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Vishweshwar Vrat Katha: भगवान शिव को समर्पित है विश्वेश्वर व्रत, पढ़ें व्रत कथा

विश्वेश्वर भोले शंकर भगवान शिव को कहा जाता है
विश्वेश्वर भोले शंकर भगवान शिव को कहा जाता है

Vishweshwar Vrat Katha: लिंग के रूप में भगवान शिव उस स्थान पर प्रकट हुए, और इस तरह से इस स्थान पर बने मंदिर का नाम येल्लुरु विश्वेश्वर मंदिर पड़ा. लिंग पर पड़ा वह निशान अभी भी देखा जा सकता है.

  • News18Hindi
  • Last Updated: November 28, 2020, 7:02 AM IST
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Vishweshwar Vrat Katha: आज 28 नवंबर को विश्वेश्वर व्रत है. विश्वेश्वर भोले शंकर भगवान शिव को कहा जाता है. कर्नाटक में भगवान विश्वेश्वर मंदिर, येलुरु श्री विश्वेश्वर मंदिर के रूप में प्रसिद्ध है. यह मंदिर भगवान शिव को समर्पित है. यह मंदिर महाथोबारा येलुरु श्री विश्वेश्वर मंदिर के नाम से भी प्रसिद्ध है. धार्मिक पुराणों में, भगवान शिव को विश्वनाथ भी कहा गया है. यही कारण है कि काशी विश्वनाथ मंदिर के नाम से प्रसिद्ध भगवान विश्वेश्वर के 12वें ज्योतिर्लिंग का नाम रखा गया है. पढ़ें विश्वेश्वर व्रत की कथा...

विश्वेश्वर व्रत कथा:
पौराणिक कथाओं के अनुसार, प्राचीन काल में, कुथार राजवंश के एक शूद्र राजा, जिसे कुंडा राजा के रूप में भी जाना जाता था, ने एक बार भार्गव मुनि को अपने साम्राज्य में आमंत्रित किया था. हालांकि, भार्गव मुनि ने इसे यह कहते हुए अस्वीकार कर दिया कि राज्य में मंदिरों और पवित्र नदियों की उपस्थिति का अभाव है.

कुंड राजा इस बात से इतने निराश हो गए कि उन्होनें अपने किसी सहायक के भरोसे राज्य छोड़ दिया और भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए एक महान यज्ञ करने गंगा नदी के तट पर चले गए. कुंडा राजा की भक्ति से प्रसन्न होकर, भगवान शिव उनके राज्य में रहने की इच्छा से सहमत हुए.
जब भगवान शिव कुंडा राजा के राज्य में निवास कर रहे थे, तो एक आदिवासी महिला जंगल में खोए हुए बेटे की तलाश कर रही थी, उसने अपनी तलवार का इस्तेमाल एक कंद के पेड़ को काटने के लिए किया और उसमें से खून बहने लगा. तब उसे ऐसा लगा की वह कंद नहीं उसका पुत्र था और उसने अपने बेटे का नाम ‘येलु' पुकारते हुए जोर से रोना शुरू कर दिया.



उस क्षण में, लिंग के रूप में भगवान शिव उस स्थान पर प्रकट हुए, और इस तरह से इस स्थान पर बने मंदिर का नाम येल्लुरु विश्वेश्वर मंदिर पड़ा. लिंग पर पड़ा वह निशान अभी भी देखा जा सकता है. ऐसा माना जाता है कि कुंडा राजा द्वारा उस पर नारियल का पानी डालने के बाद ही कंद का खून बहना बंद हुआ. भगवान शिव को नारियल पानी या नारियल का तेल चढ़ाना इस मंदिर का एक महत्वपूर्ण अनुष्ठान है. भगवान को चढ़ाया जाने वाला तेल मंदिर में दीपक जलाने के लिए रखा जाता है.

भीष्म पंचक के दौरान पांच दिन तक चलने वाले उत्सव में तुलसी विवाह भी शामिल है, जो हिंदू धर्म में एक महत्वपूर्ण त्योहार है. विश्वेश्वरा व्रत के अगले दिन वैकुंठ चतुर्दशी मनाई जाती है, और इस दिन भगवान शिव के भक्त पवित्र गंगा नदी के घाटों पर पवित्र मणिकर्णिका स्नान करते हैं. (Disclaimer: इस लेख में दी गई जानकारियां और सूचनाएं सामान्य मान्यताओं पर आधारित हैं. Hindi news18 इनकी पुष्टि नहीं करता है. इन पर अमल करने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से संपर्क करें.)
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