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वह डायरेक्टर जिसके चलते सलमान को 'पागलखाने' जाना पड़ा था!

फिल्म 'तेरे नाम' के एक सीन में सलमान ख़ान

फिल्म 'तेरे नाम' के एक सीन में सलमान ख़ान

इसी डायरेक्टर ने किया था अनुराग कश्यप को 'गैंग्स ऑफ वासेपुर' बनाने के लिये मोटिवेट. भारत में डार्क फिल्मों का बादशाह कोई हो सकता है, तो वह यही है.

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अनुराग कश्यप की बहुचर्चित फिल्म 'गैंग्स ऑफ वासेपुर' (2012) के क्रेडिट में मदुरै के डायरेक्टरों की तिकड़ी बाला, अमीर और ससिकुमार को 'अपनी जड़ों की ओर लौटकर फिल्म बनाने को प्रेरित करने के लिये' विशेष धन्यवाद कहा गया था. इनमें से आज बाला का जन्मदिन है. बाला वह डायरेक्टर हैं, जिन्हें तमिल फिल्म इंडस्ट्री यानि कॉलीवुड का भयानक डायरेक्टर माना जाता है, जो अपने कलाकारों को किरदार की मांग के हिसाब से ढालने के लिये श्मशान में रखता है, देह पर भस्म मल देता है और तो और कई दिनों तक भूखा भी रखता है.

परफेक्शन ऐसा कि किसी की जान पर बन आई
मौजूदा दौर में दक्षिण कोरिया के सबसे फेमस डायरेक्टरों में से एक हैं, किम की डुक. अचानक उन्होंने सिनेमा छोड़ दिया, दो साल के लिए. इस दौरान उन्होंने दूर पहाड़ी पर एकांत में एक घर बनाया और वहीं रहने लगे. कारण था कि एक सीन में मौत का परफेक्शन लाने के लिये उन्होंने एक्ट्रेस को दवा दी और वह एक्ट्रेस कोमा में चली गई. अपनी महत्वाकांक्षा से क्षुब्ध किम ने फिल्मों से लगभग संन्यास ले लिया. इसी दौरान उन्होंने एक डॉक्यूमेंट्री फिल्म बनाई, जिसका नाम था 'आरिरंग' (2010).  इसमें वे अपने जीवन से जुड़े कई पहलुओं पर परेशान होते हैं और यह भी मानते हैं कि वे अपने फिल्मी प्रोजेक्ट्स को लेकर इतने महत्वाकांक्षी हो गये थे कि किसी को उनके लिये मौत की हद तक भी ले जा सकते थे. दुनिया में सिनेमा के प्रति दीवानगी रखने वाले कई डायरेक्टर हैं. इसे अच्छी बात मानें या बुरी, बाला भी उनमें से एक हैं.

डायरेक्टर बाला ने भी अपनी फिल्म 'परदेसी' की रिलीज से पहले 'द हिंदू' को दिये एक इंटरव्यू में स्वीकार किया था, "फिल्म के क्लाइमैक्स में परफेक्ट लुक देने के लिये हमने वास्तव में एक्ट्रेस दंशिका को कई दिनों तक भूखा रखा था. हमने उसे ड्रिप पर रखा था! पर एक्टर मेरी सोच में विश्वास रखते हैं और वे महसूस करते हैं कि मैं ऑडियंस को उन्हें स्टार जैसा नहीं किरदार जैसा दिखाना चाहता हूं."



अनुराग कश्यप यूं हुये थे बाला से इंस्पायर
हो सकता हो ऐसा परफेक्शन आपको कुछ अजीब लग रहा हो पर इसका एक खुशनुमा पहलू भी है. जिसे अनुराग कश्यप ने टाइम्स ऑफ इंडिया से बातचीत में एक दफे जाहिर किया था. अनुराग कश्यप ने कहा था, "किसी ने बनारस को उस तरह से नहीं फिल्माया है जैसा इसे 'नान कडवल' (2009) में बाला ने फिल्माया है. इस फिल्म में प्रमुख किरदार कई साल बनारस में रहता है. अनुराग भी अपने जीवन के शुरुआती दौर में बनारस में रहे हैं. और उन्होंने इसी से प्रेरित हो अपने जीवन की जगहों को फिल्म 'गैंग्स ऑफ वासेपुर' (2012) में दिखाया.

बाला की फिल्मों में डायलॉग कम होते हैं , बेहद कम होते हैं
बाला बहुत कम बोलते हैं और उनकी फिल्मों के किरदार भी. एक बार उन्होंने द हिंदू से बातचीत में कहा था, "सिनेमा एक विजुअल मीडियम है इसलिये मैं डायलॉग कम से कम रखता हूं. इतना कुछ किरदार अपने चेहरे के हाव-भाव और बॉडी लैंग्वेज से कह सकते हैं. जिस तरह से वे देखते हैं, चलते हैं, मुस्कुराते हैं... सिर्फ कुछ लाइनों से कहीं ज्यादा बोल सकते हैं."

