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Know Your Army Pride: ‘ऑपरेशन रिडल’ की पहेली में उलझा पाकिस्तान, दुश्मन देश के इन गांवों पर भारत का कब्‍जा

1962 के भारत-चीन युद्ध के बाद पाकिस्‍तान को लगने लगा था कि वह कश्‍मीर को अपनी सैन्‍य ताकत के बलबते छीन सकता है.

1962 के भारत-चीन युद्ध के बाद पाकिस्‍तान को लगने लगा था कि वह कश्‍मीर को अपनी सैन्‍य ताकत के बलबते छीन सकता है.

Indo-Pakistan War 1965: ऑपरेशन रिडल के तहत, भारतीय सेना ने 7 से 23 सितंबर 1965 के बीच पाकिस्‍तान के महाराजके, जोया, कोक्‍कर, कलोई, पगोवाल, वाडियावाला, गुलेवाली और खग्‍गा इलाकों को अपने कब्‍जे में लेकर तिरंगा फहरा दिया था.

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नई दिल्‍ली. ऑपरेशन जिब्राल्‍टर और ऑपरेशन ग्रैंड स्‍लैम के बाद भारतीय सेना ने पाकिस्‍तान को उसके घर में घुसकर सबक सिखाने का फैसला किया. भारतीय सेना के इस फैसले का एक हिस्‍सा ‘ऑपरेशन’ रिडल भी था. ऑपरेशन रिडल को अंजाम देने के लिए भारतीय सेना ने 2 सितंबर से अपनी तैयारियों को अंजाम देना शुरू कर दिया था. 2 सितंबर को तिब्‍बत बार्डर पर तैनात 3 मद्रास रेजीमेंट और 6 माउंटेन डिवीजन को पठानकोट पहुंचने के आदेश दिए गए. 5 सितंबर 1965 को ये दोनों यूनिट्स भारतीय सेना की अन्‍य यूनिट्स के साथ अरनिया इलाके में एकत्रित हुईं.

भारतीय सेना के इन यूनिट्स को सबसे पहले महाराजके गांव पर कब्‍जा करने का टॉस्‍क दिया गया. पाकिस्‍तान के अंतर्गत आने वाला यह गांव भारतीय सीमा से करीब 2.5 किमी और सियालकोट (पश्चिमी पाकिस्‍तान) से करीब 13 मील दूर था. यहां पर दुश्‍मन की महज एक कंपनी मौजूद थी. योजना के तहत, पहले चरण में 3 मद्रास बटालियन को हमला करना था, जबक‍ि दूसरे चरण में 9 कुमायूं और 4 मद्रास रेजीमेंट को दूसरे फेज में युद्ध को आगे बढ़ाना था. ऑपरेशन रिडल के नेृतत्‍व की जिम्‍मेदारी कमांडिंग ऑफिसर लेफ्टिनेंट कर्नल बीके भट्टाचार्य को मिली थी.

रणनीति के तहत, लेफ्टिनेंट कर्नल बीके भट्टाचार्य ने हमले के लिए चार कंपनियां तैयार की. कंपनी ‘ए’ का नेतृत्‍व कैप्‍टन एमएस ऑबेराय, एसाल्‍ट के लिए ‘बी’ कंपनी को चुना गया, जिसका नेतृत्‍व मेजर पी. चौधरी को दिया गया. कंपनी ‘सी’ और ‘डी’ को बतौर रिजर्व रखा गया. सी कंपनी का नेतृत्‍व कैप्‍टन बीआर मल्‍होत्रा और डी कंपनी का नेतृत्‍व मेजर एसकेएच रुबेन दास को दिया गया. अब भारतीय सेना ऑपरेशन रिडल को अमलीजामा पहनाने को तैयार थी. 7 सितंबर की रात करीब 10:50 बजे भारतीय सेना ने ऑपरेशन रिडल की शुरूआत कर पाकिस्‍तान पर हमला कर दिया.

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लाहौर (पाकिस्‍तान) जिले के अंतर्गत आने वाले बर्खी पुलिस स्‍टेशन पर लहराता भारतीय तिरंगा.

ढाई घंटे में भारतीय सेना का पाकिस्‍तान के महारजके पर कब्‍जा
हमले से बौखलाए दुश्‍मन ने भारतीय सेना पर अपनी पूरी ताकत से हमला करना शुरू कर दिया. पाकिस्‍तानी सेना हमले के लिए आर्टलरी, एमएमजी सहित उपलब्‍ध हर हथियार का इस्‍तेमाल भारतीय सेना पर कर रही थी. लेकिन, भारतीय सेना के युद्ध कौशल के सामने पाकिस्‍तान का हर वार खाली गया. भारतीय सेना अपनी बहादुरी के साथ आगे बढ़ती गई और करीब ढाई घंटे बाद भारतीय सेना ने महाराजके पर भारतीय तिरंगा फहरा‍ दिया. भारतीय समयानुसार, भारतीय सेना ने 8 सितंबर 1965 की रात करीब 1:30 बजे महारजके को पूरी तरह से अपने कब्‍जे में ले लिया था.

काउंटर अटैक को ध्‍वस्‍त कर पाकिस्‍तानी गांवों में फहराया तिरंगा
उधर, भारत की जीत से बौखलाए पाकिस्‍तान के शीर्ष सैन्‍य नेतृत्‍व ने काउंटर अटैक का आदेश दिया. पाकिस्‍तानी सेना ने तीन टैंक के साथ भारतीय सेना पर काउंटर अटैक किया. इस काउंटर अटैक को भारतीय सेना ने बड़ी आसानी से कुचल दिया. महाराजके पर कब्‍जे के बाद भी भारतीय सेना का विजय अभियान रुका नहीं. भारतीय सेना ने 10 सितंबर को पाकिस्‍तान के गांव जोया और कोक्‍कर को पूरी तरह अपने कब्‍जे में ले लिया. वहीं, 11 सितंबर को कलोई गांव भी भारतीय सेना के कब्‍जे में आ गया. इस तरह, पाकिस्‍तान के तमाम इलाकों में भारतीय तिरंगा फहराता चला गया.

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1965 के भारत-पाक युद्ध में भारतीय सेना इछोगिल नहर पार कर लाहौर तक पहुंच गई थी.

मेजर पी. चौधरी ने देश के लिए दिया प्राणों का सर्वोच्‍च बलिदान
13 सितंबर 1965 को 4 मद्रास के साथ बी कंपनी पाकिस्‍तान के पगोवाल इलाके कब्‍जे के लिए आगे बढ़ रही थी. तभी, दुश्‍मन की तरफ से हुई भारी गोलाबारी की चपेट में मेजर पी. चौधरी आ गए. हालांकि, चुटहिल होने के बाद भी वह दुश्‍मनों से तब तक लड़ते रहे रहे, जब तक उनकी आंखे बंद नहीं हो गई. इस युद्ध में मेजर पी. चौधरी ने देश के लिए अपने प्राणों का सर्वोच्‍च बलिदान दे दिया. वहीं, युद्ध क्षेत्र में मौजूद भारतीय सैनिकों ने मेजर पी. चौधरी के बलिदान को जया नहीं होने दिया, 13 सितंबर को ही पगोवाल की धरती पर भारतीय तिरंगा फहराने लगा. इसके बाद 17 सितंबर से 23 सितंबर के बीच भारतीय सैनिकों ने वाडियावाला, गुलेवाली और खग्‍गा इलाके को भी अपने कब्‍जे में ले लिया. 24 सितंबर को युद्ध विराम होने के चलते भारतीय सेना का विजय अभियान यहीं रुक गया.

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