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Know Your Army Heroes: 60 टैंकों को नष्ट करने वाले शहीद की आखिरी ख्वाहिश- रणभूमि में जले चिता, बेटा बने सैनिक

Indo Pakistan War 1965: फिल्लौर की लड़ाई में लेफ्टिनेंट कर्नल अर्देशिर बुरज़ोरजी तारापोर ने पाकिस्‍तान के 60 टैंकों को ध्‍वस्‍त कर देश के लिए अपने प्राणों का सर्वोच्‍च बलिदान दिया था.

  • News18Hindi
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नई दिल्‍ली. लेफ्टिनेंट कर्नल अर्देशिर बुर्जोरजी तारापोर को इस बात का आभास हो गया कि अब शायद वे रणभूमि से वापस नहीं जा सकेंगे. चौविंडा की लड़ाई पर जाने से पहले ले.कर्नल अर्देशिर ने अपने मातहत साथी मेजर एनएस चीमा को फोन किया. बातचीत के दौरान, ले.कर्नल अर्देशिर ने अपनी अंतिम इच्‍छा का जिक्र मेजर चीमा से किया. उन्‍होंने मेजर चीमा से कहा कि ‘ मेरा अंतिम संस्‍कार अंतिम युद्ध भूमि में ही किया जाना चाहिए.’

उन्‍होंने कहा कि ‘ मेरी प्रार्थना की किताब मेरी मां को दी जाए. मेरी सोने की चेन मेरी पत्‍नी को और अंगूठी मेरी बेटी को दी जाए. मेरे बेटे को मेरी कलम और कड़ा दिया जाए.’ मेजर चीमा अपने सीओ (कमांडिंग ऑफिसर) की इन बातों को सुनकर हैरान रह गए थे. इस बातचीत से ठीक पांच दिन बाद, 16 सितंबर 1965 को युद्ध भूमि में गंभीर रूप से जख्‍मी हुए लेफ्टिनेंट कर्नल अर्देशिर बुर्जोरजी तारापोर देश के लिए अपने प्राणों का सर्वोच्‍च बलिदान दे जाते हैं.

दरअसल, यह बात तब की है, जब भारत और पाकिस्‍तान के बीच 1965 का भीषण युद्ध छिड़ा हुआ था. पाकिस्‍तान ने नापाक इरादों के साथ 2 लाख 60 हजार की इंफैंट्री, 280 विमान और 756 टैंक को भारत के खिलाफ जंग में उतार दिया था. उसी दौरान, पाकिस्‍तान के सियालकोट इलाके में आने वाले फिल्‍लौरा पर भारतीय विजय पताका फहराने की जिम्‍मेदारी लेफ्टिनेंट कर्नल अर्देशिर बुर्जोरजी तारापोर की कमान में पूना हॉर्स को सौंपी गई थी.

11 सितंबर 1965 को  लेफ्टिनेंट कर्नल अर्देशिर अपने टैंकों के साथ फिल्‍लौरा की तरफ कूच कर गए. भारतीय सेना की पूरी रजिमेंट चौविंडा की तरफ बढ़ रही थी, तभी वाजिराली इलाके में पहले से घात लगाकर बैठी पाकिस्‍तानी सेना ने हमला कर दिया. हालांकि यह बात दीगर है कि अदम्‍य साहस से लबरेज लेफ्टिनेंट कर्नल अर्देशिर ने अपने रण कौशल और बेहतर रणनीति से दुश्‍मन सेना को पीठ दिखाकर भागने के लिए मजबूर कर दिया.

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जख्‍मी होने के बावजूद दुश्‍मन सेना का करते रहे डटकर मुकाबला
वजिराली पर शिकस्‍त से बौखलाई पाकिस्‍तानी सेना ने आर्टलरी फायरिंग शुरू कर दी. भारतीय सेना पर पाकिस्‍तानी टैंकों से निकल रहे गोलों लगभग बरसात सी हो रही थी. इसी गोलाबारी में लेफ्टिनेंट कर्नल अर्देशिर जख्‍मी हो गए. जख्‍मी होने के बावजूद लेफ्टिनेंट कर्नल अर्देशिर ने रणभूमि छोड़ने से इंकार कर दिया. जख्‍मी हालत में ही वह लगातार पाकिस्‍तानी टैंकों को मुंहतोड़ जवाब देते रहे और 14 सितंबर 1965 को पाकिस्‍तान के वाजिराली पर कब्‍जा करने में कामयाब रहे.

लेफ्टिनेंट कर्नल अर्देशिर का विजय अभियान यहीं नहीं रुका. 16 सितंबर 1965 को उन्‍होंने दुश्‍मन सेना को न केवल पटखनी दी, बल्कि जसोरन और बटूर-डोग्रांडी पर भी भारतीय सेना का विजय पताका फहरा दिया. इस युद्ध में लेफ्टिनेंट कर्नल अर्देशिर ने अकेले दुश्‍मन सेना के 60 टैंकों को जमींदोज कर दिया.

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अद्भुत साहस के लिए मिला वीरता का सर्वोच्‍च पुरस्‍कार
लेफ्टिनेंट कर्नल अर्देशिर बुर्जोरजी तारापोर को फिल्‍लौर की लड़ाई में भारतीय सेना की सर्वोच्‍च परंपरा का निर्वहन करते हुए देश के लिए प्राणों का बलिदान दे दिया. लेफ्टिनेंट कर्नल अर्देशिर बुर्जोरजी तारापोर की बहादुरी को देखते हुए उन्‍हें वीरता के सर्वोच्‍च पुरस्‍कार परमवीर चक्र से सम्‍मानित किया गया. उल्‍लेखनीय है कि महाराष्‍ट्र के मुंबई शहर में 18 अगस्‍त 1923 को जन्‍में लेफ्टिनेंट कर्नल अर्देशिर बुर्जोरजी तारापोर के सैन्‍य जीवन की शुरूआत 1942 में हैदराबाद सेना की 7वीं इंफैंट्री से हुई थी. भारत में हैदराबाद के विलय के बाद वे भारतीय सेना की पूना हॉर्स में स्थानान्तरित कर दिए गए.

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