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Know Your Army Heroes: जब अब्‍दुल हमीद के लिए बीबी की 'गुजारिश' बन गई 'आखिरी ख्‍वाहिश'

India Pakistan War 1965: कंपनी क्वार्टर मास्टर हवलदार अब्दुल हमीद ने 10 सितंबर 1965 को देश के लिए अपने प्राणों का सर्वोच्‍च बलिदान दे दिया. उन्‍हें 10 सितंबर 1965 को ही वीरता के सर्वोच्‍च पुरस्‍कार परमवीर चक्र से मरणोपरांत सम्‍मानित किया गया था.

  • News18Hindi
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नई दिल्‍ली. घर के कामों में मशगूल रसूलन का ध्‍यान अचानक घर के दरवाजे पर हो रही थपथप से टूटता है. घर की चौखट पर खड़ा एक पैगाम रसूलन के शौहर कंपनी क्वार्टर मास्टर हवलदार अब्दुल हमीद मसऊदी का इंतजार कर रहा था. यह पैगाम पंजाब के खेमकरण सेक्‍टर से आया था, जहां पाकिस्‍तानी सेना पैटन टैंकों के साथ बढ़ती चली आ रही थी. पैगाम मिलते ही अब्‍दुल हमीद जंग में जाने की तैयारी में जुट जाते हैं और रसूलन मन में मची उधल-पुथल के साथ उनका हाथ बटाने लगती हैं. रसूलन के मन में चल रही उथल-पुथल उस वक्‍त बेचैनी में बदल जाती है, जब बिस्‍तर बंद बांधते वक्‍त उसकी बेल्‍ट अचानक अब्‍दुल हमीद के हाथों टूट जाती है. रसूलन को ऐसा लगता है, जैसे बहुत बड़ा कोई अपशगुन हो गया हो.

घबराए मन से रसूलन अब्‍दुल हमीद से बोलती है – सुनिए, बिस्‍तर बंद का पट्टा टूटना अच्‍छी बात नहीं, आप रुक जाइए, मत जाइए. अब्‍दुल हमीद की तरफ से कोई प्रतिक्रिया न पाकर वह एक बार फिर कोशिश करती है और बोलती है – अच्‍छा आज मत जाइए, मेरी बात मान लीजिए कल चले जाइएगा. रसूलन की गुजारिश का अब्‍दुल हमीद के पास कोई जवाब नही था. मुल्‍क में आई विपदा के सामने उन्‍हें यह अपशगुन समझ में ही नहीं आ रहा था. बड़ी मुश्किल से अब्‍दुल हमीद ने अपनी बेगम रसूलन को समझाया और ये कहिए समझाते हुए अपनी ‘रिक्‍वायललेस गन से लैस’ (आरसीएल) जीप में सवार हो गए. अब्‍दुल हमीद की जीप अब पंजाब के तरणतारण जिले के अंतर्गत आने वाले खेमकरण सेक्‍टर की तरफ बढ़ चली थी.

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असल उताड़ में पाकिस्‍तानी सेना का हमला
अमेरिकी से मिले पैटन टैंकों के साथ पाकिस्‍तानी सेना खेमकरण सेक्‍टर की तरफ बढ़ती चली आ रही थी. पाकिस्‍तानी सेना को मुंहतोड़ जवाब देने के लिए भारतीय सेना के वीर जवान तैयार खड़े थे. पैटन टैंकों के सामने भले ही अब्‍दुल हमीद की रिक्‍वायललेस गन से लैस जीप खिलौने की तरह थी, बावजद इसके वे पूरे आत्‍मविश्‍वास और बहादुरी के साथ दुश्‍मन का मुकाबला करने के लिए खड़े थे. 8 सितंबर 1965 की रात पाकिस्‍तानी सेना ने खेम करण सेक्‍टर के असल उताड़ गांव में हमला बोल दिया. आलम यह था कि कि एक तरफ पैटन टैंक लगातार आग बरसात रहे थे, वहीं दूसरी तरह पाकिस्‍तान की तरफ से हो रही आर्टलरी फायरिंग ने चुनौती को कई गुना बढ़ा दिया था. इस तमाम दुश्‍वारियो के बावजूद भारतीय सेना ने दुश्‍मन सेना को मुंहतोड़ जवाब देना शुरू कर दिया.

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पैंटन टैंक के साथ ध्‍वस्‍त हुआ पाक का गुरूर
पाकिस्‍तान की सैन्‍य ताकत को देखते हुए अब्‍दुल हमीद ने अपनी रणनीति तैयार की. रणनीति के तहत, उन्‍होंने अपनी रिक्‍वायललेस गन से लैस जीप के साथ गन्‍ने के खेत से मोर्चा संभाला. चूंकि रिक्‍वायललेस गन से लैस जीप और पैटन टैंक के बीच कोई मुकाबला नहीं हो सकता था, लिहाजा अपने हर वार को असरदार बनाने के लिए उन्‍होंने 30 गज की दूरी से हमला करने का फैसला किया. यही आदेश उन्‍होंने अपने साथियों को दिया. उन्‍होंने अपने साथियों से जीत पक्‍की करनी है तो हर वार अचूक हो और 30 गज की दूरी से हो. अब्‍दुल हमीद की रणनीति काम आई और उन्‍होंने अकेले एक-एक करके चार पाकिस्‍तानी पैटन टैंकों को अपनी माउंटेनगन से ध्‍वस्‍त कर दिया. पैटन टैंकों को बिखरता देख पाकिस्‍तानी सेना में भगदड़ मच गई. अब्‍दुल हमीद के कुशल नेतृत्‍व और युद्ध कौशल के चलते 8 और 9 सितंबर 1965 का दिन भारतीय सेना के नाम रहा.

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देश के लिए सर्वोच्‍च बलिदान दे गए अब्‍दुल हमीद
9 सितंबर 1965 को पाकिस्‍तानी सेना असल उताड़ के रण को छोड़कर भागती हुई नजर आई थी. 9 सितंबर की हार के बाद पाकिस्‍तानी सेना लगभग बौखला सी गई थी. अगले दिन यानी 10 सितंबर को पाकिस्‍तानी पहले से कहीं अधिक संख्‍या बल, पैटन टैंक और आर्टलरी फायर के साथ युद्ध के मैदान में कूदा था. तीन टुकडि़यों में बंटी पाकिस्‍तानी सेना लगातार टैंकों से गोलों की बरसात कर रहे थे. आलम यह था कि चारों तरफ आग ही आग नजर आ रही थी. अब दुश्‍मन और अब्‍दुल हामिद के बीच का अंतर बहुत कम हो चुका था. अचाकन एक ऐसा पल आया कि वे पाकिस्‍तानी पैटन टैंक के सामने आ गए. जिसके बाद, भारत का यह शेर अपने देश के लिए अपने प्राणों का सर्वोच्‍च बलिदान देकर शहीद हो गया. भारतीय सेना के इतिहास में यह पहली बार हुआ था, जब रिक्‍वायललेस बंदूकों के बल पर भारतीय सेना ने टैंकों और अत्‍याधुनिक हथियारों से लैस दुश्‍मन सेना की पूरी रेजिमेंट से मुकाबला किया हो.

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कंपनी क्वार्टर मास्टर हवलदार अब्दुल हमीद की अद्भुत बहादुरी, युद्ध कौशल और नेतृत्‍व क्षमता को देखते हुए उन्‍हें 10 सितंबर 1965 को मरणोपरांत देश के सर्वोच्‍च वीरता पुरस्‍कार परमवीर चक्र से सम्‍मानित किया गया था.

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