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Tulsi Vivah 2019: इस कथा के बिना अधूरा है तुलसी विवाह, यहां पढ़ें कथा

Bhagya Shri Singh | News18Hindi
Updated: November 8, 2019, 4:10 AM IST
Tulsi Vivah 2019: इस कथा के बिना अधूरा है तुलसी विवाह, यहां पढ़ें कथा
तुलसी विवाह के दिन तुलसी और भगवान शालिग्राम का विवाह करवाया जाता है.

तुलसी विवाह २०१९ (Tulsi Vivah, Dev Uthani Ekadashi 2019): भगवान विष्णु ने अपनी भक्त वृंदा के साथ छल किया लेकिन उसके श्राप का मान रखा...

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  • Last Updated: November 8, 2019, 4:10 AM IST
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तुलसी विवाह २०१९ (Tulsi Vivah, Dev Uthani Ekadashi 2019): तुलसी विवाह कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि यानी देव प्रबोधनी एकादशी के दिन मनाया जाता है. इस बार तुलसी विवाह की दो तिथियां सामने आ रही है. कुछ विद्वानों का मत है कि तुलसी विवाह 8 नवंबर को है और कुछ का कहना है कि तुलसी विवाह 9 नवंबर को है. मान्यता है कि जो लोग कन्या सुख से वंचित होते हैं यदि वो इस दिन भगवान शालिग्राम से तुलसी जी का विवाह करें तो उन्हें कन्या दान के बराबर फल की प्राप्ति होती है. इस दिन से लोग सभी शुभ कामों की शुरुआत कर सकते हैं. कथा के बिना तुलसी विवाह अधूरा है. आइए जानते हैं तुलसी विवाह की कथा ...

तुलसी विवाह की कथा:
बहुत पुराने समय में जलंधर नाम का दुष्ट राक्षस रहता था, वृंदा नाम की एक लड़की से उसका विवाह हुआ. वृंदा भगवान विष्णु की भक्त थी और दिन भर उनकी पूजा अर्चना करती रहती थी. वह अपने पति से भी बेहद प्रेम करती थी और उनके प्रति भी समर्पित थी.




 

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वृंदा की भक्ति भगवान के प्रति इतनी गहरी थी कि उसके पति जलंधर को यह वरदान प्राप्त था कि उसे कभी कोई हरा नहीं पाएगा. वह अजेय रहेगा. यही वजह है कि जलंधर काफी अहंकारी और अत्याचारी हो गया था. यहां तक कि वह अप्सराओं और देव कन्याओं को भी तंग करने लगा था. स्वर्ग के सभी देवी-देवताओं ने इससे तंग आकर भगवान विष्णु से मदद की गुहार लगाई.

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देवताओं की अनुनय पर भगवान विष्णु ने जलंधर का झूठा रूप धारण कर भक्त वृंदा के पतिव्रत धर्म को तोड़ दिया. ऐसा होने से जलंधर काफी कमजोर हो गया और देवताओं के साथ युद्ध में उनकी मृत्यु हो गई, लेकिन जब पति की मौत के शोक में व्याकुल वृंदा को जब भगवान विष्णु के इस छल का पता चला तब गुस्से में आकर उसने उन्हें शिलाखंड बन जाने का श्राप दे दिया.

लेकिन देवी देवताओं ने वृंदा से विनती की कि वे अपना श्राप वापस ले लें. वृंदा ने अपना श्राप वापस ले लिया, लेकिन भगवान विष्णु ने अपनी भक्त वृंदा के श्राप का मान रखने के लिए एक पत्थर में अपना अंश प्रकट किया, इसे ही शालिग्राम कहा जाता है.

लेकिन पति वियोग से दुखी वृंदा का दुःख कम नहीं हुआ और श्राप देने और वापस लेने के बाद बाद भी वे अपने पति के शव के साथ सती हो गई. जहां वृंदा की चिता की राख थी, वहां पवित्र तुलसी का पौधा उत्पन्न हो गया. देवताओं ने पतिव्रता वृंदा का मान रखने के लिए तुलसी का विवाह भगवान विष्णु के ही दूसरे रूप शालिग्राम से करवाया. जिस दिन ऐसा हुआ उस दिन कार्तिक शुक्ल एकादशी यानी देव प्रबोधनी एकादशी थी. तभी से कार्तिक शुक्ल एकादशी के दिन तुलसी और शालिग्राम का विवाह कराने की परंपरा चली आ रही है.

Disclaimer: इस लेख में दी गई जानकारियां और सूचनाएं सामान्य मान्यताओं पर आधारित हैं. Hindi news18 इनकी पुष्टि नहीं करता है. इन पर अमल करने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से संपर्क करें.

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First published: November 8, 2019, 4:10 AM IST
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