बासु चटर्जी का मिडिल क्लास सिनेमा, जिसने एंग्री यंग मैन से ली थी भरपूर टक्कर

बासु चटर्जी का मिडिल क्लास सिनेमा, जिसने एंग्री यंग मैन से ली थी भरपूर टक्कर
बासु चटर्जी के निधन पर कई बॉलीवुड स्टार्स ने शोक व्यक्त किया है.

ये जीवन है, इस जीवन का, यही है, यही है, यही है रंग रूप, जिस फिल्म का यह गाना है, बासु चटर्जी (Basu Chatterjee) की दूसरी फिल्म थी. इससे पहले वो 1969 में राजेंद्र यादव की किताब पर आधारित सारा आकाश बना चुके थे.

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मुंबई : ये जीवन है, इस जीवन का, यही है, यही है, यही है रंग रूप... पिया का घर (Piya Ka Ghar) (1972), जिस फिल्म का यह गाना है, बासु चटर्जी (Basu Chatterjee) की दूसरी फिल्म थी. इस से पहले वो 1969 में राजेंद्र यादव की किताब पर आधारित सारा आकाश बना चुके थे. तब के दर्शकों के लिए यह बहुत नया रहा होगा क्योंकि एक तरफ तो सबको एंग्री यंग मैन के अद्भुत दौर का इंतज़ार रहा होगा, वहीं दूसरी तरफ चटर्जी और हृषिकेश मुखर्जी मिडिल क्लास हीरो को मेनस्ट्रीम बनाने पर तुले हुए थे.

चटर्जी ने 18 साल तक रुसी करंजिया के मैगज़ीन ब्लिट्ज में कार्टूनिस्ट का काम किया, फिर जाकर 39 की उम्र में फिल्ममेकर बने. ज़िन्दगी का तज़ुर्बा एक कार्टूनिस्ट से बेहतर कौन ही पाता होगा! हालांकि चमत्कार होना शुरू हुआ रजनीगंधा (1974) के बाद जब चितचोर, छोटी सी बात, सफ़ेद झूठ, स्वामी, खट्टा मीठा, दो लड़के दोनों कड़के और तुम्हारे लिए जैसी फिल्मों से. सब एक से बढ़कर एक.

जो आखिरी नाम है-तुम्हारे लिए-वो अपने आप में एक नायाब एक्सपेरिमेंट था. फिल्म तो वैसे शायद ज़्यादा चली नहीं, लेकिन पुनर्जन्म जैसे हिट फॉर्मूले को ज़रूर स्थापित कर गयी. ऊपर से जयदेव का वो हॉन्टिंग संगीत.



तुम्हें देखती हूँ तो लगता है जैसे युगों से तुम्हें जानती हूँ



पिया तुम हो सागर और मैं प्यासी नदी हूँ...

इसको सिर्फ एक गीत कौन कहेगा? बासु चटर्जी ने 1969 से 2011 के बीच हिंदी और बंगाली में 40 फिल्मों का निर्देशन किया. 1976 से 1980 के बीच वो टॉप गियर में थे और उन्होंने कुल 16 फिल्में डायरेक्ट कर दीं. इनमें से रत्नदीप, प्रेम विवाह और चक्रव्यूह जैसी कुछ फिल्मों को रहने दें तो ज़्यादातर लोगों को आज भी याद होंगी. ये दौर इसीलिए भी ख़ास था क्योंकि जब 1 से 10 तक सिर्फ अमिताभ बच्चन (Amitabh Bachchan) को माना जाता था, चटर्जी अपनी एक समानांतर धारा चला रहे थे. कोशिश नहीं बल्कि सफल थे. इतने प्रोड्यूसर्स किसी एक निर्देशक को इतनी जल्दी-जल्दी मिलना एक खास टैलेंट की तरफ तो इशारा करते ही हैं.

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मैंने चटर्जी की फिल्में अपने छोटे से कस्बे में सेटेलाइट चैनल्स पर ही देखी हैं. एक तरह से यह अच्छा ही था. लोग भले ही कहते हों कि उनकी फिल्में शहरी बुर्ज़ुआ के लिए होती हैं, मुझे तो वो ग़रीब, बिल्कुल सर्वहारा, के सपनों जैसे ही लगते थे. अब चमेली की शादी जैसी कहानी को मिडिल-क्लास कह देना तो ज़्यादती हो जायेगी.

मुझे उनके सोशल कमैंट्स में भी तंज से ज़्यादा यथास्थिति को मान लेने सा भाव लगता है. मानो एक वृद्ध व्यक्ति कह रहा हो कि अगर जवानी में कुछ ढंग का कर लिया होता तो आज बुरे दिन ना देखने पड़ते. अपने मन में वह जानता है कि उसकी परिस्थितियां कभी भी अनुकूल नहीं थीं.

बासु चटर्जी का गुरुवार को हुआ है निधन.


चटर्जी ने 1998 से 2011 के बीच भी 6-7 फिल्में बनायीं जिनमें से एक को छोड़कर सब बंगाली में हैं. जरा सोचिये उनकी आखिरी फिल्म के समय उनकी उम्र 81 साल की थी. इतना ऊर्जावान व्यक्ति. जैसे हॉलीवुड के लिए क्लिंट ईस्टवुड, वैसे ही हमारे लिए बासु चटर्जी. बस फिल्मों का टोन एकदम अलग.

जाते-जाते उनकी फिल्म खट्टा मीठा का एक गीत जो उनकी अधिकतर कहानियों का लब्बोलुबाब है:

थोड़ा है, थोड़े की ज़रुरत है
ज़िन्दगी फिर भी यहां खूबसूरत है...

अगर आपने उनकी फिल्में ना देखीं हों तो अब देख लीजिये. 30 साल पहले तक हिंदी में भी काफी सरोकार वाली फिल्में बनती थीं.
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