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Film Review : 'मुल्क' आंखों के लिए अच्छा सुरमा है पर इसमें थोड़ी किरकिरी भी है

Film Review : 'मुल्क' आंखों के लिए अच्छा सुरमा है पर इसमें थोड़ी किरकिरी भी है

फिल्म रिव्यू: 'मुल्क

फिल्म रिव्यू: 'मुल्क

फिल्मों में लगातार पारंपरिक लोक गायन के प्रयोग का चलन बढ़ता जा रहा है. और इस फिल्म में भी ऐसा ही प्रयोग किया गया है.

    भारतीय सिनेमा में सांप्रदायिकता को अतिरिक्त भावुकता के साथ दिखाने का चलन है. उदाहरण के तौर पर आप फिल्म क्रांतिवीर में नाना पाटेकर का बहुचर्चित सीन को ले सकते हैं. जब वे एक आदमी की उंगली पर ईंट मारकर खून निकाल लेते हैं. फिर उसका और अपना खून लेकर यह पूछते हैं, "ये हिंदू का खून है, ये मुस्लिम का खून है. बता दोनों में क्या अंतर है? बता जब बनाने वाले ने फर्क नहीं किया तो तू कौन होता है फर्क करने वाला?" लेकिन सांप्रदायिकता के प्रति समाज में कोई खास कमी नहीं देखी गई बल्कि दिनों-दिन इसका और विकास ही होता गया. इसी प्रश्न के इर्द-गिर्द फिल्म 'मुल्क' की कहानी घूमती है. यह कहानी नाटकीयता से भरी है फिर भी सीधी है. आपको बेहद कम चौंकाती है.

    फिल्म में दिखाया गया है कि ऋषि कपूर वाराणसी के एक सम्मानित नागरिक हैं और इस्लाम मानने वाले हैं. वे अपने भाई (जिसका किरदार मनोज पाहवा ने निभाया है) के साथ अपने पुश्तैनी घर में रहते हैं. ऋषि कपूर का बेटा लंदन में रहता है, जिसने एक हिंदू (तापसी पन्नू) से शादी की है. तापसी ने शादी के लिेये अपना मजहब नहीं बदला था. लेकिन अब दोनों में अपने बच्चे के धर्म को लेकर कहासुनी हो गई है. जिसके बाद तापसी कुछ महीने भारत रहने चली आती हैं. लेकिन इसी बीच ऋषि के छोटे भाई, मनोज पाहवा का बेटा जो आतंकवादी बन जाता है एक बम विस्फोट कर कई लोगों की हत्या कर देता है. वह खुद भी एक एनकाउंटर में मारा जाता है. जिसके बाद ऋषि कपूर-मनोज पाहवा के परिवार पर आतंकवादी होने का आरोप लगता है. तापसी पन्नू जिसके पास लॉ की डिग्री है, उनकी पैरवी कर उन्हें निर्दोष साबित करने की कोशिश करती है.

    तापसी बोलीं, मुस्लिम समुदाय के साथ भेदभाव 'मुल्क' करने के पीछे सबसे बड़ा कारण रहा

    एक्टिंग की बात करें तो फिल्म बेहतरीन एक्टर्स का गुलदस्ता है. तापसी पन्नू, ऋषि कपूर, नीना गुप्ता, प्राची शाह, मनोज पाहवा, रजत कपूर, कुमुद मिश्रा, प्रतीक बब्बर, अतुल तिवारी और अनिल वर्मा एक साथ फिल्म में कास्ट कर लिए गये हैं. जाहिर है एक्टिंग में क्या ही कमी हो सकती थी? भरत झा अपने चयन को सही साबित कर देते हैं. ऋषि कपूर के बारे में लग रहा था कि क्या वे एक ऐसे किरदार के साथ न्याय कर पायेंगे. लेकिन जिस तरह से उन्होंने यह किरदार निभाया है, वे साबित कर देते हैं कि चाहे ट्विटर पर कुछ भी करें, कपूर खानदान की एक्टिंग की विरासत के साथ वे पूरा न्याय करते हैं. बहू के किरदार में तापसी पन्नू से जो किरदार छूटता सा दिखता है. वहीं वे कोर्टरूम ड्रामा में फिर से अपना किरदार पकड़ लेती हैं. उन्हें देखकर पिंक में कटघरे में खड़ी तापसी याद आ जाती हैं. बाकि मनोज पाहवा, रजत कपूर, कुमुद मिश्रा, प्राची शाह स्पष्ट प्रभाव छोड़ते हैं. जज के किरदार में रांझणा फेम कुमुद मिश्रा वैसा ही प्रभाव छोड़ते हैं. अतुल तिवारी जब डायलॉग बोलते हैं तो पूरा प्रभाव आता है पर उनके किरदार से वैसा आनंद नहीं मिलता जैसा थ्री इडियट्स के मंत्री जी से मिला था.

