पढ़ें आई.ए.एस. की तैयारी में 'मानसिक मजबूती का जादू' क्या रोल निभाता है

आईएएस इतना आसान काम नहीं है कि आप इसे पार्ट टाइम या एक्स्ट्रा टाइम में कर सकें.

जब आप एक बार दृढ़ निर्णय कर लेंगे, तो सबसे बड़ी और महत्वपूर्ण बात यह होगी कि आपके दिमाग में बहानेबाजी के झाड-झंखाड़ उगने और पनपने बंद हो जाएँगे.

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नई दिल्ली. मानसिक मजबूती के बिना आईएएस की तैयारी न केवल दूर की कौड़ी ही होती, बल्कि यदि एकदम असंभव नहीं तो बहुत कठिन ज़रूर हो होती है. इसके अभाव में, मानसिक मजबूती के अभाव में, दिमाग ‘बहानों की उपजस्थली‘ बन जाएगा और आप हर उस काम को टालने लगते है. जिसे किया जाना ज़रूरी होता है. उदाहरण के लिए, एक लड़की ने मुझसे पूछा कि ‘सर, आपकी क्लास कहाँ लगती है?‘ मेरे बताने के बाद उसका उत्तर था कि ‘सर, मैं तो ज्वॉइन नहीं कर सकती.‘ क्या आप जानना चाहेंगे कि क्यों? इसलिए नहीं कि उसके लिए फीस ज्यादा थी या उसके पास टाइम नहीं था, या उसे क्लास की ज़रूरत नहीं थी. कारण केवल यह था कि मेरी क्लास और उसके घर के बीच तीन किलोमीटर का फासला था. अब आप इसे क्या कहेंगे ?

आईएएस की तैयारी करनी कैसे चाहिए
नई दिल्ली में मैं हर महीने आईएएस के प्रतियोगियों को तीन दिन का मार्गदर्शन देने लगा, कि उन्हें आईएएस की तैयारी करनी कैसे चाहिए. पूरे देश के विद्यार्थी इसमें आने लगे. बहुत से लोग मुझसे फोन करके पूछते कि ‘सर, आपकी अगली क्लास कब लगेगी?‘ मैं यह जानते हुए भी कि मेरी अगली क्लास अगले महीने लगने वाली है, उनसे कहता था, ‘मुझे मालूम नहीं‘, क्योंकि मैं जानता था कि अगले महीने भी उनका फिर से यही प्रश्न होगा कि ‘सर, आपकी अगली क्लास कब लगेगी ?‘ क्या इस तरह के प्रश्नों के सिलसिले का कोई अंत होता है ? कभी नहीं.

‘जो होना चाहिए‘ और ‘जो मैं चाह रहा हूँ होना चाहिए‘ में
आइडेंटीफाइ कीजिए, पहचानिए कि वह कौन है, जो आपसे इस तरह की बातें करवा रहा है, जैसी कि उस लड़की ने की और जो अक्सर ज्यादातर विद्यार्थी करते हैं. मुश्किल नहीं है इसे पहचानना. बहुत जरूरी है इसे पहचानना, अन्यथा यह आपको हमेशा गच्चे देता रहेगा. आपको लगेगा कि आप तो वह सब कुछ कर रहे हैं, जो किये जाने चाहिए. जबकि आप कर वह रहे होते हैं, जो आप करना चाहते हैं. इन दोनों में बहुत फर्क है- ‘जो होना चाहिए‘ और ‘जो मैं चाह रहा हूँ कि होना चाहिए‘ में. और यही फर्क आपकी सफलता और असफलता का निर्धारण कर देता है. आईएएस की परीक्षा को इस बात से कुछ भी लेना-देना नहीं है कि आप क्या चाहते हैं. वह तो केवल यह जानती है कि ‘वह क्या चाहती है‘.

टकराव केवल मानसिक मज़बूती से ही दूर
यूपीएससी (जो आईएएस की परीक्षा लेता है) के चाहने और आपके चाहने के बीच न केवल एक खाई ही है, बल्कि एक टकराव भी है. इस खाई को, इस टकराव को केवल मानसिक मज़बूती से ही दूर किया जा सकता है. मुझे तो अन्य कोई रास्ता दिखाई नहीं देता.

वातावरण धीरे-धीरे आपके अनुकूल
एक बार जब आपके पास यह मानसिक मजबूती आ जाती है, तो विश्वास कीजिए कि आपके अन्दर अपने-आप ही कुछ ऐसा घटने लगता है, होने लगता है कि आप स्वयं को अपने लक्ष्य के करीब महसूस करने लगते हैं. वास्तव में, इसके माध्यम से रहस्य का सिद्धांत काम करने लगता है और आप पाते हैं कि आपके चारों तरफ का वातावरण धीरे-धीरे आपके अनुकूल हो रहा है. इसी बात को लेखक पाएलो कोएलो ने अपने उपन्यास ‘दि अलकेमिस्ट‘ में इस तरह कहा है कि “पूरी कायनात आपको सफल बनाने के लिए षड्यंत्र रचने लगती है.” अन्यथा तो आपको यही लगता है कि सब कुछ उल्टा-पुल्टा हो रहा है और पूरी दुनिया आपकी दुश्मन बनी हुई है.

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जब आप एक बार दृढ़ निर्णय कर लेंगे, तो सबसे बड़ी और महत्वपूर्ण बात यह होगी कि आपके दिमाग में बहानेबाजी के झाड-झंखाड़ उगने और पनपने बंद हो जाएँगे. बस एक ही बात दिमाग में रहेगी कि ‘करना है, तो करना है.‘ आईएएस की तैयारी आपकी दिनचर्या की सूची में पहले स्थान पर आ जाएगी, न कि यह कि ‘जब टाइम मिलेगा, तब देखेंगे.‘ आईएएस इतना आसान काम नहीं है कि आप इसे पार्ट टाइम या एक्स्ट्रा टाइम में कर सकें. (लेखक डॉ० विजय अग्रवाल पूर्व सिविल सर्वेंट और afeias के संस्थापक हैं.)

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