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Opinion: क्या लड़के-लड़कियों के अलग-अलग कॉलेज आज भी प्रासंगिक हैं

Opinion: क्या लड़के-लड़कियों के अलग-अलग कॉलेज आज भी प्रासंगिक हैं

separate colleges for boys and girls: सह-शिक्षा से छात्र-छात्राओं में परस्पर प्रतिस्पर्धा की भावना पैदा होती है.

separate colleges for boys and girls: सह-शिक्षा से छात्र-छात्राओं में परस्पर प्रतिस्पर्धा की भावना पैदा होती है.

सही यह है कि सह-शिक्षा का पाश्चात्य देशों से कोई ताल्लुक नहीं है. जब पाश्चात्य का कोई नामोनिशान नहीं था तबके लिखे ग्रंथों में सह-शिक्षा का उल्लेख मिलता है. गुरुकुल में यह व्यवस्था प्रचलन में थी और शास्त्रार्थ में लड़के-लड़कियों को एक साथ आमंत्रित किया जाता था. भारतीय मेधा के कई उदहारण उन गुरुकुलों में मिलते हैं जहां सह-शिक्षा रही है. बल्कि इस व्यवस्था की कोई आलोचना हमारे किसी ग्रन्थ में नहीं मिलती.

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separate colleges for boys and girls: भारतीय सामाजिक संरचना में लड़का-लड़की रहते एक ही समाज और परिवेश में हैं लेकिन उनकी परवरिश के पैमाने आलग-अलग होते हैं. कहीं-कहीं तो खान-पान तक में असमानता देखने को मिलती है. ऐसे में सवाल यह है कि यदि उनकी शिक्षा भी अलग-अलग हो जाय तो उनके व्यक्तित्व का सम्पूर्ण विकास कैसे होगा? किसी भी लड़का-लड़की के सम्पूर्ण विकास के लिए सह-शिक्षा जरूरी है. सह-शिक्षा से उन्नति होती है और इंसान इंसान बने रहता है. उसमें लिंग-भेद का भाव कम रहता है. किसी तरह की कुंठा नहीं रहती.

देश के कई विश्वविद्यालयों के महाविद्यालय केवल लड़कियों के हैं या फिर केवल लड़कों के हैं. सवाल यह उठता है कि आज इस तरह के व्यवस्था की सच में कोई जरूरत है क्या? जब भारत में प्राचीन काल के गुरुकुलों में सह-शिक्षा दी जाती थी तो आज 21वीं सदी के कई विश्वविद्यालयों/महाविद्यालयों में यह क्यों और कैसे नहीं हो पा रही?

सह-शिक्षा का लाभ दोनों को
विद्वान मानते हैं कि सह-शिक्षा का लड़की और लड़का दोनों को सीधे तौर पर लाभ मिलता है. एक तरफ लड़कियों में नारी-स्वभाव सुलभ लज्जा, झिझक, पर-पुरुष से भय, कोमलता, अबलापन, हीनभावना का भाव काफी हद तक दूर हो जाता है. वहीं दूसरी तरफ युवक नारी के गुणों को अपना लेता है जिससे उसकी निर्लज्जता, अक्खड़पन, अनर्गलता पर अंकुश लग जाता है और उसमें मृदुभाषिता, संयमित संभाषण, शिष्ट आचरण तथा स्त्री समस्याओं के प्रति समझ विकसित होती है. युवक-युवतियों के बीच इस तरह के भावों का आदान-प्रदान उनके भविष्य निर्माण में सकारात्मक योगदान करते हैं. उदहारण के लिए शिक्षा लेने के बाद जब युवक-युवती जीविका के लिए कार्यस्थल पर जाते हैं तो वहां स्त्री-पुरुष दोनों ही मिलते हैं. उस वातावरण में बिना किसी कुंठा या संकोच के दोनों मिलकर काम करते हैं. इससे संस्थान और देश, दोनों की उन्नति होती है.

समाधान के लिए साझा प्रयास 
यह देखा गया है कि सह-शिक्षा से छात्र-छात्राओं में परस्पर प्रतिस्पर्धा की भावना पैदा होती है और उनका चहुमुखी बौद्धिक विकास भी होता है. दोनों वर्ग एक दूसरे से आगे निकलने का प्रयास करते हैं. किसी समस्या के समय लड़के-लड़कियाँ एक-दूसरे से झिझकते नहीं. बल्कि समस्या के समाधान के लिए साझा प्रयास करते हैं. इससे लड़कियों में व्यर्थ की लज्जा दूर होती है, जिससे पढ़ाई समाप्त होने पर वे नौकरी में लड़कों से बात करने पर शर्माती नहीं हैं और लड़के भी लड़कियों के समक्ष अधिक संयम में रहना सीख लेते हैं. आपसी सहयोग से उन्हें नारी का सम्मान करने की प्रेरणा मिलती है, जिससे आगे जाकर उनको वैवाहिक जीवन सफल बनाने में मदद मिलती है. स्त्री की छोटी-छोटी खुशियाँ पुरुष समझता है और पुरुष के गर्वीले स्वाभाव को स्त्री समझती है. दोनों एक-दूसरे का सम्मान/साथ देकर आगे बढ़ते हैं.

