एक याद : जब बिना पूछे ही गिरीश कर्नाड को भोजपुरी नाटक में उतारा गया...

गिरीश कर्नाड के नाटक 'हयवदन' पर तीन बार भोजपुरी स्टाइल में नाटक खेल लेने वाली मंडली को जब गिरीश की ओर से एक पत्र आया तो वो सहम गए थे...पत्र में कुछ ऐसी बात लिखी थी.

Raj Shekhar | News18Hindi
Updated: June 12, 2019, 5:25 PM IST
एक याद : जब बिना पूछे ही गिरीश कर्नाड को भोजपुरी नाटक में उतारा गया...
इस आर्टिकल के लेखक राजशेखर ने गिरीश कर्नाड के लिखे नाटक 'हयवदन' का भोजपुरी संस्करण तैयार किया था.
Raj Shekhar
Raj Shekhar | News18Hindi
Updated: June 12, 2019, 5:25 PM IST
सन 93 के जेठ की एक तपती तिजहर, दिल्ली में साहित्य अकादमी परिसर में 22-23 साल का एक पुरबिया नौजवान. कला और साहित्य की बस एक भदेस सी समझ, मगर सब कुछ देखने, सुनने और समेट लेने की ज़िद. दिल्ली की पहली यात्रा थी. रंगकर्म का जुनून था तो छोटे शहर से आए नौजवान के लिए मंडी हाउस मक्का था. लिबरलाइजेशन देश के दरवाज़े पर दस्तक दे चुका था, लेकिन अपने क़कून में क़ैद कन्फ्यूज़ नौजवानों की क़तार अब भी क़ायम थी.

साहित्य अकादमी परिसर की रविन्द्र भवन आर्ट गैलरी में एक पेंटिंग प्रदर्शनी लगी थी. पेंटर थे चित्रोवानू मजूमदार. पेंटिंग्स आदमी के कद की तिगुनी भी हो सकती हैं, ये देख कर आँखे फटी पड़ी थीं. समझ तो कुछ आया नहीं लेकिन वहीं पहली मुलाक़ात हुई बी वी कारंथ से.



क़ैफियत कुछ यूं थी कि जैसे आज के नए लौंडों के सामने शाहरूख ख़ान, रणबीर कपूर, विराट कोहली और रोहित शर्मा खड़ा हो.

नीला कुर्ता, सफ़ेद पायज़ामा, कंधे से लटकता एक झोला जो कम से कम गांधी आश्रम वाला नहीं था.

“सर आप कारंथ जी...बाबा....”

हा हा....(अनुस्वार/ अनुनासिक नहीं था, हां नहीं हा बोले)

“बाबा मैं राजशेखर...गोरखपुर से आया हूं...आजकल आपका हयवदन पढ़ रहे हैं….एक ऑटोग्राफ़...”
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“वो मेरा नहीं गिरीश कर्नाड का है”

“जी जी....लेकिन आपने अनुवाद किया है”

“सिर्फ़ अनुवाद किया है. नाट्यकार गिरीश है”

फिर मेरी बढ़ाई छोटी सी स्पायरल नोट बुक पर अपना पूरा नाम बोल कर खड़े-खड़े ही हिन्दी में हस्ताक्षर. बाबूकोडी वेंकट रमन कारंथ.

तो इस किस्से के बाद कहना चाहूंगा कि मेरा क़ायदे का पहला परिचय गिरीश कर्नाड से उन्होंने ही उस दिन करवाया था. बड़ी देर तक उनके साथ सम्मोहन में घूमता रहा पैदल. पहले श्रीराम सेंटर गए. तब वहां की नाट्य मंडली के मुखिया संजय उपाध्याय थे. परिचय भी कराया, लेकिन संजय का भाव ये था कि ऐसे लौंडों को लेकर बाबा अक्सर घूमते ही रहते हैं.

इस बीच बाबा मुझे बता चुके थे, “गिरीश तो गणित से इधर आए. उनकी बीएससी गणित में थी. लेकिन अन्दर का रचनाकार, बुद्धिजीवी गिरीश का बहुत बड़ा है. वो ऑक्सफोर्ड तक जाते-जाते दर्शन, राजनीति शास्त्र और इकॉनमिक्स के अध्येता हो गए. गणित भी तो कला है.”

गिरीश कर्नाड और बाबा के रचनाकार की वेबलेंथ मिलती हो जैसे. ये मुझे उसी वक्त और अपने रेखिया उठान वाले दौर में भी समझ में आ गया. लगातार गिरीश के बारे में ही बात. बाबा श्रीराम सेंटर से मुझे लिए एनएसडी की ओर बढ़ चले और मैं पीछे-पीछे. गिरीश ग़ैरमौजूद होकर भी हमारे बीच मौजूद थे. वो उनकी संगीत नाटक अकादमी की अध्यक्षता के अंतिम दिन रहे होंगे. वो दिल्ली बस आते थे टिकते नहीं थे.

जिसे आज एनएसडी का बहुमुख थिएटर कहा जाता है, वो तब स्टूडियो थिएटर था. मशहूर रंगनिर्देशक अभिलाष पिल्लै वहां अपना प्रयोगवादी नाटक लंका लक्ष्मी कर रहे थे. बाबा न होते तो शायद उस सकिस्त थिएटर में मुझे खड़ो होने की भी जगह न मिलती.