    इवान मुलिगन की सिनेमैटोग्राफी अच्छी है. यह उनके मेनस्ट्रीम करियर की एक अच्छी शुरुआत हो सकती है. लेकिन शुरुआती 15-20 मिनट में जिस तरह से बनारस का टच बनाया जाता है, वह आखिरी तक आते-आते बिल्कुल खत्म हो जाता है. 15 मिनट की फिल्म के बाद लगता है कि यह कोई भी शहर हो सकता था. जिन्होंने यूपी घूम रखा है वह बता सकते हैं कि फिल्म अब वाराणसी के बजाए लखनऊ चली गई है. क्योंकि वाराणसी में कुछ नए बने हाईवे छोड़ दें तो सीधी सड़कें मिल जाना नामुमकिन चीज है. कैमरा कहीं कहीं हिलता सा नज़र आता है और कहीं बीच में आने वाले तार सीन का मज़ा किरकिरा करते हैं.

    डायलॉग में पूरी संजीदगी बरती गई है. डायलॉग लंबे हैं. मारक हैं. लेकिन कहीं-कहीं इतने लंबे हो जाते हैं कि प्रभाव कम होने लगता है. फिल्म में प्लॉट को स्थापित करने से लेकर, कहानी के विस्तार तक के लिए डायलॉग ही डायलॉग हैं. शायद कुछ कम होते तो और प्रभावी लगते.

    बल्लू सलूजा एडिटिंग में अच्छा करते हैं. इससे पहले भी उन्होंने स्वदेश, लगान, पिंजर और दंगल जैसी बड़ी फिल्में एडिट की हैं. लेकिन शुरुआती फिल्म में एडिटिंग में क्रिएटिव ग्लू की कमी खलती है. ऐसा लगता है कि कई अलग-अलग चीजों को साथ रख भर दिया गया है. कभी-कभी तो फिल्म से सिनेमा के बजाए रंगमंच जैसा अनुभव हासिल होने लगता है. फिल्म को थोड़ी क्रिएटिव चतुराई के साथ अगर छोटा किया जा सकता तो बहुत अच्छा होता.

    निखिल एस. कोवाले फिल्म के आर्ट डायरेक्टर हैं. कई जगहों पर निस्संदेह वे प्रभाव छोड़ते हैं. लेकिन कई जगहों पर चीजें प्रयास के बावजूद भी अप्रभावित करती लगती हैं. दुकानों की डीटेलिंग ठीक लगती है. लेकिन अधिकांश जगहों पर बड़ा स्थूल सा प्रभाव आता है. थोड़ा और काम किया जा सकता था.

    फिल्मों में लगातार पारंपरिक लोक गायन के प्रयोग का चलन बढ़ता जा रहा है. और इस फिल्म में भी ऐसा ही प्रयोग किया गया है. जो वाराणसी के बैकग्राउंड पर फिट बैठता है. फिल्म में आपको कव्वाली, निर्गुण सब मिलेगा. लेकिन संगीत में ऐसा कुछ नहीं है जिसे आप फिल्म के बाद याद रख पाएं. मंगेश धाकड़े ने फिल्म का म्यूजिक दिया है.

    अनुभव सिन्हा ने इससे पहले बड़े ही मेनस्ट्रीम सब्जेक्ट्स को लेकर फिल्में बनाई हैं. उनके साहस और क्रिएटिविटी की तारीफ की जानी चाहिये. और जिस तरह से वे लगातार फिल्म को लेकर बहुत संजीदा दिख रहे हैं, लग रहा है कि उन्हें अपनी मेहनत पर विश्वास है. कम से कम डायलॉग्स के जरिए फिल्म यह बात बताने में फिल्म जरूर होती है कि क्राइम और धर्म आपस में रिलेटेड नहीं हैं. भले ही क्रिमिनल, धर्म का सहारा अपने क्राइम के लिए लेते हों. फिल्म जरूर देखी जानी चाहिये. क्योंकि फिल्म में एक प्रासंगिक विषय पर चर्चा की गई है. फिल्म देखते हुये आपको अपने दिमाग के पर्दे खुले भी रखने चाहिये. क्योंकि असावधानी से देखने पर गलत मैसेज भी घर ले जा सकते हैं. इसके अलावा आप ऋषि कपूर सहित कई उम्दा कलाकारों की अच्छी एक्टिंग के लिए भी फिल्म देखने जा सकते हैं.

    कुछ चिंताएं :
    फिल्म में लगातार स्टीरियोटाइप उभरते रहते हैं तो चुभते भी हैं. फिल्म इस तर्क को स्थापित करती दिखती है कि मुस्लिमों के ज्यादा बच्चे होते हैं और उनमें शिक्षा का स्तर बहुत कम है. यानि सांप्रदायिकता के विरोध में बनी और बहुत हद तक अपनी बात को कह लेने वाली फिल्म में भी यह कम्युनिकेशन प्रॉब्लम रह ही जाता है. यह फिर भी ठीक होता अगर फिल्म इसका कारण और इससे जुड़े कुछ मिथकों को भी समझा पाती. फिल्म के अंत में तथाकथित ‘अच्छे’ और ‘बुरे’ मुसलमान को लेकर लंबा संवाद है लेकिन फिल्म में ‘अच्छे’ मुसलमान के रूप में सिर्फ ऋषि कपूर का परिवार ही सामने आता है.

    Tags: Film review

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