लड़कियों के विद्यालय में पढ़ने से लड़की का बहुत नुकसान
रचनाकार और शोधार्थी ऋतु सिंह का कहना है कि ‘केवल लड़कियों के विद्यालय में पढ़ने से लड़की का बहुत नुकसान होता है. उसमें स्त्रियोचित गुणों के प्रति सजगता और समझ तो खूब बनती है, लेकिन सामाजिक समझ कम विकसित हो पाती है. ऐसे ही लड़के शिक्षा तो पा लेते हैं लेकिन उनमें स्त्री समस्याओं के प्रति समझ और सम्मान नहीं विकसित हो पाता. यह मैंने अपने आसपास में देखा है कि जीवन में स्त्री-पुरुष का भेद नहीं रखने वाले व्यक्ति में उसके शैक्षिक वातावरण और पारिवारिक सोच का बहुत योगदान है. ऐसे ही जो लड़कियां जीवन की दिशा और गति को ठीक से समझ नहीं पाती हैं उनका पालन पोषण और शिक्षा किसी एकांगी वातावरण में हुई होती है. यह व्यावहारिक सत्य है’. सह-शिक्षा बहुत जरूरी है, उसके पक्ष में ऐसे अनेकों तर्क और उदाहरण दिए जा सकते हैं.

शास्त्रार्थ में लड़के-लड़कियों को एक साथ आमंत्रित किया जाता था
सह-शिक्षा के नकारात्मक पक्ष को लेकर भी बहुत बातें हुई हैं. खासकर यह आरोप लगाया जाता रहा है कि यह पाश्चात्य देशों की नक़ल है. बच्चे अपने विपरीत लिंगी से मिलकर अपना उद्देश्य भूल जाते हैं. उनकी शिक्षा बर्बाद हो जाती है. वह कुछ रचनात्मक नहीं कर पाते. जबकि सही यह है कि सह-शिक्षा का पाश्चात्य देशों से कोई ताल्लुक नहीं है. जब पाश्चात्य का कोई नामोनिशान नहीं था तबके लिखे ग्रंथों में सह-शिक्षा का उल्लेख मिलता है. गुरुकुल में यह व्यवस्था प्रचलन में थी और शास्त्रार्थ में लड़के-लड़कियों को एक साथ आमंत्रित किया जाता था. भारतीय मेधा के कई उदहारण उन गुरुकुलों में मिलते हैं जहाँ सह-शिक्षा रही है. बल्कि इस व्यवस्था की कोई आलोचना हमारे किसी ग्रन्थ में नहीं मिलती. ऐसे में सह-शिक्षा को पाश्चात्य व्यवस्था का प्रभाव कह देना उचित नहीं लगता.

सह-शिक्षा की व्यवस्था 
सह-शिक्षा की खामियां देशी-विदेशी सोच या प्रभाव के कारण नहीं बन रही हैं. आज कल इसका कारण तकनीक है जिसमें अच्छा-बुरा का कोई फर्क करने की व्यवस्था विकसित नहीं हो सकी है. पोर्न से लेकर नग्नता तक उसमें परोसी जा रही है और हर विद्यार्थी उसे हाथ में लेकर घूम रहा है. यदि सह-शिक्षा की व्यवस्था में आज कोई बुराई है तो वह है वर्चुअल माध्यमों में उपलब्ध वह सामग्री जो अबोध बचपन को गलत दिशा दे रही है. ऐसे ही टेलीविजन पर प्रसारित होने वाले उन कार्यक्रमों की भी भूमिका बहुत है जो मनोरंजन के नाम पर कुछ भी सकारात्मक नहीं दिखा पा रहे हैं.

 शिक्षा की जरुरत को समझने के साथ उसकी दिशा भी तय करें
हमें शिक्षा और उसकी जरुरत को समझने के साथ उसकी दिशा भी तय करनी होगी. आज हमारे बच्चे दुनिया के उन सारे खोजों और शोधों तक पहुंचे हुए हैं जिनकी चर्चा विद्वानों के बीच हो रही है और जिन्हें बड़े-बड़े पुरस्कारों से पुरस्कृत किया जा रहा है. आज यह स्थिति नहीं है कि लड़कियां ही खाना बनाएंगी और लड़के खेल खेलेंगे. अब समाज में यह लिंगभेद मिट रहा है. दोनों ही खेल रहे और लड़के दुनिया भर में अच्छा खाना बनाने का पुरस्कार जीत रहे. ऐसे में संस्थानों को लिंग आधारित शिक्षा का केंद्र बनाना सही नहीं है.

समय के अनुसार चलने से तरक्की अपनेआप होती है. जरुरत है युवाओं की प्रतिभा के अनुसार उन्हें अवसर और संसाधन उपलब्ध करने की. साथ ही समय-समय पर उन्हें मान्यता देना और पुरस्कृत करते रहना है, ताकी उनका हौसला बढ़े. उनकी तरक्की में ही देश की तरक्की है. सकारात्मक भावों और रचनात्मक ऊर्जा का सदुपयोग करने के लिए सह-शिक्षा सही माध्यम साबित हो सकती है.

(डिसक्लेमेर – लेखक रामाशंकर कुशवाहा दिल्ली विश्वविद्यालय में प्राध्यापक हैं और ये उनके निजी विचार हैं.)

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Tags: College

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