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वेब सीरीज 'तांडव' का चलता फिरता रिव्यू और विरोध की जमीनें

तांडव वेब सीरीज का एक दृश्य (फोटो साभार: twitter/PIYALI)
तांडव वेब सीरीज का एक दृश्य (फोटो साभार: twitter/PIYALI)

Web Series Tandav Review: कई फिल्में सेफ पेसेज लेती हैं और कुली नंबर वन सरीखी बनकर उतरती हैं. आप उन्हें देखकर महाबोर भी हो जाएं तो भी उनकी कनपटी गरम करने की नहीं सोचते. ये फिल्में ऐड़ा बनकर पेड़ा कमा लेती हैं.

  • News18Hindi
  • Last Updated: January 18, 2021, 4:08 PM IST
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तांडव एक ऐसी वेब सीरीज है (Tandav Web Series) जिसे आप नहीं देखेंगे तो कुछ भी मिस नहीं करेंगे. इसमें ऐसा कुछ नहीं कि इसकी भूरि-भूरि प्रशंसा की जाए. लेकिन इसमें ऐसा बहुत कुछ है जिस पर आप भड़कने का मन बना लें तो अच्छा खासा भड़क और तुनक सकते हैं. इसे बैन किए जाने के कई 'पॉपुलर कारण' भी मौजूद हैं जिसके चलते ऐमेजॉन प्राइम (Amazon Prime) और फिल्म का विरोध हो रहा है. इतिहास गवाह रहा है कि कई बार विवादों ने औसत फिल्मों को भी लोकप्रियता के अच्छे खासे मुकाम तक पहुंचाया है और अच्छी फिल्मों की मिट्टी पलीत कर दी है. ऐसे में इसका क्या होने वाला है... यह कुछ दिनों में पता चल ही जाएगा. बावजूद इसके, इसे देखना भावनात्मक तौर पर (या किसी अन्य स्तर पर) नुकसानदायक तो नहीं ही है.

वैसे निजी स्तर पर, मैं हर फिल्म को देखने योग्य मानती हूं. वह इसलिए क्योंकि फिल्में समाज का आईना होती हैं. हम कभी कभी आईने को समाज का हिस्सा न समझकर पूरा का पूरा समाज समझने लगते हैं, इसलिए फैल जाते हैं. वह समाज के एक समय विशेष, एक पक्ष विशेष, एक समस्या, एक बीमारी विशेष और एक एंगल विशेष की ओर इंगित करती हुई हो सकती है लेकिन फिल्में लाती अपना कच्चा माल समाज के भीतर से ही हैं. हम सहमत हों या न हों.





शीशे में चेहरे पर मुहांसे और दाग धब्बे दिख रहे हैं तो वह इसलिए, क्योंकि शीशे के बाहर खड़े आदमी के मुंह पर सचमुच मुहांसे हैं और चेचक के गहरे गढ्डे हैं. हां, अगर यह आदमी मेकअप फाउंडेशन और कंसीलर लगाकर शीशे के सामने खड़ा होता, तो शीशा चमकदार चेहरा ही दिखाता. कई फिल्में इस बात का ख्याल रखती हैं... डेंटिंग-पेंटिंग के साथ पेश होती हैं. कई फिल्में जैसा है, वैसा ही दिखना चाहती हैं. उसमें थोड़ा बहुत तियां पांचा करती भी हैं तो वह शक्ल को कुछ और विद्रूप बना बैठती हैं, और फिर उलटा फंस जाती हैं. कई फिल्में सेफ पेसेज लेती हैं और कुली नंबर वन सरीखी बनकर उतरती हैं. आप उन्हें देखकर महाबोर भी हो जाएं तो भी उनकी कनपटी गरम करने की नहीं सोचते. ये फिल्में ऐड़ा बनकर पेड़ा कमा लेती हैं.
तांडव पर बात तो यह होनी चाहिए कि सीजन फर्स्ट में जेएनयू के गुजरे जमाने के विवादों से कथित रूप से 'प्रेरित' होकर स्टोरी में बड़ा हिस्सा पेश किया तो गया लेकिन बहुत बेकार तरीके से. कहीं का ईंट कहीं का रोड़ा अगर पहले सीजन में ही है तो दूसरे सीजन में तो हिन्दुस्तानी वेब सीरीज वैसे भी सकपकाई रहती हैं. ये बिल्कुल ऐसा ही होता है कि बड़ी बेटी गोरी, लंबी और स्पोर्ट्स में तेज हो तो छोटी सांवली, पढ़ाई में अव्वल बेटी अपेक्षाओं और लानतों के बोझ तले दबकर जो थी वो भी नहीं रहती और जो हो सकती थी, वो भी नहीं हो पाती.

पहले ही एपिसोड में हिन्दू देवी देवताओं को लेकर किया गया मंचन गैर जरूरी था. हाल के ट्विटर विवादों और धर्म को लेकर आए राजनीतिक उफानों को मजाकिया लहजे में यूं न भी दिखाते तो चलता लेकिन फिर यह लेखकीय स्वतंत्रता है. ऊंट किसी न किसी तरफ तो करवट लेता ही. आर्टिकल 15 जैसी शानदार फिल्में लिख चुके गौरव सोलंकी की कविताएं और लेखन दोनों ही तीखा और नंगा होता है. आप पसंद करें न करें लेकिन सच्चा. इस फिल्म के लेखन में भी यह दिखाई दिया है. फिल्म का डायरेक्शन और एक्टिंग बेहद कमजोर होने के कारण सबकुछ तितरा बितरा सा है और यह भी एक वजह है कि हिन्दू मुस्लिम एंगल कुछ ज्यादा ही मुखर होकर दिख रहा है. चूंकि दिख रहा है, इसलिए पिट रहा है.

जाति संबंधी टीका टिप्पणियां तिग्मांशु धूलिया और डिनो मोरिया से बुलवाई गई हैं लेकिन ऐसा तो है नहीं कि आपके समाज में यह सोच और ऐसी टीका टिप्पणियां बातचीत का हिस्सा होती ही नहीं हैं. दरअसल, दलित समाज का अपमान इससे नहीं होता कि इस फिल्म में ऐसा बुलवा दिया गया है, बल्कि इससे होता है कि आज भी ऐसा सोचा और कहा जाता है. इसी संस्कारी समाज में, आज भी बाइक खरीदने पर दलित युवक को प्रताड़ित कर दिया जाया है. और, जातिगत सरनेम न होने पर घुमा फिराकर (कभी कभी सीधे तौर पर) जात पूछी जाती है. गोया, जात न हुई 'हाथ सैनिटाइज कर लिए थे?' पूछा जा रहा हो. तो शिकायत किस बात से है, जो जैसा है वैसा बोल दिए जाने पर या कि जो है, उसके होने पर!

खैर, कुल मिलाकर विरोध की जमीन फिल्म की ऐसी बातों ने दी है. कुछ दिन चर्चाओं में रहेगी ही. आपने नहीं देखी है और समय का खास अभाव नहीं है तो 'मेलोडी खाओ खुद जान जाओ'.
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