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UPSC Preparation: सिविल सेवा परीक्षा में क्या है 'समानता का सिद्धांत', पढ़ें डिटेल

UPSC Preparation: सिविल सेवा परीक्षा में क्या है 'समानता का सिद्धांत', पढ़ें डिटेल

UPSC Civil Services: आयोग हर साल की प्रारम्भिक परीक्षा में किसी एक विषय के प्रश्नों की संख्या को अधिक कर देता है.

UPSC Civil Services: आयोग हर साल की प्रारम्भिक परीक्षा में किसी एक विषय के प्रश्नों की संख्या को अधिक कर देता है.

करेंट अफेयर्स के प्रश्नों की संख्या नहीं के बराबर होती जा रही है. जबकि अच्छे प्रशासकों के चयन तथा समानता के सिद्धांत के निर्वाह की दृष्टि से इसकी सर्वाधिक उपयोगिता से इंकार नहीं किया जा सकता.

नई दिल्ली. UPSC Preparation: आई.ए.एस. की परीक्षा को लेकर यूपीएससी के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वह कैसे इस तरह के प्रश्न पत्र तैयार करे, ताकि उसे ‘सेम प्लेयिंग फिल्ड‘ के सिद्धांत पर खरा माना जा सके. इसके लिए आवश्यक हो जाता है कि आयोग विभिन्न विषयों पर पूछे जाने वाले प्रश्नों का कमोवेश एक प्रतिशत निर्धारित कर ले. इससे युवा विभिन्न विषयों के महत्व के अनुसार तैयारी करके वर्तमान में उपस्थित असंतोष के शमन में सहायक हो सकेंगे. ध्यान देने की बात है कि मुख्य परीक्षा में ऐसा किया भी जाता है. लेकिन दुर्भाग्य से प्रारम्भिक परीक्षा में ऐसा नहीं है.

अभी दस अक्टूबर को सिविल सेवा की जो प्रारम्भिक परीक्षा हुई है, उसने एक बार फिर से इस तरह के असंतोष के स्वरों को तेज कर दिया है. इस तरह के पेपर्स किस प्रकार कुछ का पक्ष लेकर अन्य बड़े वर्ग के साथ अन्याय करते हैं, इसे इस वर्ष के सामान्य अध्ययन के प्रथम प्रश्न पत्र द्वारा समझा जा सकता है.

इस पेपर में विभिन्न कई विषयों पर आधारित वस्तुनिष्ठ किस्म के कुल सौ प्रश्न पूछे जाते हैं. इस वर्ष केवल इतिहास से बीस प्रश्न पूछे गये. इसकी मुख्य परीक्षा में प्रतियोगियों को कोई एक वैकल्पिक विषय लेना होता है. जाहिर है कि इस साल की प्रारम्भिक परीक्षा में उन युवाओं के सफल होने की संभावना सबसे अधिक होगी, जिन्होंने वैकल्पिक विषय के रूप में इतिहास का चयन किया होगा. यहाँ समानता का सिद्धांत स्पष्ट तौर पर व्यर्थ हो जाता है.

सामान्यतया यह देखने में आया है कि आयोग हर साल की प्रारम्भिक परीक्षा में किसी एक विषय के प्रश्नों की संख्या को अधिक कर देता है. इससे उस विषय की पृष्ठभूमि वाले विद्यार्थियों को अतिरिक्त लाभ तो मिलता ही है, साथ में परीक्षा की तैयारी करने वाले बुरी तरह से भ्रमित हो जाते हैं. उनके लिए अपनी तैयारी को व्यवस्थत रूप देना कठिन हो जाता है. मुझे नहीं लगता कि अच्छे प्रशासकों के चयन में इस तरह की अनिश्चिता के निर्माण से कोई मदद मिलती होगी.

इसके साथ ही पिछले कुछ सालों से दो प्रवृत्तियाँ और दिखाई दे रही है. इनमें पहला यह कि विज्ञान के प्रश्नों की संख्या में काफी वृद्धि हुई है. और विज्ञान के ये प्रश्न भी सामान्य विज्ञान के न होकर विशिष्ट विज्ञान के होते है. यदि आप स्नातक तक विज्ञान के विद्यार्थी नहीं रहे हैं, तो इन प्रश्नों को हल करना तो दूर की बात है, ये समझ में ही नहीं आयेंगे कि पूछा क्या जा रहा है.

दूसरी प्रवृत्ति है- समसामयिक घटनाओं से दूरी बनाये रखना. करेंट अफेयर्स के प्रश्नों की संख्या नहीं के बराबर होती जा रही है. जबकि अच्छे प्रशासकों के चयन तथा समानता के सिद्धांत के निर्वाह की दृष्टि से इसकी सर्वाधिक उपयोगिता से इंकार नहीं किया जा सकता.

यूपीएससी को चाहिए कि वह इन मुद्दों पर विचार करके एक संतुलन की स्थिति लाने का प्रयास करें. (लेखक डॉ०विजय अग्रवाल पूर्व सिविल सर्वेंट और afeias के संस्थापक हैं. )

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Tags: UPSC, Upsc exam

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