कांवड़िये हरिद्वार ही क्यों जाते हैं कांवड़ लेने? आखिर क्यों होती है कांवड़ यात्रा

कांवड़िये हरिद्वार ही क्यों जाते हैं कांवड़ लेने? आखिर क्यों होती है कांवड़ यात्रा
कांवड यात्रा को इस साल कोरोना महामारी के कारण रद्द कर दिया गया है.

इस साल 6 जुलाई से शुरू होने वाली कांवड यात्रा को कोरोना महामारी (Corona epidemic) के कारण रद्द कर दिया है. कांवड यात्रा हर साल क्यों होती हैं और हरिद्वार (Haridwar) ही जल लेने कांवडिये क्यों जाते हैं. आज हम इस आर्टिकल में ऐसे कई सवालों के जवाब देंगे.

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देश में कांवड़ (kawad) यात्रा का खास महत्व है. हर साल लाखों श्रद्धालु पैदल हरिद्वार (Haridwar) से गंगाजल लेकर देश के कोन-कोने में पहुंचते हैं और शिवलिंग में गंगाजल चढ़ाते हैं. भक्त अपनी मनोकामना को पूरा करने के लिए ऐसा करते हैं. हर साल कांवड यात्रा सावन से शुरू होती थी , इस बार सावन माह 6 जुलाई से शुरू होगा लेकिन कोरोना महामारी (Corona epidemic) के कारण सरकार ने कांवड यात्रा को रद्द कर दिया है. इस यात्रा को लेकर आपके मन में कभी सवाल आया होगा कि आखिर कांवड यात्रा हर साल क्यों होती है और भक्त हरिद्वार ही गंगाजल लेने क्यों जाते है? ऐसे ही कई सारे सवालों के जवाब आज हम आपको इस आर्टिकल में देंगे...

कांवड़िये गंगा जल लेने हरिद्वार क्यों जाते हैं?
कांवड़ यात्रा को लेकर मान्यता है कि पूरे श्रावण महीने में भगवान शिव अपनी ससुराल राजा दक्ष की नगरी कनखल, हरिद्वार में रहे हैं. इस समय भगवान विष्णु के शयन में जाने के कारण तीनों लोक की देखभाल भगवान शिव ही करते हैं. यही वजह है कि कांवड़िये श्रावण माह में गंगाजल लेने हरिद्वार आते हैं.

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क्यों होती है कांवड़ यात्रा


सावन में हर साल लाखों कांवड़िए हरिद्वार जाते हैं और कांवड़ में गंगाजल भरकर पैदल यात्रा शुरू करते हैं. कांवड़िये अपने कांवड़ में जो गंगाजल भरते हैं, उससे सावन की चतुर्दशी पर भगवान शिव का अभिषेक किया जाता है. मान्यता है कि समुद्र मंथन के दौरान समुद्र से विष निकला था, जिसे जगत कल्याण के लिए भगवान शंकर ने पी लिया था, जिसके बाद भगवान शिव का गला नीला पड़ गया और तभी से भगवान शिव नीलकंठ कहलाने लगे. भगवान शिव के विष का सेवन करने से दुनिया तो बच गई, लेकिन भगवान शिव का शरीर जलने लगा. ऐसे में देवताओं ने उन पर जल अर्पित करना शुरू कर दिया. इसी मान्यता के तहत कांवड़ यात्रा शुरू हुई.

कांवड़ यात्रा को श्रीराम ने शुरू किया था
ऐसी मान्यता है कि भगवान राम पहले कांवड़िया थे. कहते हैं श्रीराम ने झारखंड के सुल्तानगंज से कांवड़ में गंगाजल लाकर बाबाधाम के शिवलिंग का जलाभिषेक किया था.

रावण था पहला कांवड़िया
पुराणों के अनुसार इस यात्रा शुरुआत समुद्र मंथन के समय हुई थी. मंथन से निकले विष को पीने की वजह से शिव जी का कंठ नीला पड़ गया था और तब से वह नीलकंठ कहलाए. इसी के साथ विष का बुरा असर भी शिव पर पड़ा. विष के प्रभाव को दूर करने के लिए शिवभक्त रावण ने तप किया. इसके बाद दशानन कांवड़ में जल भरकर लाया और शिवजी का जलाभिषेक किया. इसके बाद शिव जी विष के प्रभाव से मुक्त हुए. कहते हैं तभी से कांवड़ यात्रा शुरू हुई है.

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इस साल नहीं होगी कांवड यात्रा
कोरोना वायरस महामारी के कारण साल 2020 में कांवड यात्रा नहीं होगी. उत्तराखंड सरकार ने पड़ोसी राज्यों को गंगाजल उपलब्ध कराने के लिए कहा है. पीतल के बड़े कलशों में हर की पैड़ी से गंगाजल भरकर पड़ोसी राज्यों को दिया जाएगा. इससे शिव भक्तों को उनके घर के पास ही गंगा जल उपलब्ध हो सकेगा. उत्तराखंड के मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने उत्तर प्रदेश, हरियाणा, पंजाब, राजस्थान और हिमाचल के मुख्यमंत्रियों से इस बारे में बात की है. बता दें कि इस साल 6 जुलाई से कांवड़ यात्रा होनी थी, जिसको कोरोना वायरस के कारण रद्द कर दिया गया है. (Disclaimer: इस लेख में दी गई जानकारियां और सूचनाएं सामान्य जानकारी पर आधारित हैं. Hindi news18 इनकी पुष्टि नहीं करता है. इन पर अमल करने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से संपर्क करें).
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