उज्‍जैन महाकाल: क्या है भस्मार्ती का रहस्य और क्यों है 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक जहां है भस्म आरती की मान्यता

महा शिवरात्रि के दिन बाबा महाकाल को दूल्हे की तरह सजाया जाता है

महा शिवरात्रि के दिन बाबा महाकाल को दूल्हे की तरह सजाया जाता है

Madhya Pradesh Latest News: वर्ष भर में एक बार दिन में होने वाली भस्म आरती भी महा शिवरात्रि के दूसरे दिन होती है, जिसमे बड़ी संख्या में श्रद्धालु सम्मलित होते है. मान्यता महाकाल राजा के होते हुए कोई राजा रात नहीं रुक सकता

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विश्व प्रसिद्ध ज्योतिलिंग धार्मिक नगरी जिसे हर कोई अलग अलग नामों से भी जानता है अवंतिका, अवंतिकापुरी, कनकश्रन्गा, उज्जैनी जैसे और भी कई नाम पुराणों में दिए गए है. देशभर के बारह ज्योतिर्लिंगों में 'महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग' की इस नगरी का अपना एक अलग महत्व है, क्योकि यहां बाबा महाकाल को तांत्रिक क्रिया अनुसार, दक्षिण मुखी पूजा प्राप्त है और विश्व भर में बाबा ही दक्षिण मुख में विराजमान है. महाकाल के इस मंदिर का अधिक महत्व इसलिए भी है क्योंकि यहां ही तड़के 4 बजे भस्म आरती करने का विधान है. भस्मार्ती को मंगला आरती नाम भी दिया गया है. यह प्रचलित मान्यता थी कि श्मशान कि ताजी चिता की भस्म से ही भस्म आरती की जाती थी. ,

वर्तमान में गाय के गोबर से बने गए कंडो की भस्म से भस्म आरती की जाती है. एक महत्वपूर्ण तथ्य यह भी है कि भगवान शिव को भस्म धारण करते हुए केवल पुरुष ही देखते है. महिलाओं को उस वक्त घुंघट लेना अनिवार्य है, जिन पुरुषों ने बिना सीला हुआ सोला पहना हो वही भस्म आरती से पहले भगवन शिव को को जल चढ़ाकर छूकर दर्शन कर सकते है. कहा जाता है कि जो महाकाल का भक्त है उसका काल भी कुछ नहीं बिगाड़ सकता, साथ ही प्रत्येक वर्ष के हर एक त्योहार बाबा के प्रांगण में ही सर्वप्रथम मनाने की परंपरा है.

'आकाशे तारकं लिंगं पाताले हाटकेश्वरम्।

भूलोके च महाकालो लिंड्गत्रय नमोस्तुते'
इसका तात्पर्य यह है कि आकाश में तारक लिंग, पाताल में हाटकेश्वर लिंग तथा पृथ्वी पर महाकालेश्वर ही मान्य शिवलिंग है, महाकाल मंदिर की अनादी काल से ही उत्तपत्ति मानी गई है. मान्यता है की महाकाल मंदिर में शिव लिंग स्वयं भू है, विश्व भर में कालगणना की नगरी कहे जाने वाली उज्जैन में मान्यता है की भगवन महाकाल ही समय को लागातर चलाते है और कालभैरव काल का नाश करते है. महाकाल मंदिर में सामन्य तह चार आरती होती है, जिसमें से अल सुबह होने वाली भस्म आरती के लिए श्रद्धालु दूर-दूर से उज्जैन पंहुचते है. कहते हैं यहां आने वाले श्रद्धालु जो भी वर इच्छा भगवान् महाकाल से मांगते है वो हर इच्छा भगवन पूरी करते है. इसी के चलते हजारों संख्या में श्रद्धालु रोजाना महाकाल मंदिर पंहुचते है और महाकाल मंदिर में सभी हिन्दू त्यौहार सबसे पहले बनाने की परम्परा भी है और विश्व भर में भगवन शिव के विवाह उत्सव से पूर्व 9 दिन बाबा का अलग-अलग रूप में श्रृंगार किया जाता है, जिसको शिवनवरात्र कहा जाता है.

उज्जैन में कोई मुख्यमंत्री रात नहीं गुजारते हैं

आखिर में महा शिवरात्रि के दिन बाबा महाकाल को दूल्हे की तरह सजाया जाता है. वर्ष भर में एक बार दिन में होने वाली भस्म आरती भी महा शिवरात्रि के दूसरे दिन होती है, जिसमे बड़ी संख्या में श्रद्धालु सम्मलित होते है. मान्यता महाकाल राजा के होते हुए कोई राजा रात नहीं रुक सकता. मान्यता है की उज्जैन शहर में एक ही राजा हो सकता है और वो राजा है महाकाल हैं. यहां कोई दूसरा राजा रात नहीं रुक सकता, क्योंकि उनसे बड़ा इस श्रष्टि में कोई नहीं तो आम आदमी की बिसात ही क्या? ये किवंद्तिया है की कोई राजा रात रुकेगा तो उसकी मौत हो जाएगी या कोई राजनेता रुकेगा तो उसकी सत्ता चली जाएगी. इस के चलते उज्जैन में मुख्यमंत्री भी रात नहीं गुजारते है. हालांकि यह मान्यता भी है की अगर रात गुजराना ही पड़े ते शहर से 15 किमी बाहर रात गुजार सकते है.



