मुहर्रम में धड़कता है हिंदुस्तान का दिल, हर भाषा की लोकगीत में है कर्बला का जिक्र

मुहर्रम में धड़कता है हिंदुस्तान का दिल, हर भाषा की लोकगीत में है कर्बला का जिक्र
हिंदू, मुसलमान, सिख और इसाई, सब शहीदे इंसानियत को अपने अपने अंदाज में याद करते हैं.

हिंदोस्तान में अजादारी की शुरुआत उस वक्त शुरू हुई जब प्राचीन भारतीय संस्कृति और इस्लामी-ईरानी कारकों के आपसी मेलजोल से एक नई गंगा-जमनी तहजीब पनप रही थी.

  • News18Hindi
  • Last Updated: August 31, 2020, 4:41 PM IST
  • Share this:
(लईक जायसी)

कर्बला वालों का गम यूं तो सारी दुनिया में मनाया जाता है लेकिन अपने अंदाज और कैफियत के लिहाज से हिंदोस्तान का मुहर्रम बहुत खास है. यहां मुहर्रम किसी खास मजहब, तबके या बिरादरी तक सीमित नहीं ये हमारी सांझी तहजीब का अटूट हिस्सा है. वाक्या भले ही अरब का हो लेकिन इसकी याद में हिंदोस्तान का दिल धड़कता हुआ दिखता है, हुसैन के मातम में तमाम हद बंदियां टूट जाती हैं. हिंदू, मुसलमान, सिख और इसाई, सब शहीदे इंसानियत को अपने अपने अंदाज में याद करते हैं. कशमीर से कन्याकुमारी तक इसके सिलसिले फैले हुए हैं. इलाके के साथ बोलियां और अंदाज बदलते जाते हैं लेकिन शिद्दत एक जैसी.

मुहर्रम में हिंदोस्तानी रंग
हिंदोस्तान में अजादारी की शुरुआत उस वक्त शुरू हुई जब प्राचीन भारतीय संस्कृति और इस्लामी-ईरानी कारकों के आपसी मेलजोल से एक नई गंगा-जमनी तहजीब पनप रही थी. दोनों एक दूसरे के तहजीबी असरात कुबूल कर रहे थे. जब फर्शे अजा बिछा तो गैर मुस्लिम भाई बहन भी पूरी अकीदत से शामिल हुए. ये लोग अपने रस्मो रिवाज भी लाए और वक्त के साथ परवान चढ़ता गया. अब मुहर्रम में हिंदोस्तानी रंग इतने घुल मिल गए हैं कि इन्हें अलग करके देखा भी नहीं जा सकता. कर्बला से काशी और फरात से गंगा तक का ये सफर दुनिया के लिए उठाए गए दुख दर्द से हमदर्दी और सच्चे बलिदान के सम्मान की अनंत यात्रा भी है.
स्वामी कितनी दूर से लागा प्रेमी बान


लहर उठी फरात से पहुंची हिंदोस्तान
धरती राम और कृश्न की करबल का संदेस
आंसू तुमरे सोग के गंगा जमुनी देस

हुसैनी ब्राह्मणों की मेहनत
हिंदोस्तान में मुहर्रम भाईचारे की मिसाल है. धर्म और वर्ग की हदबंदियां यहां टूट जाती हैं. नफरत के सौदागरों ने सांझी तहजीब पर बार बार चोट की है लेकिन मुहर्रम पर इसका कोई भी असर नहीं पड़ा. आज भी गैर मुस्लिम पूरी आस्था से मुहर्रम में शामिल होते हैं. महिलाएं ताजिए और दुलदुल की आरती करती हैं. अलम और दुलदुल के लिए आंचल से रास्ता साफ करती हैं. हिंदुओं और सिखों की अपनी अजादारी हैं, अंजुमनें हैं. मुहर्रम में अखाड़े निकाले जाते हैं. लोग इमाम के पैक (दूत) बनते हैं. ये सब मुहर्रम की हिंदोस्तानी शक्लें हैं. हिंदोस्तान में कर्बला वालों की याद को बढ़ाने फैलाने में सूफी संतों के साथ-साथ हुसैनी ब्राह्मणों की मेहनत भी है. आज भी हुसैनी ब्राह्मण कर्बला वालों को पूरी अकीदत से याद करते हैं. हिंदू और सिख कवियों लेखकों ने कर्बला की कुर्बानियों पर खूब खूब लिखा है. गांव गांव में इमाम चौक हैं. मुहर्रम का चांद नजर आते ही दहे और जारी जैसे कर्बलाई लोकगीत माहौल में दर्द घोलने लगते हैं. हर बोली भाषा में मुहर्रम के लोकगीतों का एक जीता जागता संसार है.

