'शोले' ने शुरू किया था हिन्दी सिनेमा का नया युग, अरबों के मालिक बन गए नकल करने वाले

'शोले (Sholay)' ने भारत में सिनेमा (Indian Cinema) बनाने का एक नया व्याकरण दिया. इंडियन न्यू वेव के बरअक्स 'शोले' ऐसी फिल्म बनकर आई जिसने 'स्पैगटी वैस्टर्न' सिनेमा को मेनस्ट्रीम सिनेमा बना दिया.

Janardan Pandey | News18Hindi
Updated: August 18, 2019, 4:24 PM IST
'शोले' ने शुरू किया था हिन्दी सिनेमा का नया युग, अरबों के मालिक बन गए नकल करने वाले
शोले ने इंडिया में करी वैस्टर्न सिनेमा का युग शुरू कर दिया.
Janardan Pandey | News18Hindi
Updated: August 18, 2019, 4:24 PM IST
फिल्म 'शोले' (Sholay) 15 अगस्त 1975 को रिलीज हुई थी. अब इसके रिलीज हुए 44 साल हो गए हैं, लेकिन आज भी 'शोले' ने अपनी रोचकता बरकरार रखी है. उससे भी बड़ी बात कि 'शोले' ने इंडियन न्यू वेव के बरअक्स एक ऐसे मेन स्ट्रीम हिन्दी सिनेमा (Hindi Cinema) स्टाइल को जन्म दिया, जो आज सबसे ज्यादा लोकप्रिय सिनेमा (Popular Cinema) की विधा हो गई. आज इस विधा को कमाई करने के लिए सबसे मुफीद माना जाता है. 80 और 90 के दशक में ज्यादातर फिल्में इसी विधा पर बनीं और सुपरडुपर हिट रहीं. पश्‍चिम में सिनेमा बनाने की इस विधा को 'स्पैगेटी वैस्टर्न' (Spaghetti Western) कहते हैं. भारत में अब ऐसी फिल्मों को 'मसाला फिल्म या करी वैस्टर्न' कहने लगे हैं. शोले से पहले हिन्दी सिनेमा में इस धारा पर इस तरह की फिल्में नहीं बन पा रही थीं. इसलिए हिन्दी सिनेमा की इस धारा को इतना मशहूर कराने का श्रेय शोले को ही जाता है.

'शोले' एक्शन, कॉमेडी, रोमांस, ड्रामा और मेलोड्रामा का ऐसा मिश्रण है, जिसे तब सिनेमा के नये व्याकरण से तैयार किया गया था.

मशहूर फिल्म समालोचक और लेखिका अनुपमा चोपड़ा 'शोलेः द मे‌किंग ऑफ क्लासिक' में इस पर कई हॉलीवुड फिल्मों की छाप बताती हैं. इनमें 'सेवेन समुराई', 'द मैग्नीफिशेंट सेवेन', 'वन्स अपॉन अ टाइम इन वेस्ट', 'वाइल्ड बंच', 'बुच कैसिडी एंड सनडान्स किड', 'बैड डे एट द ब्लैक रॉक' आदि प्रमुख हैं. इनमें से ज्यादातर फिल्में डकैती आधारित हैं. इसीलिए कुछ लोग बॉलीवुड की 'मदर इं‌‌डिया', 'जिस देश में गंगा बहती है', 'मेरा गांव मेरा देश', 'कच्चे धागे' की परछाई भी 'शोले' पर बताते हैं.



शोले के कथानक भारतीय महाकाव्यों से प्रेरित
असल में अगर शोले के 44 साल बाद भी इतने लोकप्रिय होने के पीछे फिल्म कथानक को एक तत्व माना जाए, तो इस पर किसी दूसरी फिल्म के प्रभाव के बजाए भारतीय जनमानस में ऐसे किरदारों की ग्राह्यता है, जो निःस्वार्थ दूसरे की सहायता करते हैं. सलीम-जावेद ने अगर असल में कहीं से प्रेरणा ली है तो भारतीय महाकाव्यों, किंवदंतियों और कथा-रुढ़ियों से. बाल्मिकी रामायण में ऋषि विश्वामित्र ने राक्षसों से सुरक्षा और उनके नाश के लिए राम और लक्ष्मण को लेकर आए थे. 'शोले' में ठाकुर बलदेव सिंह डाकू गब्बर सिंह के प्रकोप से रामगढ़ को बचाने और उसके नाश के लिए जय और वीरू को लेकर आए थे.

amitabh bachchan and dharmendra
शोले के कथानक पर कई छाप बताए जाते हैं.

