गुलजार जन्‍मदिन विशेष : सितारे लटके हुए हैं तागों से आसमां पर..!

वे शब्‍दों से जिंदगी गुलजार करते हैं इसलिए गुलजार नहीं है बल्कि उनका गुलजार होना ही उनका मुकम्‍मल होना है। संपूर्ण होना है। आज उसी गुलजार का जन्‍मदिन है।

वे शब्‍दों से जिंदगी गुलजार करते हैं इसलिए गुलजार नहीं है बल्कि उनका गुलजार होना ही उनका मुकम्‍मल होना है। संपूर्ण होना है। आज उसी गुलजार का जन्‍मदिन है।

वे शब्‍दों से जिंदगी गुलजार करते हैं इसलिए गुलजार नहीं है बल्कि उनका गुलजार होना ही उनका मुकम्‍मल होना है। संपूर्ण होना है। आज उसी गुलजार का जन्‍मदिन है।

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नई दिल्‍ली। शब्‍द जहां आत्‍मा की सुहास है और अर्थ अपने ही अंतस की एक धुन। दरअसल, शब्‍द वहां आत्‍मा की खुशबू में डूबे और मन के सुरों पर थिरकते गीत हैं। गीत जो बाहर की पगडंडी से भीतर की ओर पहुंचते हैं और जीवन शब्‍दों की इस आवारगी में महकता है और अर्थों के खुलने पर गुलजार होता है। जिंदगी यहां हरी-भरी है इसलिए गुलजार है। यकीनन वे शब्‍दों से जिंदगी गुलजार करते हैं इसलिए गुलजार नहीं है बल्कि उनका गुलजार होना ही उनका मुकम्‍मल होना है। संपूर्ण होना है। फिर उनका नाम भी तो संपूर्णानंद है। पूरा यानी की संपूर्ण मतलब की संपूर्ण सिंह कालरा। आज उसी गीतकार, लेखक, पटकथा लेखक, निर्देशक गुलजार का जन्‍मदिन है। 18 अगस्‍त 1936 को अविभाजित हिंदुस्‍तान में जन्‍में गुलजार आज अपनी रचनात्‍मक जिंदगी के 80 पड़ाव को पूरा कर चुके हैं।



जिंदगी का सफर और गुलजार : अविभाजित भारत के झेलम जिले में पंजाब के दीना गांव (अब पाकिस्तान में) में जन्‍में गुलजार की जिंदगी कभी एक आम जिंदगी नहीं रही। अपने पिता की दूसरी पत्नी की इकलौती संतान गुलजार को उनकी मां बचपन मे ही छोड़कर चल बसीं। बचपन से मां का साया उठा और मन एक गहरी छाया में डूब गया। गुलजार के बचपन को जिंदगी की धूप बिना मां के आचल के गुजारनी पड़ी। फिर तकदीर भी कुछ ऐसी ही थी कि पिता के दुलार की ओट भी नसीब नहीं हुई।



अपने नौ भाई-बहनों में चौथे नंबर के गुलजार का परिवार बंट्वारे के बाद अमृतसर (पंजाब, भारत) आकर बस गया। गुलजार साहब पढ़ना चाहते थे, लेकिन बड़े भाई और पिता ने इस जिम्‍मेदारी को उठाने से इंकार कर दिया तो वे मुंबई चले आए। मां के आंचल की छांव नहीं और पिता से दूर गुलजार के लिए जीवन हमेशा परीक्षा बना रहा। मुंबई आकर उन्‍होंने वर्ली के एक गेरेज में बतौर मेकेनिक काम किया। बाद में वे दिल्ली में सब्जी मंडी में पेट्रोल पंप पर काम करके पढ़ाई का खर्च निकालने लगे। इसी रिश्‍तों से खाली जिंदगी, लेकिन दुख और संवेदना से भरे उनके मन ने जीवन को कविता के रूप में शब्‍दों में पिरोना शुरू किया।





gulzar
रुपहले पर्दे की ओर कदम : कहते हैं प्रतिभा अपने रास्‍ते खुद ही तलाशती है, लिहाजा खाली समय में कलम चला रहे गुलजार का दिल्‍ली में शायरों और साहित्यकारों तथा नाटककारों से जल्द ही संपर्क हुआ और इनकी मदद से वह गीतकार शैलेन्द्र तथा संगीतकार सचिन देब बर्मन तक पहुंचे। अपने शुरुआती दिनों में जीवन के संघर्ष की तपन से कविताएं लिख रहे गुलजार ने रुपहले पर्दे की गुनगुनाहट को अपने शब्‍दों के सुर देने का काम बंदनी फिल्‍म से किया। गीत था मेरा गोरा रंग ले ले मोहे श्‍याम रंग देदे।  इस गाने के साथ ही वे उस दौर के तमाम गीतकारों की नजर में आ गए। फ़िल्म इंडस्ट्री में उन्होंने बिमल राय, हृषिकेश मुख़र्जी और हेमंत कुमार के सहायक के तौर पर काम शुरू करने वाले इस गीत के बाद कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। वे त्रिवेणी छ्न्द के सृजक रहे।



