिक या उपछाया होने पर सूतक नियमों का पालन नहीं किया जाता है. आइए जानते हैं सूर्य ग्रहण का समय और उससे राहू केतु का संबंध और पौराणिक कथा.

    इस तिथि को होगा आखिरी सूर्य ग्रहण
    साल 2021 का आखिरी और दूसरा सूर्य ग्रहण 4 दिसंबर 2021 (शनिवार) को लगेगा. हिंदू पंचांग के मुताबिक, 4 दिसंबर को मार्गशीर्ष महीने की कृष्ण पक्ष की अमावस्या तिथि है.

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    सूर्य ग्रहण का ये है समय
    साल का आखिरी सूर्य ग्रहण 4 दिसंबर (शनिवार) सुबह 10 बजकर 59 मिनट पर शुरू होगा और दोपहर 03 बजकर 07 मिनट पर समाप्त होगा.

    सूर्य ग्रहण और राहू केतु की पौराणिक कथा
    समुद्र मंथन की पौराणिक कथाओं के अनुसार, जब दैत्यों ने तीनों लोकों पर अपना अधिकार जमा लिया तब देवताओं ने भगवान विष्णु से मदद की गुहार लगाई. तीनों लोकों को असुरों से बचाने के लिए भगवान विष्णु का आह्वान किया गया. तब भगवान विष्णु ने देवताओं को क्षीर सागर का मंथन करने के लिए कहा और इस मंथन से निकले अमृत का पान करने के लिए कहा. भगवान विष्णु ने देवताओं को चेताया था कि ध्यान रहे अमृत असुर न पी पाएं वर्ना इन्हें युद्ध में कभी हराया नहीं जा सकेगा.

    भगवान के कहे अनुसार देवताओं मे क्षीर सागर में मंथन किया. समुद्र मंथन से निकले अमृत को लेकर देवता और असुरों में जमकर संघर्ष हुआ. तब भगवान विष्णु ने मोहनी रूप धारण कर एक तरफ देवता और एक तरफ असुरों को बिठा दिया और कहा कि बारी-बारी सबको अमृत मिलेगा. यह सुनकर एक असुर देवताओं के बीच भेष बदल कर बैठ गया, लेकिन चंद्र और सूर्य उसे पहचान गए और भगवान विष्णु को इसकी जानकारी दे दी, लेकिन तब तक भगवान उन्हें अमृत दे चुके थे.

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    अमृत गले तक पहुंचा था कि भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से असुर के धड़ को सिर से अलग कर दिया, लेकिन तब तक उसने अमृतपान कर लिया था. हालांकि, अमृत गले से नीच नहीं उतरा था, लेकिन उसका सिर अमर हो गया. सिर राहु बना और धड़ केतु के रूप में अमर हो गया. भेद खोलने के कारण ही राहु और केतु की चंद्र और सूर्य से दुश्मनी हो गई. कालांतर में राहु और केतु को चंद्रमा और पृथ्वी की छाया के नीचे स्थान प्राप्त हुआ है. उस समय से राहु, सूर्य और चंद्र से द्वेष की भावना रखते हैं, जिससे ग्रहण पड़ता है. (Disclaimer: इस लेख में दी गई जानकारियां और सूचनाएं सामान्य मान्यताओं पर आधारित हैं. Hindi news18 इनकी पुष्टि नहीं करता है. इन पर अमल करने से पहले संबधित विशेषज्ञ से संपर्क करें.)

    Tags: Religion, Surya Grahan

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