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'मरेंगे तो वहीं जाकर जहां जिंदगी है...' आपने सुनी प्रवासी मजदूरों की हालत पर गुलज़ार की कव‍िता!

News18Hindi
Updated: May 20, 2020, 3:10 PM IST
'मरेंगे तो वहीं जाकर जहां जिंदगी है...' आपने सुनी प्रवासी मजदूरों की हालत पर गुलज़ार की कव‍िता!
गुलज़ार.

प्रवासी मजदूर/कामगार (Migrant Worker) बस-ट्रेन शुरू हों, इस इंतजार के लंबा होने के बाद पैदल ही अपने-अपने गांवों की तरफ बढ़ गए हैं. इसी पर हिंदी सिनेमा के प्रसिद्ध लेखक गुलज़ार (Gulzar) ने अपनी कविता ल‍िखी है.

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मुंबई. लॉकडाउन (Lockdown) के इन दिनों में देश के करोड़ों लोग अपने-अपने घरों में बंद हैं. लेकिन इसी बीच लाखों ऐसे भी हैं जो शहरों में कोरोना वायरस (Coronavirus) के साथ ही फैली बेरोजगारी और लाचारी के चलते अपने-अपने घर पहुंचने के लिए सड़कों पर उतरे हुए हैं. प्रवासी मजदूर/कामगार (Migrant Worker) अपने कंधे पर सामान, बच्‍चे और परिवार को उठाकर गांवों की तरफ निकल पड़े हैं. बस-ट्रेन शुरू होने के इंतजार के लंबा होने के बाद ये मजदूर पैदल ही अपने-अपने गांवों की तरफ बढ़ गए हैं. ऐसे लाखों मजदूरों की कहानी हिंदी सिनेमा के प्रसिद्ध लेखक गुलज़ार (Gulzar) ने एक कविता के जरिए कही है. गुलज़ार की ये कविता इन दिनों सोशल मीडिया पर जमकर वायरल हो रही है.

अपने 5 दशकों के लंबे सफर में गुलज़ार हिंदी सिनेमा का एक अहम और बड़ा नाम रहे हैं. फिल्‍मों में ल‍िखे डायलॉग से लेकर अपनी कहानियों, स्‍क्रीनप्‍ले और गानों तक, उनकी कलम हमेशा ही कुछ ऐसा ल‍िखती रही है जिसने हज़ारों-लाखों को प्रेरणा दी है. अपनी इस कविता में भी उन्‍होंने प्रवासी मजदूरों के दर्द को बयां किया है.

पढ़‍िए गुलज़ार की ये कविता.



महामारी लगी थी



घरों को भाग लिए थे सभी मज़दूर, कारीगर.
मशीनें बंद होने लग गई थीं शहर की सारी
उन्हीं से हाथ पाओं चलते रहते थे
वगर्ना ज़िन्दगी तो गाँव ही में बो के आए थे.

वो एकड़ और दो एकड़ ज़मीं, और पांच एकड़
कटाई और बुआई सब वहीं तो थी

ज्वारी, धान, मक्की, बाजरे सब.
वो बँटवारे, चचेरे और ममेरे भाइयों से
फ़साद नाले पे, परनालों पे झगड़े
लठैत अपने, कभी उनके.

वो नानी, दादी और दादू के मुक़दमे.
सगाई, शादियाँ, खलियान,
सूखा, बाढ़, हर बार आसमाँ बरसे न बरसे.

मरेंगे तो वहीं जा कर जहां पर ज़िंदगी है.
यहाँ तो जिस्म ला कर प्लग लगाए थे !

निकालें प्लग सभी ने,
‘ चलो अब घर चलें ‘ – और चल दिये सब,
मरेंगे तो वहीं जा कर जहां पर ज़िंदगी है !

– गुलज़ार

गुलज़ार ने अपने च‍िर-परिच‍ित अंदाज में इस कविता को पढ़ा भी है.



इससे पहले हाल ही में उन्‍होंने ड्यूटी पर लगे पुलिसवालों पर भी कुछ लाइनें ल‍िखी थीं.

आपसे एक ज़रूरी बात कहना है, कि पुलिस-मैन एक मुहाफ़िज़ का नाम है, हिफ़ाज़त करने वाले का.. वो एक मददगार है, मदद करता है..

उस मुहाफ़िज़ की, उस मददगार की, उस पुलिस-मैन की इज़्ज़त करना, एहतराम करना, हर शहरी का फ़र्ज़ बनता है

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First published: May 20, 2020, 3:10 PM IST
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