बाला की फिल्में एक रोलर-कोस्टर राइड होती है. इनकी फिल्मों में एक्शन धूसर होता है, एकदम वैसा जैसा आप अपने आस-पास लोगों को लड़ते देखते हैं. किरदार सजी-सजाई फाइट नहीं कर रहे होते. देखिये डायरेक्टर बाला की फिल्मों के कुछ बेहतरीन सीन -



क्यों बाला की फिल्मों में देखने को मिलता है निराशा का चरम?
बाला की फिल्म 'सेथु' में कॉलेज का तेज-तर्राक लड़का बेबस पागलखाने लौटता है. 'नंदा' अपनी ही मां को अतीत भुलाने के लिये तैयार नहीं कर पाता है. 'पिथामगन' में एक अजीब श्मशान पर लाशें जलाने वाला कैसे अपनी नॉर्मल जिंदगी में लौट ही रहा होता है कि उसके साथ अजीब दुर्घटना हो जाती है. ऐसे ही वह अघोरी है, जो 'नान कडवल' में मोक्ष देता है. बाला कहते हैं, "जब मैं काम करता हूं तो मेरा फोकस अपने किरदारों पर होता है. विक्रम और सुरैया से लेकर आर्या और विशाल तक मेरे सारे हीरो अच्छे एक्टर हैं. एक डायरेक्टर की जॉब अपने आर्टिस्ट के स्किल को दूसरे लेवल पर ले जाना होती है." बाला ने कई एक्टर्स को उनके ड्रीम ब्रेक दिये हैं. पर बाला की फिल्मों में दिखने वाली यह निराशा जो आपको 'सेथु' पर बनी 'तेरे नाम' में भी देखने को मिली थी, यह कुछ-कुछ बाला के निजी जीवन का भी प्रभाव है.

बाला ने एक इंटरव्यू में स्वीकार किया था, "मैं एक बुरा स्टूडेंट रहा हूं. कॉलेज में मैं 36 में से केवल 1 पेपर में पास हुआ था. ड्रग और हिंसा उस जीवन की सच्चाई रहे हैं, जिसे मैंने जिया. तीन साल बाद, मेरा दिमाग बिल्कुल खाली था. यही वक्त था जब मैंने अपने जीवन की दिशा को बदलने का निश्चय किया. सिनेमा एक खुला हुआ मैदान है. आप किसी भी रोल में घुस सकते हैं और फिट हो सकते हैं. मैंने बालू महेंद्र के सेट असिस्टेंट के तौर पर ज्वाइन किया था और धीरे-धीरे अपनी राह पर आगे बढ़ा. वे ही थे जिन्होंने मेरे सिनेमा के पैशन में चिंगारी लगा दी."

बाला की फिल्म 'सेथु' में विक्रम ने निभाया था कॉलेज के लड़के का सलमान वाला किरदार


'सेथु' में हीरो के वापस पागलखाने चले जाने को पचाने में दर्शकों को लगा था वक्त
बाला की डेब्यू फिल्म 'सेथु' (1999) रिलीज होने के बाद सबसे पहले एक सबअर्बन थियेटर में लगी थी. जिसका दोपहर में एक सिंगल शो होता था. पर बाद में चलकर यह फिल्म एक बड़ी हिट बनी और तमिल में बनी बेस्ट फीचर फिल्म का नेशनल अवॉर्ड जीता. डायरेक्टर बाला देर से फिल्म चलने के बारे में खुद कहते हैं, "लोगों को फिल्म का अंत स्वीकारने में थोड़ा वक्त लगा था. डायरेक्टर सतीश कौशिक ने बाद में इसी फिल्म की हिंदी रीमेक 'तेरे नाम' (2003) बनाई थी.

इसके बाद बाला ने 'नंदा' (2001), 'पिथामगन' (2003), 'नान कडवल' (2009), 'अवान इवान' (2011), 'परदेसी' (2013), 'थराई थपट्टाई' (2016) और नाचियार' (2018) फिल्में बनाईं. 'वर्मा' बाला की अगली फिल्म है, जो 2019 में रिलीज होगी. चाय के मजदूरों की जिंदगी पर बेस्ड बाला की 'परदेसी' 1940 के दौर की कहानी है, जो पॉल हैरिस डेनियल की किताब 'रेड टी' पर आधारित है. इसमें उस दौर के चाय मजदूरों की जिंदगी को दिखाया गया था जिनके सामने कोई भविष्य और आशा नहीं बची थी. यानी बाला का सिग्नेचर कांसेप्ट 'डार्कनेस' इसमें भी था. फिलहाल सुनिये 'सेथु' का विक्रम पर फिल्माया यह गाना, जो 'तेरे नाम' में सलमान खान पर फिल्माया 'क्यों किसी को वफा के बदले वफा नहीं मिलती...' बना -



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