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Know Your Army Heroes: आखिरकार अब्‍दुल हमीद के प्रशस्ति पत्र में दर्ज नहीं हो पाई पूरी हकीकत!

Indo Pakistan War 1965: थल सेना मुख्‍यालय से शहीद अब्‍दुल हमीद को जारी प्रशस्ति पत्र में सिर्फ 4 पैटन टैंकों को ध्‍वस्‍त करने का जिक्र किया गया है.

  • News18Hindi
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नई दिल्‍ली. 1965 में भारत और पाकिस्‍तान के बीच हुई जंग में कंपनी क्वार्टर मास्टर हवलदार अब्दुल हमीद मसऊदी देश के लिए अपने प्राणों का सर्वोच्‍च बलिदान देकर वीरगति को प्राप्‍त हो जाते हैं. 10 सितंबर 1965 को शहीद होने वाले अब्‍दुल हमीद की शहादत साधारण नहीं थी, असल उत्ताड़ गांव में 8 और 9 सितंबर का दिन पूरी तरह से उनके नाम रहा था. अब्‍दुल हमीद ही वो जांबाज सिपाही थे, जिन्‍होंने अपनी रिक्‍वायललेस गन से अजेय कहे जाने वाले अमेरिकी पैटन टैंकों को खाक में मिला दिया था. अब्‍दुल हमीद की बहादुरी से पाकिस्‍तानी सेना इस तरह घबराई कि वह एक बार नहीं, बल्कि दो युद्ध के मैदान को छोड़कर भाग खड़ी हुई.

हर बार पाकिस्‍तानी सेना नई रणनीति और बढ़ी हुई संख्‍या के साथ रण में आते और मुंह की खा कर लौट जाते. लेकिन, 10 सितंबर 1965 का दिन जांबाज अब्‍दुल हमीद पर भारी था. वे अपने चंद सिपाहियों और साधारण से हथियारों के साथ दुश्‍मन सेना की पूरी रेजिमेंट और पैटन टैंकों का सामना कर रहे थे. समय के साथ, उनका और दुश्‍मन सेना के बीच का फासला कम होता जा रहा था. दूसरी तरह, लगातार हो रही आर्टलरी फायर और पैटन टैंकों के मुंह से निकल रहे गोलों ने चारों तरफ आग बरसा रखी थी. जिस खेत से वे दुश्‍मन सेना के टैंकों ध्‍वस्‍त कर रहे थे, अब वह भी पूरी तरह आग की चपेट में आ गया था.

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परमवीर चक्र विजेता अब्‍दुल हमीद ने इसी रिक्‍वायललेस गन से अजेय कहे जाने वाले पैटन टैंकों को मिट्टी में मिला दिया था.

बावजूद इसके, अब्‍दुल हमीद ने 9 सितंबर 1965 को दुश्‍मन सेना के 4 पैटन टैंकों को अपनी रिक्‍वायललेस गन से ध्‍वस्‍त कर‍ दिया था. जांबाज अब्‍दुल हमीद का यह यश उसी दिन यानी 9 सितंबर 1965 को ही थल सेना के मुख्‍यालय पहुंच गया था. थल सेना की तरफ से अब्‍दुल हमीद को प्रशस्ति पत्र जारी किया गया, जिसमें 4 पैटन टैंकों को ध्‍वस्‍त करने का जिक्र भी किया गया है. हालांकि, एनसीईआरटी की वीरगाथा में सेना के कुछ अधिकारियों के हवाले से यह जिक्र किया गया है कि 9 सितंबर के चार और 10 सितंबर को अब्‍दुल हमीद ने 3 पैटन टैंको को ध्‍यवस्‍त किया था. जिसका जिक्र प्रशस्ति पत्र में नहीं हो पाया था. वीर अब्‍दुल हमीद 10 सितंबर 1965 को दुश्‍मनों का सामना करते हुए शहीद हो गए थे.

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परमवीर चक्र विजेता शहीद अब्‍दुल हमीद को थलसेना मुख्‍यालय द्वारा दिए गए प्रशस्ति पत्र की शब्‍दावली.

अमेरिका को करनी पड़ी अपने टैंकों की समीक्षा
असल उत्ताड़ की लड़ाई में जिस तरह वीर अब्‍दुल हमीद ने जिस तरह रिक्‍वायललेस गन से पैटन टैंको का सफाया किया, उसकी गूंज अमेरिका तक पहुंच गई. युद्ध के बाद, अमेरिका को अपने अजेय कहे जाने वाले पैटन टैंकों के डिजाइन की समीक्षा करनी पड़ी. अमेरिकी सेना के लिए अभी भी यह बात पहेली बनी हुई है कि उनके अजेय और शक्तिशाली पैटन टैंक को साधारण सी दिखने वाली  रिक्‍वायललेस गन से कैसे ध्‍वस्‍त किया जा सकता है. कंपनी क्वार्टर मास्टर हवलदार अब्दुल हमीद के इसी अद्भुत युद्ध कौशल को देखते हुए उन्‍हें 10 सितंबर 1965 को देश के सर्वोच्‍च वीरता पुरस्‍कार परमवीर चक्र से मरणोपरांत सम्‍मानित किया गया था.

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शहीद अब्‍दुल हमीद की याद में जारी पोस्‍टकार्ड.

दर्जी की दुकान से युद्ध के मैदान तक का सफर
कंपनी क्‍वार्टर मास्‍टर अब्‍दुल हमीद मूल रूप से उत्‍तर प्रदेश के गाजीपुर जिले के धामुपुर गांव के रहने वाले थे. कक्षा आठ के बाद उन्‍होंने अपनी पढ़ाई छोड़ दी थी. अब उनका ज्‍यादातर समय अपने पिता की दर्जी का दुकान में बीतता था और जो खाली समय मिला, उसमें वे शिकार, तैराकी या तलवारबाजी का शौक पूरा करते थे. अब्‍दुल हमीद की उम्र 20 वर्ष रही होगी, तभी दोस्‍तों के कहने पर वे वाराणसी कैंट में चल रही सेना भर्ती में शामिल होने चले गए. सेना में उनका चयन हो गया और उन्‍हें नसीराबाद के ग्रेनेडियर रेजिमेंटल सेंटर में प्रशिक्षण के लिए भेज दिया गया.1955 में उनका प्रशिक्षण पूरा हुआ और वे 4 ग्रेनेडियर का हिस्‍सा बन गए . 1962 में हुए भारत-चीन के युद्ध के दौरान वे 7 मांउटेन ब्रिगेड और 4 माउंटेड डिवीजन का हिस्‍सा रहे. युद्ध में अद्भुद रण कौशल देखने के बाद उन्‍हें कंपनी क्‍वार्टर मास्‍टर हवलदार के पद से नवाजा गया था.

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