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Padma Shri Nanda Prusty: 7वीं के बाद छूट गई थी पढ़ाई, फ्री में बच्चों को किया साक्षर

Padma Shri Nanda Prusty: 7वीं के बाद छूट गई थी पढ़ाई, फ्री में बच्चों को किया साक्षर

पद्म श्री विजेता नंदा प्रस्टी

पद्म श्री विजेता नंदा प्रस्टी

Padma Shri Nanda Prusty: इस साल के पद्म पुरस्कार समारोह में टोपी वाले बाबा ने खासी लाइमलाइट हासिल की थी. राष्ट्रपति भवन में आयोजित हुए इस समारोह में पद्म श्री विजेता नंदा प्रस्टी (Padma Shri Nanda Prusty) की एक फोटो गजब वायरल हुई थी (Viral Photo). इस फोटो में वे राष्ट्रपति राम नाथ कोविंद (President Ram Nath Kovind) को आशीर्वाद देते हुए नजर आ रहे थे. इनको यह पुरस्कार शिक्षा विभाग में उनके योगदान के लिए प्रदान किया गया था. नंदा सर (Nanda Sir) 104 साल के थे और आज यानी 7 दिसंबर 2021 को उनकी मृत्यु हो गई. जानिए वे इतने प्रसिद्ध क्यों थे.

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    नई दिल्ली (Padma Shri Nanda Prusty). पद्म पुरस्कार विजेता नंदा प्रस्टी (Padma Shri Nanda Prusty Death) की 104 साल की उम्र में आज यानी 7 दिसंबर 2021 को मृत्यु हो गई. उनकी मौत की खबर वायरल (Viral News) होते ही देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (PM Narendra Modi) समेत कई जाने-माने लोगों ने शोक संवेदना व्यक्त की है. नंदा सर (Nanda Sir) के तौर पर चर्चित नंदा प्रस्टी (Nanda Prusty) अब किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं. इस साल राष्ट्रपति भवन में उन्हें पद्म श्री पुरस्कार (Padma Shri Award) से सम्मानित किया गया था. उनकी जीवनी और शिक्षा के क्षेत्र में उनका योगदान किसी को भी प्रेरित करने के लिए काफी है (Free Education).

    ओडिशा (Odisha) के रहने वाले 102 साल के नंदा किशोर प्रस्टी (Nanda Prusty) को गणतंत्र दिवस से एक दिन पहले पद्मश्री पुरस्कार (Padma Shri Award) से सम्मानित किया गया था. नंदा प्रस्टी खुद सिर्फ 7वीं पास हैं, लेकिन फिर भी अपने आस-पास के बच्चों के साथ ही बड़ों को भी शिक्षित करने का काम कर रहे थे. नंदा किशोर जजपुर जिले के कांतिरा गांव के रहने वाले थे.

    नंदा मास्टर के तौर पर थे मशहूर
    नंदा प्रस्टी कांतिरा गांव में ‘नंद मस्तरे’ (नंदा मास्टर) के नाम से जाने जाते थे. उन्होंने चटशाली (Chatshali) की परंपरा को बरकरार रखा हुआ था. चटशाली परंपरा (Chatshali Tradition) का मतलब ओडिशा में प्राथमिक शिक्षा के लिए एक गैर-औपचारिक स्कूल से है. हर सुबह बच्चे उनके घर के पास इकट्ठा हो जाते थे. इन बच्चों को बुजुर्ग नंदकिशोर (Nanda Sir) उड़िया के अक्षर और गणित सिखाते थे. 102 साल के ये बुजुर्ग अपने बचपन में बेशक स्कूल नहीं जा सके थे लेकिन दूसरों को लिखना-पढ़ना सिखा रहे थे. वे चाहते थे कि हर कोई कम से कम अपना नाम लिख सके.

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    बिना फीस के जारी रखा पढ़ाना
    खास बत यह है कि नंदा प्रस्टी जी (Padma Shri Nanda Prusty) ने किसी भी बच्चे को पढ़ाने के लिए कभी फीस नहीं ली. पिछले 70 साल से वे बच्चों को फ्री में पढ़ा रहे थे. उनका मानना था कि पढ़-लिखकर बच्चे अच्छे इंसान बन जाएं, बस वही उनकी फीस है. उन्हें पैसों का कोई लालच नहीं था. कांतिरा के पास कई स्कूल और कॉलेज खुलने के बावजूद ग्रामीण उड़िया अक्षर और गणित सीखने के लिए अपने बच्चों को उनके पास भेजते थे.

    Tags: Viral news

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