हजरत छोड़िन मक्का मदीना, चले कर्बला की ओर
नाना के रौजवा और माई की कबरिया से दूर
अरे पहुंचे उजार जंगरवा जहां जुलम कब बदरिया घनघोर
और किहिन अपना खुनवा बहाय के जुलम की रतिया में अजोर
वारी सकीना बिलखे बून बून पनिया और अजगर कुम्हलाए
देखैं हुसैन बाबा मुड़ मुड़ दरिया की ओर
और कहैं जैनब से धीरज राखा चुप्पी रहा कुछ नई भाका
आइल गई बेला सहात की आज बाटे दसईं की भोर
-----
हस्सन घरवा से निकले बनके जोगिया
उनके हथवा में तुमड़ी बगल में झोरिया
अम्मा खड़ी खड़ी दरवजवा पुछले बतिया
बेटा कोनी करनवा भयल हो जोगिया
अम्मा हमरे करमवा लिखल बा जोगिया

हिंदोस्तानी ज्ञान और शिल्प की जलवागिरी
हिंदोस्तान की अजादी पर यहां की सांझी तहजीब की गहरी छाप है. मुहर्रम अनेकता में एकता का जिंदा सुबूत है. मजलिस, जुलूस, नौहा, मर्सिया समेत अजादारी का कोई भी हिस्सा कोई भी पहलू देखिए इस पर हिंदोस्तानी तहजीब के सच्चे और पक्के रंग नजर आएंगे. आसमान से बात करते शानदार इमामबाडे, चांद सूरज से आंख मिलाते खूबसूरत अलम अकीदत की रोशनी लुटाते नकश्शीन पटके और मिट्टी से लेकर सोने-चांदी तक के रंगारंग ताजिए देखिए इसमें हिंदोस्तानी ज्ञान और शिल्प की जलवागिरी साफ नजर आएगी. हर फनकार ने जैसे अपना दिल निकालकर इमाम की चौखट पर रख दिया था. ताजिया तो खालिस हिंदोस्तनी आस्था चिन्ह है.

मेहंदी का जुलूस
ताजिए की बनावट और सजावट में तमाम प्रयोग हुए हैं. पवित्रता और भक्ति के तमाम प्रतीकों को इसमें शामिल किया गया और ताजिए की अनेक शक्ले वजूद में आईं. इन्हीं में से एक है पूरबी ताजिया, जिसमें हिंदोस्तानी रंग बहुत चटक हैं. अलम, ताबूत पर फूल चढ़ाने का दस्तूर और मातमी जुलूस में गाजे बाजे झंडे इमाम के नाम पर लंगर, प्याऊ और मलीदे का प्रसाद हिंदोस्तानी ही तो है. मेहंदी का जुलूस भी अजादारी पर हिंदोस्तानी तहजीब के असर की खूबसूरत कड़ी है. कहते हैं कि 9 मुहर्रम को इमाम हुसैन ने अपनी बेटी कुबरा की शादी अपने भतीजे कासिम से की थी, यजीदी फौज ने अगले रोज उन्हें भी कत्ल कर दिया. मुहर्रम में मेहंदी के जुलूस उठाकर इस वाक्ये को बड़ी जज्बाती तरीके से याद किया जाता है. इस जुलूस में मेंहदी, फूल और मिठाई के थाल भी शामिल होते हैं, जैसे दूल्हे वाले दुल्हन के घर भिजवाते हैं.