जानें क्‍या है चुनाव में हार वाली अंध विश्वास से जुड़ी कहानी

वहीं एक और अंध विश्वास से जुड़ी कहानी है की बारह साल में एक बार लगने वाला सिह्स्थ का मेला जो भी सरकार के कार्यकाल में होता है. वो सरकार अगले चुनाव में हार जाती है. वह बताते है की यह महज एक इत्तेफाक है और कुछ नहीं है. हरिद्वार, इलहाबाद, नासिक और उज्जैन में समुद्र मंथन के दौरान अमृत की बूंदे गिरी थी, जिसके बाद से ही सभी जगह कुम्भ का मेला भरता है लेकिन उज्जैन में इस मेला का नाम सिंहस्थ है वो इसलिए क्‍यूंक‍ि उज्जैन में 12 साल में लगने वाले इस मेले का आयोजन सिंह राशि में होता है इसलिए इसे सिंहस्थ और बाकी तीनों जगह कुम्भ राशि में होता है. इसलिए कुम्भ का मेला कहा जाता है, सिंहस्थ मेले में सभी 13 प्रमुख अखाड़े हिस्सा लेते है और बारी-बारी से तय किये क्रम के अनुसार शाही और और सामन्य दिनों में शिप्रा नदी में दुबकी लगाते है, जिन्हें देखने के लिए करोडों श्रद्धालु उज्जैन पंहुचते है. महाकाल में खास है महाशिवरात्रि पर्व महाशिवरात्रि पर्व उज्जैन में इसलिए भी ख़ास होता है क्‍यूंक‍ि यहां 9 दिनों तक शिवनवरात्रि मानाने की परम्परा है जहां सबसे पहले दिन भगवान् कोटेश्वर को हल्दी का लेप लगाया जाता है.

पूरे शास्त्रोक विधि से निर्मित हल्दी उबटन को तैयार किया जा रहा है. हल्दी के तैयार होने के बाद भगवान् कोटेश्वर का विधि विधान से पूजन कर हल्दी अर्पित की जाती है. भगवान कोटेश्वर को स्थान देवता माना जाता है इसी कारण उत्सव के प्रारम्भ में नौ दिवसों तक प्रतिदिन विधि विधान से पूजन में हल्दी अर्पित की जाती है. इसके बाद चन्दन केसर उबटन अर्पित किया जाता है भगवान् महाकाल को. उत्सव के पहले दिन से नित्य रुद्राभिषेक किया जाता है. इसके बाद भगवान महाकाल का चन्दन और वस्त्रों से मनमोहक श्रृंगार किया जाता है. इसी तरह शिवनवरात्र के दूसरे दिन चन्दन केसर सुगन्धित द्रव्यों से अभिषेक पूजन के बाद भगवान महाकाल अपने भक्तों को अर्धनारीश्वर स्वरूप के साथ शेषनाग स्वरुप में दर्शन देते हैं. इसी प्रकार उत्सव के तीसरे दिन भगवान महाकाल का घटाटोप श्रृंगार, चौथे दिन छबीना श्रृंगार, पांचवे दिन होलकर श्रृंगार,छठवे दिन मनमहेश श्रृंगार,सातवे दिन उमा महेश श्रृंगार,और आठवे दिन शिव तांडव श्रृंगार किया जाता है जिनके दर्शनों को पाकर दर्शनार्थी अभिभूत होते है. भगवान महाकाल के नौ दिवसीय शिव उत्सव में डूबा हुआ नवरंग के जैसा दिखाई पड़ता है.

महाशिवरात्रि के दिन पंडितों और पुरोहितो द्वारा पंचामृत के साथ फलों के रस और सुगंधित द्रव्यों से भगवान महाकाल का अभिषेक किया जाता है. निरंतर चलते अभिषेक में मन्त्रों की ध्वनि से पूरा वातावरण चेतनायुक्त और शिवमय बन जाता है. हर हर महादेव, जय श्री महाकाल के उद्घोशों से गूंजता है मंदिर का हर कोना भस्म आरती के बारे में जानिए.

मंदिर के मुख्य पुजारी आशीष गुरु बताते है क‍ि भस्ममार्ति का एक और नाम मंगला आरती भी दिया गया है मंगला आरती में बाबा हर रोज निराकार से साकार रूप धारण करते है. बाबा भस्म को संसार को नाशवान होने का संदेश देने के लिए लगाते है नाशवान का संदेश देने के लिए बाबा ताजी भस्म शरीर पर धारण करते है. गाय के गौबर का जो उबला होता है उसकी भस्म बाबा को अर्पण की जाती है. बाबा को जब भस्म अर्पण की जाती है तो 5 मंत्रों के उच्चार के साथ कि जाती है और ये 5 मंत्र हमारे शरीर के तत्व है, इसके उच्चार के साथ ही व्यक्ति को मोक्ष की प्राप्ति हो जाती है. पुजारी ने चिता की भस्म का वर्णन करते हुए बताया कि बाबा का निवास शमशान में है बाबा शमशान में होते है तो ही चिता की भस्म अर्पित की जाती है, यहां पर बाबा वन में विराजमान है इसलिए गाय के गौबर की राख से बाबा का श्रृंगार किया जाता है.
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