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इसके बाद शोले के डायलॉग इस तरह से लिखे और कलाकारों के द्वारा बोले गए कि कालांतर में मुहावरे का रूप ले लिए. दिग्गज फिल्मकार शेखर कपूर ने यहां तक कहा कि भारतीय सिनेमा के इतिहास की जब गहन समीक्षा की जाएगी तो इसे दो युगों में बांटा जाएगा- शोले के पहले और शोले के बाद (Before Sholay and After Sholay). हालांकि 'शोले' के इतना लोकप्रिय होने के पीछे सिनेमा का ये नई ग्रामर थी.

लेमोटिफ, लो एंगल कैमरा और हिन्दी सिनेमा का नया विलेन
204 मिनट की 'शोले' में 66 मिनट बाद पर्दे पर विलेन की एंट्री होती है. लेकिन एंट्री सीन को ध्यान से देखिए. लो-एंगल कैमरा, सिनेमाघर के अंधेरे में बैठे दर्शक कानों में खौफ पैदा करता लेमोटिफ ध्वनि, गब्‍बर की मांद में पैन करता कैमरा, पथरीले भरकों में गंदी कमीज, बढ़ी हुई दाढ़ी, खैनी चबाकर अजीब किस्म से थूकता गब्‍बर. पहला ही दृश्य यह एहसास करा देता है कि हिन्दी सिनेमा के नये विलेन का जन्म हो चुका है.

कई बार इसकी तुलना बिरजू (मदर इं‌‌डिया 1957), राका (जिस देश में गंगा बहती है 1960), जब्बर सिंह (मेरा गांव मेरा देश 1971) ठाकुर लक्ष्मण सिंह (कच्चे धागे 1973) से की जाती है. लेकिन यह तुलना एकदम सतही हैं. गब्बर की जिंदगी का कोई पुराना स्याह पक्ष या किसी मकसद के लिए डकैती करना नहीं था. वह खूबसूरत नहीं था, वह किसी से प्यार नहीं करता था. गब्बर एक फूहड़ और सैडिस्टिक किस्म का विलेन था, जिसका मकसद ही डकैती था.

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गब्बर का खौफ कालिया के चेहरे पर दिखता है.


अनिरुद्ध भट्टाचार्जी और बालाजी विट्ठल की किताब 'आरडी बर्मनः द मैन, द म्यूजिक' में लिखा है गब्बर के लेमोटिफ के लिए आरडी बर्मन ने सेलो और हाइड्रोफोन म्यूजिक का इस्तेमाल किया था. यह म्यूजिक पहले हिन्दी सिनेमा में इस्तेमाल नहीं होती थी. यह किसी खास किरदार के आने का संकेत देती है. 'शोले' के बाद यह कई फिल्मों में आजमाई गई. इसका बेहद उदाहरण दक्षिण भारतीय फिल्म बाहुबली है, जिसमें अमरेंद्र बाहुबली के एंट्री पर खास म्यूजिक बजती है.

शोले में लेमोटिफ का इस्तेमाल महज गब्बर के लिए ही नहीं इसी विधा से कम बोलने वाले किरदार जय (अमिताभ बच्चन) के मनोभावों को भी बयां किया गया है.

गिटार-मृदंग के संगीत में बकरी के मिमियाने की आवाज
रामगढ़ काल्पन‌िक गांव था. बंगलुरु से करीब 50 किलोमीटर दूर रामनगम के पास इसे निर्माता जीपी सिप्पी ने निर्देशक रमेश सिप्पी के मनमुताबिक बसाया था. ऐसे में गांव के परिवेश में दर्शक को पहुंचाना आसान काम नहीं था. गांव के पास ही गब्बर की मांद को उसी तरह से स्‍थापित करना निर्देशक के लिए टेढ़ी खीर थी.