सोजख्वानी में हिंदोस्तानी संगीत
मर्सियों में भी हिंदोस्तानी रंग बिखरे हुए हैं. शायरों ने मंजरकशी और जज्बात निगारी में ही नहीं संवादों में भी हिंदोस्तानी रंगो लहजों और मुहावरों का खूबसूरत इस्तेमाल किया है. सोजख्वानी में हिंदोस्तानी संगीत और गायकी के रंग शामिल हैं. पढ़ने वाले मौसम और वक्त के हिसाब से रागों का चयन करके सोज पढ़ते हैं. शुरू में मर्सिए भी राग में पढ़े जाते थे. खुशी का राग छेड़ने वाली शहनाई से मुहर्रम में दर्दनाक सुर फूटने लगते हैं. मुहर्रम है तो शहीदे इंसानियत की अजादारी का सिलसिला बदस्तूर जारी है. कोरोना के संकट और बंधनों ने सामूहिक और सार्वजिनक मुहर्रम को भले ही कुछ सीमित कर दिया हो लेकिन हुसैन हुसैन की आवाजें पहले से ज्यादा बुलंद हैं.

कर्बला हस्तक्षेप और प्रतिरोध का बड़ा प्रतीक
लोग गाइडलाइंस का पालन करते हुए कर्बला वालों को याद कर रहे हैं. टीवी से लेकर सोशल मीडिया तक कर्बला वालों का जिक्र हो रहा है और क्यों न हो कि मुहर्रम में अज़ाए हुसैन सिर्फ गम का इज़हार नहीं, ये खुला हुआ इनकार भी है हर नाहक इक्तेदार का. ऐहतजाज है जुल्म और नाइंसाफी के खिलाफ. कट्टरपन और दहशतगर्दी के खिलाफ. हक और इंसाफ के लिए बुलंद एक मजबूत और मुसलसल आवाज. अपनी तनहाई और कमजोरी के बावजूद जालिम के बड़े से बड़े लश्कर से भिड़ जाने का रूहानी पैगाम. जिक्र ए हुसैन मजलूम को जालिम के खिलाफ खड़े होने का हौसला देता है. साहित्य में तो कर्बला हस्तक्षेप और प्रतिरोध का बड़ा प्रतीक है.

कर्बला ने बेबसी को तेगे जौहरदार दी।
जंगबाजों के मुक़ाबिल अम्न की तलवार दी।।
(मैहदी नज्मी)

हुई है जब भी सफ़आरा सिपाहे ज़ुल्मतो-जौर
कभी सिपर कभी तलवार बन गया तेरा ग़म
(इफ्तेखार आरिफ़)

जिक्रे हुसैन वो रोशनी है, जो हमे नफरत कट्टरपन, फिरकापरस्ती और दहशतगर्दी के अंधेरों से करती है. उनसे मुकाबले का हौसला देती है. भेदभाव मिटाकर इंसानी भाईचारे की तरफ मुतवज्जे करती है. तब से अब तक जब भी इंसानियत किसी मुश्किल में पड़ी हुसैनियत ने बढ़ कर रहनुमाई की. आजादी की लड़ाई में महात्मा गांधी ने भी इमाम हुसैन की कुर्बानी से रोशनी ली थी. अब भी वक्त की जरूरत भी है यादे हुसैन. आज दुनिया जिस मोड़ पर खड़ी है, अम्नो-इंसानियत के दुश्मन जिस तरह सरगर्म है, मजहब के नाम पर मासूमों का खून बहाया जा रहा है, इमाम हुसैन के संदेश और भी प्रासंगिक हो गए हैं. इनकी अहमियत जितनी कल थी, उतनी ही आज भी है बल्कि आज कहीं और ज्यादा है. आइए मिल कर रोशन करते रहें, जिक्र हुसैन की शमा. जलते रहें चिराग से चिराग. सच की रोशनी फैलते ही अंधेरों का पुजारी, जालिम फिर बेनकाब होता. दुनिया के हर अंधेरे को चीर कर रख देता है सच का ये सूरज.

ऐ जिंदगी, जलाले शहे मशरेकैन दे।
इस ताजा कर्बला को भी अज्मे हुसैन दे।।
(जोश मलीहाबादी)
अगली ख़बर

फोटो

टॉप स्टोरीज