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Know Your Army Pride: पाक सेना का आखिरी दाव था 'ऑपरेशन ग्रैंड स्‍लैम', करारी शिकस्‍त के साथ मिट्टी में मिला गुरूर

Indo-Pakistan War 1965: पाकिस्‍तान की तीसरी साजिश का नाम था ऑपरेशन ग्रैंड स्‍लैम, जिसमें उसे एक बार फिर मुंह की खाने के लिए मजबूर होना पड़ा था.

  • News18Hindi
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    नई दिल्‍ली. Indo-Pakistan War 1965: कश्‍मीर को लेकर पाकिस्‍तान की नियत पहले दिन से नापाक रही है. 1947 के युद्ध में मिली करारी शिकस्‍त के बाद पाकिस्‍तान ने भले ही खुले तौर पर कुछ न किया हो, लेकिन अंदर ही अंदर वह कश्‍मीर को लेकर अपने नापाक मंसूबे तैयार करता रहा. 1962 के भारत-चीन युद्ध के बाद उसे लगा कि सैन्‍य ताकत के बल कश्‍मीर को हासिल करने का सही मौका है.

    चूंकि, 1947 में भारतीय सेना से मिली मार पाकिस्‍तान को याद थी, लिहाजा इस बार उसने फूंक-फूंक कर कदम आगे बढ़ाने का फैसला किया. इस फैसले के तहत, कश्‍मीर पर कब्‍जा करने के लिए पाकिस्‍तान ने तीन साजिशें रची. भारत की प्रतिकार क्षमता को आंकने के मकसद से पहली साजिश को अंजाम दिया गया. इस साज‍िश का अंत तत्‍कालीन ब्रिटिश प्रधानमंत्री की मध्‍यस्‍था के साथ हुआ.

    मध्‍यस्‍था में भारतीय रुख को देखने के बाद पाकिस्‍तान अपनी दूसरी साजिश को अमली जामा पहनाने के लिए तैयार था. दूसरी साजिश का नाम था ऑपरेशन जिब्राल्‍टर. ऑॅपरेशन जिब्राल्‍टर के तहत, पाकिस्‍तान सेना कश्‍मीर में घुसपैठ कराकर न केवल स्‍थानीय लोगों को भड़काना चाहती थी, बल्कि स्‍थानीय संचार व्‍यवस्‍था को अपने कब्‍जे में लेना चाहती थी. लेकिन, इस बार पाकिस्‍तान को मुंह की खानी पड़ी.

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    पाकिस्‍तान ने चला अपना आखिरी दांव
    ऑपरेशर जिब्राल्‍टर के बाद, पाकिस्‍तान को न केवल मुंह की खानी पड़ी, बल्कि पाक अधिकृत कश्‍मीर स्थित हाजी पीर दर्रे सहित कई पाकिस्‍तानी इलाकों में भारतीय सेना का कब्‍जा हो गया. बावजूद इसके, पाकिस्‍तान ने अपनी तीसरी और आखिरी साजिश को अंजाम देन का फैसला किया. इस साजिश का नाम था ऑपरेशन ग्रैंड स्‍लैम. पाकिस्‍तानी सेना को ऑपरेशन ग्रैंड स्‍लैम दो चरणों में पूरा करने के लिए कहा गया था.

    पहले चरण में, पाकिस्‍तानी सेना का लक्ष्‍य अखनूर ब्रिज पर कब्‍जा करना था. इस लक्ष्‍य को हासिल करने के लिए पाकिस्‍तानी सेना को छंब इलाके से भारतीय सीमा में दाखिल होना था. पाकिस्‍तान का मानना था कि अखनूर ब्रिज पर कब्‍जा करने के बाद वह जम्‍मू और कश्‍मीर का संपर्क टूट जाएगा. साथ ही, कश्‍मीर में भारतीय सेना को मिलने वाली रिइंफोर्समेंट, रसद सप्‍लाई और कम्‍युनिकेशन बाधित हो जाएगी.

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    1 सितंबर की सुबह पाकिस्‍तान सेना ने किया हमला
    पाकिस्‍तान ने अपने नापाक मंसूबों को पूरा करने के लिए 1 सितंबर 1965 का दिन चुना. तड़के करीब 3 बजकर 45 मिनट पर पाकिस्‍तानी सेना ने छंब इलाके में हमला बोल दिया. अपनी जीत सुनिश्‍चित करने के लिए पाकिस्‍तानी सेना पूरी डिवीजन स्‍ट्रेंथ के साथ आगे बढ़ रही थी, जिसमें आर्टलरी (तोपखाने), टैंक और इंफ्रेट्री (पैदल सेना) शामिल थी.

    उस समय, इस क्षेत्र के रक्षा की जिम्‍मेदारी 191 ब्रिगेड के पास थी. इस ब्रिग्रेड पर पाकिस्‍तान ने तीन तरफ से तीहरा हमला बोला था. 4 दिनों तक भारतीय सेना के जवाब मजबूती के साथ दुश्‍मन सेना का सामना करते रहे. 5 सितंबर को हालत गंभीर होने पर भारतीय सेना ने नई रणनीति पर काम करना शुरू किया. कश्‍मीर में दुश्‍मन सेना को कमजोर करने के लिए बनाई गई इस रणनीति ने काम किया और दुश्‍मन को मुंह की खानी पड़ी.

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    भारत ने पाकिस्‍तान के खिलाफ खोले नए मोर्चे
    रणनीति के तहत, भारत ने पाकिस्‍तान के खिलाफ कई नए मोर्चे खोल दिए. भारतीय सेना ने राजस्थान की तरफ से पाकिस्तान पर हमले किए. भारतीय फौज के कदम लाहौर और सियालकोट की तरफ बढ़ने लगे. देखते ही देखते सियालकोट और लाहौर के बाहरी इलाकों तक भारतीय परचम लहराने लगा. भारतीय सेना के इस कदम का असर कश्‍मीर पर दिखा.

    पाकिस्‍तान को न चाहते हुए कश्‍मीर से अपनी सेना निकाली पड़़ी और ऑपरेशन ग्रैंड स्‍लैम अपने पहले चरण में ही नेस्‍तनाबूद हो गया. 23 सितंबर 1965 को सीजफायर का ऐलान हो गया और ताशकंद समझौते के बाद दोनों ने सेनाएं अपनी अपनी सीमाओं पर वापस चली गई. इस तरह, भारतीय सेना ने एक बार पाकिस्‍तानी सेना के नापाक इरादों को चकनाचूर कर उन्‍हें करारी हार का स्‍वाद चखा दिया.

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