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FILM REVIEW: बस एक सीन है जो कमाल है, बाकी फार्मूला फिल्म है 'तुगलक दरबार'

तमिल फिल्मों में राजनीति का अपना महत्त्व है. (फिल्म पोस्टर)

तमिल फिल्मों में राजनीति का अपना महत्त्व है. (फिल्म पोस्टर)

Film Review 'तुगलक दरबार': विजय सेतुपति अपनी फिल्मों के चयन को लेकर जाने जाते हैं, लेकिन इस फिल्म 'तुगलक दरबार' से उनके करियर को नुकसान ही होगा.

  • News18Hindi
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सिंगारवेलन उर्फ़ सिंघम (विजय सेतुपति) के सर पर मंगलम (भगवती पेरुमल) एक पोलिटिकल पार्टी के जश्न में शराब की बोतल दे मारते हैं. काफी शोर-शराबे के बाद इन दोनों के बॉस यानी एमएलए रायप्पन (पार्थिबन), गुस्से में आकर मंगलम को अपनी पॉलिटिकल पार्टी से बेदखल कर देते हैं और सिंघम भी अपने घर लौट जाता है. रास्ते में उस अचानक किये वार की वजह से उसकी दिमागी हालत ख़राब हो जाती है और उसके अंदर एक और पर्सनालिटी जन्म ले लेती है. स्ट्रीट लाइट की रौशनी की वजह से उसकी दो परछाइयां होती नज़र आती हैं. स्प्लिट पर्सनालिटी पैदा होने का ये सीन लाजवाब है. इस एक सीन को छोड़ दें, तो ये पूरी फिल्म निहायत ही बकवास और टिपिकल फार्मूला फिल्म है. विजय सेतुपति अपनी फिल्मों के चयन को लेकर जाने जाते हैं, लेकिन इस फिल्म ‘तुगलक दरबार’ से उनके करियर को नुकसान ही होगा.

तमिल फिल्मों में राजनीति का अपना महत्त्व है. पहले फिल्म स्टार्स राजनीति में आये और साथ लाये अपना पॉलिटिकल एजेंडा चलाने वाली फिल्में. पिछले कुछ समय में राजनीति का एक ट्रैक हर फिल्म की स्टोरी लाइन से जुड़ा होता ही है. इस कड़ी में नवोदित लेखक निर्देशक डेल्ही प्रसाद दीनदयालन लाये हैं- अपनी पहली फिल्म, एक पोलिटिकल सटायर – तुगलक दरबार. तमिल फिल्मों का ड्रामा तो मज़ेदार होता ही है. एक चुनावी सभा में रायप्पन भाषण दे रहे हैं और सामने बैठी सिंघम की मां को अचानक प्रसव पीड़ा शुरू हो जाती है और रायप्पन अपनी धोती उतार कर महिलाओं को घेरा बनाने को कहते है, पूरी सभा के सभी पुरुषों की धोती का पर्दा बना कर डिलीवरी करवाई जाती है.

यहां से सिंघम के राजनीति की शुरुआत होती है और वो पूरी जिंदगी रायप्पन की नज़रों में चढ़ने की कोशिश करता रहता है. सिंघम और उसका जिगरी दोस्त वासु, मिलकर उसको पार्षद बनाने के लिए तमाम तरह के हथकंडे अपनाते रहते हैं. इसके बाद शुरू होता है रायप्पन का असली खेल जहां वो पार्षद के माध्यम से ज़मीनें हड़पना चाहता है खास कर उस गरीब इलाके की, जहां से सिंघम पार्षद है. सिंघम का ‘आल्टर ईगो’ यानी उसकी दूसरी पर्सनालिटी एकदम शरीफ है और असली सिंघम निहायत ही चालाक और काइयां. जैसा कि फिल्मों में होता है सिंघम की बुरी पर्सनालिटी पर अच्छी वाली पर्सनालिटी जीत जाती है और अंत में सब भला हो जाता है.

पूरी फिल्म में कई फार्मूला इस्तेमाल किये गए हैं. नायक द्वारा गुंडों की धुलाई ज़रूर होनी चाहिए. एक अदद हीरोइन होनी चाहिए जो बुरी नीयत वाले नायक से भी प्रेम कर बैठे. नायक की एक बहन भी होनी चाहिए जिसके साथ कोई एक गुंडा बुरा बर्ताव करे तो नायक उसकी धुलाई कर सके. राजनेता तो भ्रष्ट होना ही चाहिए. नायक को उसके बारे में बाद में समझ आना चाहिए. नायक के इलाके के लोगों का उस पर से भरोसा उठना ही चाहिए. मूल कहानी निर्देशक ने स्वयं लिखी और इसकी पटकथा और डायलॉग लिखने के लिए उन्होंने अपने गुरु लेखक-निर्देशक को बालाजी तरणीतरन को अनुबंधित किया था.