फिल्‍मों में चलाई शब्‍दों की कूची : गुलजार ने हिंदी फिल्‍मों में कई गीत लिखे और सभी अपने बेहतरीन शब्‍दों से आज भी महकते हैं। इसके अलावा उन्‍होंने अपने साहित्‍य को कलमबद्ध भी किया और तकरीबन 6 कविता संग्रह लिखे। बतौर एक कवि, पटकथा लेखक, फ़िल्म निर्देशक तथा नाटककार गुलजार की बहुमुखी प्रतिभा ने बॉलीवुड के अलावा साहित्‍य में भी विशेष स्‍थान दिया। उन्‍होंने हिन्दी, उर्दू तथा पंजाबी में भी रचनाएं की, लेकिन ब्रज भाषा, खड़ी बोली, मारवाड़ी और हरियाणवी में भी इन्होने रचनाएं की। उनके प्रमुख कविता संग्रहों में चौरस रात (लघु कथाएँ, 1962) * जानम (कविता संग्रह, 1963), एक बूंद चांद (कविताएं, 1972), रावी पार (कथा संग्रह, 1997), रात, चांद और मैं (2002) रात पश्मीने की और खराशें (2003) शामिल हैं। 



गीत से निर्देशन की डगर : ऐसा नहीं था की गुलजार ने बॉलीवुड को केवल अपनी कलम की प्रतिभा से परिचित कराया बल्कि कैमरे के पीछे वे बतौर निर्देशक बेहद सफल रहे। बतौर निर्देशक अपना सफर उन्‍होंने 1971 में फिल्‍म 'मेरे अपने' से शुरू किया। वहीं उनकी दूसरी फिल्‍म कोशिश 1972 में आई। फिल्‍म में संजीव कुमार और जया भादुङी ने अभिनय किया। फिल्‍म एक गूंगे बहरे दम्पति के जीवन पर आधारित कहानी थी, और इसने आलोचकों को भी हैरान कर दिया। इसके बाद गुलजार ने संजीव कुमार के साथ आंधी (1975), मौसम (1975), अंगूर (1981) और नमकीन (1972) जैसी फिल्मे निर्देशित की। इन फिल्‍मों से गुलजार ने मेरे अपने (1971), परिचय (1972), कोशिश (1972), अचानक (1973), खुशबू (1974), आंधी (1975), मौसम (1976), किनारा (1977), किताब (1978), अंगूर (1980), नमकीन (1981), मीरा, इजाजत (1986), लेकिन (1990), लिबास (1993), माचिस (1996), हु तू तू (1999) जैसी फिल्‍मों का निर्देशन किया। वहीं मिर्जा गालिब (1988) और किरदार (1993) जैसे लोकप्रिय टीवी सीरियल

भी लिखे।



पुरस्‍कार और सम्‍मान: एक लेखक, पटकथा लेखक, कवि, नाटककार और निर्देशक के रूप में गुलजार ने कई पुरस्‍कार और सम्‍मान अपने नाम किए। उन्‍हें वर्ष 2002 मे साहित्य अकादमी पुरस्कार और वर्ष 2004 मे भारत सरकार द्वारा दिया जाने वाला तीसरा सर्वोच्च नागरिक सम्मान पद्म भूषण से भी सम्मानित किया गया। वर्ष 2009 मे डैनी बॉयल निर्देशित फिल्म स्लम्डाग मिलियनेयर मे उनके द्वारा लिखे गीत जय हो के लिए उन्हे सर्वश्रेष्ठ गीत का ऑस्कर पुरस्कार पुरस्कार मिल चुका है। इसी गीत के लिए उन्हे ग्रैमी पुरस्कार से भी सम्मानित किया जा चुका है। जबकि 2013 में उन्‍हें हिंदी सिनेमा का सर्वोच्‍च सम्‍मान दादा साहेब फाल्‍के सम्‍मान भी मिल चुका है।
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