नाक में नली लगाकर सलमान के साथ सीन देते थे गिरीश कर्नाड

अगर आप गौर करेंगे तो टाइगर जिंदा है में लगभग हर सीन में गिरीश इनडोर सेटिंग में ही थे. उनके सीन इनडोर इसलिए प्लान किए गए क्योंकि उन्हें धूप में बाहर जाने से मना किया गया था.

News18Hindi
Updated: June 10, 2019, 10:56 AM IST
नाक में नली लगाकर सलमान के साथ सीन देते थे गिरीश कर्नाड
81 साल की उम्र में गिरीश कर्नाड का निधन.
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Updated: June 10, 2019, 10:56 AM IST
ज्ञानपीठ सहित पद्मश्री और पद्मभूषण जैसे कई प्रतिष्ठित पुरस्कारों के विजेता गिरीश कर्नाड का 81 साल की उम्र में निधन हो गया. गिरीश लंबे समय से बीमार चल रहे थे. उन्होंने बेंगलुरु में आखिरी सांसें लीं. वह सिनेमा जगत के जाने पहचाने चेहरों में से एक थे. उन्होंने ना केवल हिंदी बल्कि तमिल, तेलुगु और कन्नड़ भाषा में भी काम किया. करीब 40 साल के लंबे फिल्मी करियर में उन्होंने 'चाइना गेट', 'हे राम', 'इकबाल', 'डोर', 'एक था टाइगर' और 'टाइगर जिंदा है' जैसी शानदार फिल्में दीं.

कर्नाड की आखिरी हिंदी फिल्म 'टाइगर जिंदा है' रही. इसमें वह RAW चीफ डॉक्टर शेनॉय के रोल में नजर आए थे. फिल्म में वह सलमान खान के सीनियर के रोल में थे. इस फिल्म की शूटिंग के दौरान भी वह बीमार ही थे. अगर आप गौर करेंगे तो इस फिल्म में लगभग हर सीन में गिरीश इनडोर सेटिंग में ही थे. उनके सीन इनडोर इसलिए प्लान किए गए क्योंकि उन्हें धूप में बाहर जाने से मना किया गया था.



सलमान ने भी की थी सराहना
ज्यादा स्ट्रेस उनकी सेहत के लिए ठीक नहीं था. वह पिछले तीन सालों से बीमार ही चल रहे थे. उन्हें नाक में नली लगाई थी. फिल्म के कई सीन्स में वह उसी नली के साथ ही नजर आए थे. खुद सलमान ने भी इस हालत में काम करने पर उनकी बहुत सराहना की थी.



नाटककार के रूप में ज्यादा प्रसिद्धि 
कर्नाड फिल्मों से तो पहचाने गए ही. लेकिन उनकी प्रसिद्धि एक नाटककार के रूप में ज्यादा है. कन्नड़ भाषा में लिखे उनके नाटकों का अंग्रेजी समेत कई भारतीय भाषाओं में अनुवाद हो चुका है. एक खास बात ये है कि उन्होंने लिखने के लिए ना तो अंग्रेज़ी को चुना, जिस भाषा में उन्होंने एक समय विश्वप्रसिद्ध होने के अरमान संजोए थे और ना ही अपनी मातृभाषा कोंकणी को.
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कई भारतीय भाषाओं में अनुदित हुए नाटक
जिस समय उन्होंने कन्नड़ में लिखना शुरू किया उस समय कन्नड़ लेखकों पर पश्चिमी साहित्यिक पुनर्जागरण का गहरा प्रभाव था. लेखकों के बीच ऐसे विषय पर लिखने की होड़ थी जो स्थानीय लोगों के लिए बिल्कुल नई थी. इसी समय कर्नाड ने ऐतिहासिक तथा पौराणिक पात्रों से तत्कालीन व्यवस्था को दर्शाने का तरीका अपनाया और काफी लोकप्रिय हुए. उनके नाटक ययाति (1961, प्रथम नाटक) और तुग़लक़ (1964) ऐसे ही नाटकों का प्रतिनिधित्व करते हैं. तुगलक से कर्नाड को बहुत प्रसिद्धि मिली और इसका कई भारतीय भाषाओं में अनुवाद हुआ.

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