ख़ैर रास्ते में बाबा ने बताया गिरीश का नाटककार उसकी अपनी भाषा में बोलता है. वो नाटक कन्नड़ में लिखते हैं. बाबा और उनके बीच जोड़ने वाली एक कड़ी और थी, दोनों कर्नाटक की मूविंग नाट्य मंडलियों से प्रभावित थे.

नाटक का प्रस्ताव

Girish Karnad
नाटक के तीन प्रदर्शन हो जाने के बाद गिरीश की ओर से एक चिट्ठी आई.


उदारवाद का बाज़ार खुल चुका था. देश ग्लोबल होने को बेताब था. साहित्य में उत्तर आधुनिकता की चर्चा ज़ोरों पर थी. गिरीश कर्नाड की पहचान दूरदर्शन के ‘मालगुड़ी डेज़’ और ‘टर्निंग प्वाइंट’ से थी, न्यू वेब सिनेमा से थी. मगर बाबा मुझे गिरीश कर्नाड के बारे में बता रहे थे, हयवदन के बारे में पूछ रहे थे. बोलते-बोलते बहते जा रहे थे.

मैं कहता चलूं कि बाबा कारंथ ने ही मुझे बताया कि ग्लोबल होने की पहली शर्त लोकल होना है. लोकल होना लोक से जुड़ना है, अपने लोक को दूसरे और बड़े लोक में ले जाना है. हालांकि तब मेरी समझ में कुछ नहीं आया, सिर्फ कारंथ दिख रहे थे.

तभी बाबा ने कहा “तुम्हारे यहां भी तो बहुत सा फ़ोक है, लोक नाट्य है. हयवदन पढ़ रहे हो तो समझ में तो आया होगा. वो यक्षगान शैली में है."

कारंथ का पूरा ज़ोर अपनी नाट्य शैलियों को जीवित रखने पर था. वो गिरीश का उदाहरण सामने रख कर बार-बार बता रहे थे कि गिरीश बतौर लेखक अंग्रेजी में पैदा हुए, नाट्यकार के तौर पर वो अपनी ज़बान और लोक से गहरे जुड़े हैं, प्योर कन्नडिगा!

वो चाय की दुकान अब भी वहीं है. अचानक दिमाग में वहीं सीटी सी बजनी शुरु हुई. मैने बाबा को बताया कि अभी हमारे जानने वाले ग्रुप ने दो नाटक 'बिदेसिया' शैली में किए हैं. ये दोनो नाटक हृषिकेश सुलभ के बनाए थे, एक ‘अमली’ दूसरा ‘माटी की गाड़ी’. बाबा देखते रहे, सर हिलाते रहे, हम दोनों की बोली में दिक़्क़त भी थी.

“मैने पूछा बिदेसिया में हयवदन कर सकते हैं?”

बाबा ने हल्की चुप्पी के बाद कहा....

“हा देखो लेकिन गीत-संगीत मे उसकी आत्मा जीवित रहे. बिदेसिया के लिए हयवदन विदेशी न हो जाए.”

फिर मुस्कराए. हम दोनों लंका-लक्ष्मी देखने बहुमुख आ गए. रात तक़रीबन नौ बजे अलग होते हुए बाबा ने मुझे बस अड्डे का ठिकाना बताया, और न जाने क्या सोच कर बोले, “अगर हयवदन बिदेसिया में करना तो गिरीश को सूचना ज़रूर देना.”

इसके बाद दिमाग़ में जो सीटी बजी वो रूकी नहीं. जब तक स्क्रिप्ट नहीं पूरी हुई. भोजपुरी के एक वरिष्ठ गीतकार रामराव जी ने गीत लिखे. भोजपुरी की कितनी तो धुनें इस्तेमाल हुईं. ‘सोहर’ से लेकर ‘पचरा’ तक की धुनों का इस्तेमाल हुआ. संगीत रानू जॉनसन ने दिया था. शैलेष श्रीवास्तव जो अब भोजपुरी फिल्मों में हाथ आजमा रहे हैं नाटक के निर्देशक थे.

हाँ गिरीश कर्नाड को सिर्फ एक प्रतीकात्मक पत्र डाला गया. उनके बैंगलोर और संगीत नाटक अकादमी दोनों पतों पर. दरअसल किताब पर लिखा होता था लेखक की अनुमति ज़रूरी है, सो डर भी लगता था.

नाटक के तीन प्रदर्शनों के बाद एक पावती आई, “पता चला कि आप लोग अपनी लोकभाषा में हयवदन का अनुवाद और प्रस्तुति कर रहे हैं. धन्यवाद मेरी शुभकामनाएँ.”

पत्र अंग्रेजी में टाइप था. लेकिन रोमांचक था. वो अब भी किसी जगह दबा होगा. गोरखपुर का घर तो बिक गया हमारा, अब हम उस लोक से कट चुके हैं. लेकिन गिरीश हयवदन को बिदेसिया में, भोजपुरी में अवतरित करवा पाने में कामयाब रहे, बाबा बस बहाना थे.

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