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न्यूटन
4/5
पर्दे पर:22.09.17
डायरेक्टर : अमित मसुरकर
संगीत : नरेन चंदावरकर, बेंडिक्ट टेलर
कलाकार : राज कुमार राव, पंकज त्रिपाठी, अंजली पाटिल, रघुबीर यादव
शैली : डार्क कॉमेडी
यूजर रेटिंग :
0/5
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FILM REVIEW: हंसाते-हंसाते आपको झोला भरकर सवाल दे जाता है 'न्यूटन'

भारत की ऑस्कर में आधिकारिक एंट्री थी न्यूटन
भारत की ऑस्कर में आधिकारिक एंट्री थी न्यूटन

कई सवाल उठाती है फिल्म न्यूटन की कहानी

  • News18Hindi
  • Last Updated: February 7, 2019, 4:22 PM IST
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अंकित फ्रांसिस

क्या आपने कभी देश के भीतर मौजूद उन इलाकों की कल्पना की है जहां लोगों को आज भी नहीं पता कि दिल्ली में बनी सरकार का सही-सही मतलब क्या होता है? उन्हें क्यों नहीं पता कि पहला आईफोन कब लॉन्च हुआ और नोकिया कब बंद हो गयी. या फिर नोटबंदी और GST जैसे फैसलों से उनकी जिंदगी में क्या बदल जाने वाला है?

'न्यूटन' ऐसी ही एक दुनिया की बात करती है जहां तक देश का संविधान हाल ही में नया-नया पहुंच रहा है. संविधान 70 साल पहले मिली आज़ादी के बाद से अब तक कहां रहा, यहां पहुंचने में क्यों लेट हो गया या फिर किन लोगों की वजह से लेट हो गया? इन्हीं कुछ सवालों के साथ ये कहानी एक ऐसे शख्स के इर्द-गिर्द घूमती है जो कि शायद खुद भी ठीक से इन सवालों को समझता नहीं है लेकिन फिर भी इसे एक कर्त्तव्य की तरह सुनिश्चित करना और कराना चाहता है.



फिल्म 'दंडकारण्य' की बात करती है. दंडकारण्य 92,300 वर्ग किलोमीटर में फैला इलाका है जो कि छत्तीसगढ़, आंध्र प्रदेश और ओडिशा में पड़ता है, हालांकि इसका एक सिरा तेलंगाना की सीमा को भी छूता है. इसे ऐसे समझिए कि ये इलाका क्षेत्रफल के मुताबिक करीब 7 दिल्ली जैसे शहरों के बराबर होगा. फिल्म की कहानी जिस इलाके की बात करती है वो शायद अबूझमाड़ की पहाड़ियों वाला इलाका है.
बीते 40 सालों से ये इलाका माओवादियों का गढ़ माना जाता रहा है और अभी भी इसके काफी हिस्से पर उन्हीं का कब्ज़ा है. फिल्म के डायरेक्टर अमित मसुरकर ने एक इंटरव्यू में बताया भी था कि लोकेशन और स्क्रिप्टिंग के नज़रिए से वो खुद भी नारायणपुर के आस-पास एक ऐसी जगह रहे जहां माओवादियों की जनताना सरकार का राज है.

फिल्म की कहानी न्यूटन उर्फ़ नूतन कुमार जो कि राजकुमार राव से ही शुरु होती है. न्यूटन छोटे शहर का रहने वाला एमएससी पास लड़का है जो कि बेहद आदर्शवादी है या फिर फिल्म में ही बेहद छोटे से रोल में दिखे संजय मिश्रा के शब्दों में कहें तो 'ऐसा आदमी जिसे अपनी ईमानदारी का घमंड है.'

फिल्म के पहले शॉट में जब कैमरा न्यूटन के कमरे में टहलता है तो उसके बाबा साहब अंबेडकर की एक तस्वीर भी दिखाई देती है. अमित मसुरकर खुद भी एक इंटरव्यू में मानते हैं कि उन्हें इस फिल्म का आइडिया संविधान की प्रस्तावना पढ़कर आया था.

इसके अलावा स्क्रिप्ट लिखने से पहले उन्होंने नंदिनी सुंदर और राहुल पंडिता को भी पढ़ा. न्यूटन इलेक्शन कमीशन में पोलिंग ऑफिसर है और दंडकारण्य के इसी इलाके के एक गांव में अपनी टीम के साथ पहुंचता है.

