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फिल्म में 'वर्जिनिटी टेस्ट' वाले सीन को लेकर बिल्कुल भी विचलित नहीं थे गिरीश कर्नाड!

News18Hindi
Updated: June 10, 2019, 7:00 PM IST
फिल्म में 'वर्जिनिटी टेस्ट' वाले सीन को लेकर बिल्कुल भी विचलित नहीं थे गिरीश कर्नाड!
गिरीश कर्नाड आज इस दुनिया में नहीं रहे और सिर्फ सिनेमा नहीं, साहित्य जगत के लिए भी ये बहुत बड़ी क्षति है.

गिरीश कर्नाड ने 14 साल की उम्र में लिखना शुरू कर दिया था. 20वीं सदी के महान कवि टीएस इलियट ने जब गिरीश के शुरुआती काम को पढ़ा तो वो काफी प्रभावित हुए.

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1994 की एक तमिल फिल्म है 'कादलन' जिसे हिंदी सिनेमा के दर्शक प्रभुदेवा की 'हम से है मुकाबला' के नाम से जानते हैं. इस फिल्म का संगीत जबर्दस्त हिट हुआ था और प्रभुदेवा के एक गाने 'मुकाबला-मुकाबला' को काफी चर्चा मिली थी. इस फिल्म का एक दृश्य था जिसमें अभिनेत्री नगमा के पिता बने गिरीश कर्नाड उनका 'वर्जिनिटी टेस्ट' करवाना चाहते थे. खानदान की इज्जत के नाम पर लड़की के साथ होने वाले इस मेडिकल दुर्व्यवहार से उस समय लाखों लड़कियां गुजरती थीं.

फिल्म में इस दृश्य को लेकर भले ही लोगों को आपत्ति थी लेकिन गिरीश इस सीन को लेकर बिल्कुल भी विचलित नहीं थे. बतौर लेखक वो जानते थे कि ये समाज की एक कड़वी सच्चाई है और लोगों के सामने इस तरह के दुर्व्यवहार, जो परिवार में ही किए जाते हैं, सामने आने चाहिए.

अपने समय से आगे के इस सीन को गिरीश कर्नाड और नगमा ने पूरी जिम्मेदारी के साथ निभाया है और वो सीन आपके दिमाग में भारतीय समाज में मौजूद कुछ कुंठित मनोदशाओं का चित्रण बखूबी करता है.

आज 81 साल की उम्र में गिरीश कर्नाड नहीं रहे. उन्हें याद करने वाले उनके साहित्य से लेकर उनकी बेहतरीन फिल्मों की चर्चा कर रहे हैं. लेकिन एक मसाला फिल्म में भी एक कुरीति या एक बुराई पर चोट वो कर पाए, ये उनकी क्षमता का उदाहरण है.

नहीं रहा पुरोधा

Girish Karnad
गिरीश कर्नाड कोई छोटी मोटी हस्ती नहीं. वो अपने आप में एक स्तंभ हैं.


अपने नाटक लेखन से चर्चा में आए गिरीश कर्नाड को 1998 में ज्ञानपीठ सम्मान मिला, ये भारत में साहित्य के क्षेत्र में दिया जाने वाला सर्वोच्च पुरस्कार है. कन्नड़ सिनेमा और साहित्य में उनके योगदान के लिए उन्हें पद्म श्री और पद्म भूषण से भी नवाज़ा गया.
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ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय से पढ़े गिरीश कर्नाड ऑक्सफोर्ड डिबेट क्लब के अध्यक्ष बनने वाले पहले एशियाई मूल के नागरिक थे. उन्होंने बाद में अमेरिका की शिकागो यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर के पद पर भी काम किया.

23 साल की उम्र में 'मा निशाद' (1959) और 'ययाति' (1961) जैसे नाटकों की लोकप्रियता ने उन्हें साहित्य जगत का स्तंभ बना दिया.

गिरीश के लिखे कई नाटकों पर देशभर में हज़ारों शो किए गए. कन्नड़ फिल्मों को पहला राष्ट्रीय पुरस्कार भी गिरीश कर्नाड के अभिनय से सजी फिल्म 'संस्कार' से ही मिला. ये मामूली बात नहीं है कि वो 10 बार के राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार विजेता हैं.

लोग आज उन्हें सलमान खान के साथ आखिरी बार देखे गए अभिनेता के तौर पर याद कर रहे हैं. वो ये भूल जाते हैं कि गिरीश कर्नाड के चलते दक्षिण भारतीय सिनेमा और साहित्य की दुनिया को कई 'सलमान' और मिले हैं.

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First published: June 10, 2019, 6:49 PM IST
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