कहां गया था भगवान गणेश जी का असली मस्तक? जानें इसके पीछे की पौराणिक कथा

कोई भी शुभ कार्य करने से पहले भगवान गणेश की पूजा की जानी जरूरी है. Image-shutterstock.com

कोई भी शुभ कार्य करने से पहले भगवान गणेश की पूजा की जानी जरूरी है. Image-shutterstock.com

Lord Ganesha Puja: भगवान गणेश सभी लोगों के दुखों को हरते हैं. कहा जाता है कि प्रथम पूजनीय गणेश जी का श्रद्धा भाव से पूजन करने से घर में सुख समृद्धि तो आती है और घर धन धान्य से पूर्ण हो जाता है.

  • News18Hindi
  • Last Updated: April 14, 2021, 7:33 AM IST
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Lord Ganesha Puja: बुधवार (Wednesday) को पूरे विधि विधान के साथ भगवान गणेश (Lord Ganesha) की पूजा की जाती है. भगवान गणेश भक्तों पर प्रसन्न होकर उनके दुखों को हरते हैं और सभी की मनोकामनाएं पूरी करते हैं. हिंदू मान्यताओं के अनुसार कोई भी शुभ कार्य करने से पहले भगवान गणेश की पूजा की जानी जरूरी है. भगवान गणेश सभी लोगों के दुखों को हरते हैं. कहा जाता है कि प्रथम पूजनीय गणेश जी का श्रद्धा भाव से पूजन करने से घर में सुख समृद्धि तो आती है और घर धन धान्य से पूर्ण हो जाता है. उनके बिना कोई भी पूजा पूर्ण नहीं होती है, लेकिन क्या आप जानते हैं कि उनका असली मस्तक कहां गया. उनका मुख तो गजमुख है लेकिन असली मुख फिर कहां है.

धार्मिक शास्त्रों में गणेश जी का वास्तविक मुख चंद्रमंडल में जाने का उल्लेख मिलता है. भगवान गणेश गजमुख, गजानन के नाम से जाने जाते हैं, क्योंकि उनका मुख गज यानी हाथी का है. भगवान गणेश का यह स्वरूप विलक्षण और बड़ा ही मंगलकारी है. आपने भी श्रीगणेश के गजानन बनने से जुड़े पौराणिक प्रसंग सुने और पढ़े होंगे. आइए जानते हैं भगवान गणेश जी के असली मस्तक की रोचक पौराणिक कथाओं के बारे में.

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पौराणिक कथा
श्री गणेश के जन्म के सम्बन्ध में दो पौराणिक कथाएं हैं. पहली कथा में कहा जाता है कि माता पार्वती ने श्रीगणेश को जन्म दिया, उस समय इन्द्र, चन्द्र सहित सारे देवी-देवता उनके दर्शन की इच्छा से उपस्थित हुए. इसी दौरान शनिदेव भी वहां आए. कहते हैं कि शनिदेव की दृष्टि जहां पड़ जाती है वहां हानि या अनिष्ट होना निश्चित होता है. शनिदेव की दृष्टि पड़ने के कारण श्रीगणेश भगवान का मस्तक अलग होकर चंद्रमंडल में चला गया. इसके बाद भगवान शंकर ने बच्चे के शीश के स्थान पर गजमुख लगा दिया.

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दूसरी कथा के अनुसार, माता पार्वती ने अपने तन के मैल से श्रीगणेश का स्वरूप तैयार किया और स्नान होने तक गणेश को द्वार पर पहरा देकर किसी को भी अंदर प्रवेश से रोकने का आदेश दिया. इसी दौरान वहां आए भगवान शंकर को जब श्रीगणेश ने अंदर जाने से रोका, तो अनजाने में भगवान शंकर कुपित हो गए और श्रीगणेश का मस्तक काट दिया, जो चन्द्र लोक में चला गया. बाद में भगवान शंकर ने रुष्ट पार्वती को मनाने के लिए कटे मस्तक के स्थान पर गजमुख लगा दिया था. ऐसी मान्यता है कि श्रीगणेश का असल मस्तक चन्द्रमण्डल में है. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार पूरे साल में संकष्टी चतुर्थी के 13 व्रत रखे जाते हैं. इन तिथियों पर चन्द्रदर्शन व अर्घ्य देकर श्रीगणेश की उपासना व भक्ति द्वारा संकटनाश व मंगल कामना की जाती है.(Disclaimer: इस लेख में दी गई जानकारियां और सूचनाएं मान्यताओं पर आधारित हैं. Hindi news18 इनकी पुष्टि नहीं करता है. इन पर अमल करने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से संपर्क करें.)
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