यहीं से शुरु होता है देश में लागू डेमोक्रेसी की एक छोटी सी यात्रा. न्यूटन की टीम को सुरक्षा देने का काम कर रही सुरक्षा टीम के चीफ होते हैं असिस्टेंट कमान्डेंट आत्मा सिंह यानी के पंकज त्रिपाठी. पंकज और राजकुमार इस कहानी के दो छोर की तरह बार-बार सामने आते हैं.

हालांकि फिल्म बार-बार ये भी कहती है कि दोनों सिर्फ अपनी 'ड्यूटी' कर रहे हैं. बर्लिन फिल्म फेस्टिवल में पुरस्कार पा चुकी ये फिल्म 'ब्लैक कॉमेडी' जॉनर की कही जा रही है. लोकनाथ के किरदार में रघुबीर यादव फिल्म को ये टच देते भी हैं लेकिन इसे 'पल्प फिक्शन' समझकर देखने नहीं चले जाइएगा.

चार्ली चैपलिन ने जो जिंदगी के बारे में कहा था वो बात इस फिल्म पर भी लागू होती है, ये फिल्म भी करीब से देखने पर एक त्रासदी जबकि दूर से देखने में पर कॉमेडी नज़र आती है. आप इस फिल्म को देखकर मुस्कुराकर लौट भी सकते हैं या फिर ये आपको झोला भरकर सवाल भी दे सकती है.

फिल्म में आदिवासी लड़की मलको का रोल निभा रहीं अंजलि पाटिल भी बेहद प्रभावी नज़र आती हैं. असल में फिल्म टुकड़ों-टुकड़ों में ही सही बोझिल होने से बचते हुए अहम् सवालों पर बात करती है. न्यूटन के रिश्ते वाला सीन हो या फिर वोटिंग के दौरान आईजी का विदेशी पत्रकार को लेकर आना सभी तंजिया अंदाज़ में फेल होते इस सिस्टम पर सवाल करते हैं.

आदिवासी लड़की मलको का न्यूटन से ये सवाल कि आप-हम कुछ ही घंटों की दूरी पर रहते हैं लेकिन एक दूसरे के बारे में कुछ नहीं जानते, सिनेमाहॉल की सीट पर बैठे-बैठे आपको भी चुभ जाता है. ये सवाल कि क्यों गोंडी बोलने वाले बच्चों को हिंदी मीडियम स्कूलों में पढ़ाया जा रहा है या फिर वोट डालने आई एक बूढ़ी औरत का सवाल कि इससे होगा क्या? का ठीक-ठीक जवाब किसी के पास नहीं है.

फिल्म दिखाती है कि सिस्टम का रखवाला असिस्टेंट कमान्डेंट आत्मा सिंह भी वर्दी उतारकर जब घर आता है तो ऑलिव ऑयल की महंगाई उसे भी आपके-मेरे जितना ही परेशान करती है. कैसे बस्तर के आदिवासी हों या फिर सेना के जवान सभी एक चक्रव्यूह में फंसा दिए गए हैं.

बहरहाल फिल्म आपको थोड़ी सी स्लो लग सकती है. हर हफ्ते 20 की दर से फिल्म रिलीज वाले बॉलीवुड में 'न्यूटन' जैसी फिल्मों की उपस्थिति वैसी ही है जैसे दिल्ली की चमचमाती मेट्रो में मजदूर चढ़ आते हैं और नहा-धोकर तैयार होकर ऑफिसों को निकले लोग उन्हें देखकर नाक सिकोड़ने लगते हैं.

अगर आप भी उन नाक सिकोड़ने वाले लोगों में से हैं तो जाने से पहले सोच लीजियेगा और अगर आपको देश के नक़्शे से नहीं बल्कि लोगों से भी अपनापन है तो चले जाइए कई ज़रूरी सवालों से रूबरू होने का मौका मिलेगा.

अपनी शहरी सोच को थोड़ी देर आराम दीजियेगा नहीं तो त्रासदियों पर वैसे ही हंसेंगे जैसे इसी फिल्म के एक सीन में आदिवासी बुजुर्ग को EVM ना चला पाते देख लोकनाथ हंसता है.

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डिटेल्ड रेटिंग

कहानी :
4/5
स्क्रिनप्ल :
3/5
डायरेक्शन :
3.5/5
संगीत :
3/5
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