व्यंग्य की कोशिश की गयी है, लेकिन कहानी इतनी नीरस और लकीर के फ़कीर किस्म की है कि आप सब पहले से सोच सकते हैं. हर बात बड़ी आसानी से होती रहती है. रजनीकांत की फिल्मों में रजनीकांत बड़े ही मज़ाकिया अंदाज़ से ग्लोबल प्रॉब्लम भी सुलझा लेते हैं, विजय सेतुपति की समस्याओं का हल बड़ा ही फूहड़ और बचकाना है. पूरी फिल्म में विजय सेतुपति का कोई रंग नज़र नहीं आया क्योंकि शायद वो रोल को लेकर काफी असमंजस में रहे होंगे. उनके चेहरे पर एक घाघ चेले की, एक गुस्सैल भाई की, एक बेहतरीन दोस्त की, राजनीति में चालबाज़ी की…किसी तरह की कोई एक्सप्रेशन आते हुए नज़र ही नहीं आयी. ऐसा भी कहा जा सकता है कि विजय के दिमाग में क्लैरिटी नहीं थी. जैसे रोहित शेट्टी की गोलमाल 3 में जॉनी लीवर को बार बार ऑंखें मिचमिचा के एक दूसरी पर्सनालिटी में जाने का रोल मिला था, विजय सेतुपति ने इस फिल्म में वही किया है.

राजेश खन्ना की फिल्म ‘आज का एमएलए रामावतार’ या ज़ेड प्लस, पीपली लाइव में पॉलिटिक्स पर अच्छे कटाक्ष रखे गए थे. 1994 में एक तमिल फिल्म आयी थी अमिधि पाड़ई जो कि तमिल फिल्मों में पोलिटिकल सटायर में सबसे बेहतरीन मानी जाती है. उसकी तुलना में ‘तुगलक दरबार’ बहुत कमज़ोर है. फिल्म की हीरोइन हैं राशि खन्ना, जिन्होंने मद्रास कैफ़े से फिल्मों में कदम रखा था. रोल निहायत ही फालतू है. सिंघम की बहन के रोल में हैं मंजिमा मोहन. उनका रोल अच्छा है. बमुश्किल 10 डायलॉग होंगे, ज़्यादातर उनकी चुप्पी ही काम करती है. ये दोनों ही लड़कियां, हीरो के ह्रदय परिवर्तन का कारण नहीं बनती हैं. विलन के रोल में पार्थिबन ने बड़ा सधा हुआ अभिनय किया है. वो पॉलिटिशियन लगते भी हैं और उनका अभिनय भी उसी तरह का है. उनके कैरेक्टर को लिखने में काफी काम किया गया नज़र आता है. बाकी कलाकार साधारण हैं और किसी का काम उभर कर नहीं आता है.

फिल्म का बैकग्राउंड म्यूजिक और गाने गोविन्द वसंत ने कंपोज़ किये हैं. बैकग्राउंड म्यूजिक बनाने में काफी मेहनत की गयी है और फिल्म का एक गाना ‘अन्नथे सेथी’ भी अच्छा बना है. ओटीटी रिलीज़ की विडम्बना है कि गाने प्रमोट करने के लिए समय कम मिलता है और अच्छे गाने लोगों तक पहुंच नहीं पाते हैं. सिनेमेटोग्राफी दो लोगों के ज़िम्मे की गयी थी – महेंद्र जयराजु और मनोज परमहंस. दोनों ने ही साथ में कुछ फिल्में पहले भी की हैं. दो सिनेमेटोग्राफर एक साथ एक ही फिल्म पर कम ही नज़र आते हैं. इस फिल्म में विजय सेतुपति के किरदार में दो पर्सनालिटीज हैं और फिल्म के अभिनय में भी विजय के दो रंग नज़र आते हैं. एक रंग में विजय पूरी स्क्रीन पर छाये हुए नज़र आते हैं और दूसरी स्क्रीन में वो काफी कन्फ्यूज्ड नज़र आते हैं. विजय की प्रतिभा के साथ ये दोनों रंग फीके हैं. वैसे भी अगर एक सीन को छोड़ दें तो ये फिल्म काफी औसत नज़र आती है. कुछ और देखने को न हो और विजय को पसंद करते हैं तो ये फिल्म देख सकते हैं.

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