लेकिन क्रिएटिविटी देखिए. पहला टेक ही एक मिनट से ज्यादा का. 'शोले' का ओपनिंग सीन सबसे पहले रामगढ़ के भूगोल, समाज और अर्थव्यवस्‍था को स्‍थापित कर देता है. ट्रेन से उतरे पुलिसकर्मी के साथ एक ग्रामीण घोड़े पर सवार होता है. फिल्‍म के क्रेडिट के साथ रामगढ़ के पथरीले रास्ते, डाकुओं की मांद और मेहनती मजदूर और उनका पूरा रहन-सहन स्‍थापित कर दिया जाता है.

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रामगढ़ बंगलुरु के पास रामनगम नाम के जिले में आती है.


इसी सीन में एक बेहद खास किस्म का प्रयोग किया गया था. क्रेडिट सीन में रामगढ़ को पर्दे पर स्‍थापित करने के लिए दो घुड़सवारों की यात्रा के साथ गिटार और मृदंग से निकलने वाले संगीत का इस्तेमाल किया है. इस संगीत में नवाचार करते हुए बकरी के मिमियाने की आवाज सुनवाई जाती है. इस संगीत के साथ वह इस कदर दिमाग में घुसती है कि देखने वाले वहां पहुंच जाते हैं. आरडी बर्मन ने ये खास धुन बनाई थी.

इस गांव के किरदारों के विस्तार को देखेंगे तो ठाकुर, रामलाल, राधा, रहीम चाचा, अहमद, बसंती, मौसी, काशीराम, धौलिया और इस गांव को लूटने वाला गब्बर. किरदारों की ये बुनावट एक गांव को पूरा कर देती हैं. एक-एक किरदार के ऐसे विस्तार वाली फिल्में बॉलीवुड में तब नहीं बनती थीं.

लालटेन की मध्यम रोशनी में माउथ ऑर्गन
'शोले' को बनाते वक्त निर्देशक रमेश सिप्पी ने कुछ महीन प्रयोग किए थे. रामगढ़ में वीरान हो चुकी ठाकुर की हवेली में राधा रोज लालटेन जलाती थी. राधा कभी बहुत बोलती थी. लेकिन गब्बर की दशहत ने उससे उसकी जिंदगी छीन ली है. ऐसे में गांव में आया एक ऐसा परदेशी जो खुद बहुत कम बोलता है, इन दो किरदारों के लिए प्रेम के इकरार के लिए लालटेन की मध्यम रोशन में जय माउथ ऑर्गन बजाता है. माउथ ऑर्गन से निकलने वाला संगीत से रोशनी में घुल जाता है.

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जय अपने प्यार का इजहार माउथ ऑर्गन बजाकर करता है.


रमेश सिप्पी ने इस दृश्य में एक रूपक तैयार किया है. कई बार इसकी तुलना क्वांटिन टेरेंटीनो ने किल बिल-2 में बिल की फ्लूट से की जाती है. लेकिन एक ओर वीरू और बसंती के बोलक्कड़ प्यार तो दूसरी ओर से ये बिना कुछ कहे प्यार दिखाने के सिप्पी ने जो नया व्याकरण गढ़ा वह कामयाब था.

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असल में 'शोले' एक ऐसी मसाला फिल्म थी, जिसे विश्व के सिनेमा के जानकारों ने 'कल्ट क्लासिक' मान लिया है. आज जब इस फिल्म के रिलीज हुए 44 साल से भी ज्यादा का समय बीत चुका है, तब सबसे ज्यादा दिनों तक थिएटर में टंगे रहने या हिन्दुस्तान में बॉक्स ऑफ‌िस पर सबसे ज्यादा कमाई करने वाली फिल्म के मामले में दूसरी कोई फिल्म इसके करीब भी नहीं पहुंचती.

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First published: August 17, 2019, 8:59 PM IST
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