मजदूरों की हालत पर फ‍िर बोले गुलजार, 'कुछ ऐसे कारवां देखे हैं सैंतालिस में भी मैंने'

मजदूरों की हालत पर फ‍िर बोले गुलजार, 'कुछ ऐसे कारवां देखे हैं सैंतालिस में भी मैंने'
गुलजार. (फोटो - @gulzaronline/Facebook)

गुलजार (Gulzar) ने अपनी एक कविता 'बंटवारा' (Batwara) में प्रवासी मजदूर (Migrating labours) की परेशानी और कोरोना के कहर को बयां किया है.

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मुंबई. कोरोना वायरस (Coronavirus) के इस काल में यूं तो हर किसी से घर में बैठने की अपील की जा रही है और यही एक कारगर उपाय भी द‍िख रहा है. लेकिन महामारी के इस दौर में प्रवासी मजदूरों को सुरक्षित उनके घर पहुंचाने की जद्दोजहद के तौर पर एक दूसरी बड़ी समस्‍या देश के सामने खड़ी हो गई है. बड़े-बड़े शहरों से अपना बोरिया-बिस्‍तर उठा लाखों की संख्‍या में प्रवासी मजदूर अपने घर पहुंचने की कोशिशों में लगे हैं. लेकिन इस सफर में मजदूरों को भूखे मरने से लेकर मीलों-मील पैदल चलने तक हजारों परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है. इसी परेशानी को हिंदी स‍िनेमा के प्रसिद्ध लेखक गुलजार (Gulzar) ने अपनी एक कविता 'बंटवारा' (Batwara) में बयां किया है.

ये कविता कुछ देर पहले ही गुलजार के फेसबुक पेज पर शेयर की गई है. इसे वह खुद सुनाते हुए नजर आ रहे हैं.

गुलजार की कविता...



कुछ ऐसे कारवां देखे हैं सैंतालिस में भी मैने



ये गांव भाग रहे हैं अपने वतन में

हम अपने गांव से भागे थे, जब निकले थे वतन को

हमें शरणार्थी कह के वतन ने रख लिया था
शरण दी थी
इन्हें इनकी रियासत की हदों पे रोक देते हैं
शरण देने में ख़तरा है

हमारे आगे पीछे, तब भी एक क़ातिल अजल थी
वो मजहब पूछती थी

हमारे आगे पीछे, अब भी एक क़ातिल अजल है
ना मजहब, नाम, जात, कुछ पूछती है
-- मार देती है

ख़ुदा जाने. ये बटवारा बड़ा है
या वो बटवारा बड़ा था - Gulzar



अपने 5 दशकों के लंबे सफर में गुलज़ार हिंदी सिनेमा का एक अहम और बड़ा नाम रहे हैं. फिल्‍मों में ल‍िखे डायलॉग से लेकर अपनी कहानियों, स्‍क्रीनप्‍ले और गानों तक, उनकी कलम हमेशा ही कुछ ऐसा ल‍िखती रही है जिसने हज़ारों-लाखों को प्रेरणा दी है. अपनी इस कविता से पहले भी गुलजार 'महामारी लगी थी..' नाम की कविता शेयर कर चुके हैं, जो हजारों की तादाद में पैदल चलते प्रवासी कामगारों की परेशानी बयां करती है.

महामारी लगी थी
घरों को भाग लिए थे सभी मज़दूर, कारीगर.
मशीनें बंद होने लग गई थीं शहर की सारी
उन्हीं से हाथ पाओं चलते रहते थे
वगर्ना ज़िन्दगी तो गाँव ही में बो के आए थे.

वो एकड़ और दो एकड़ ज़मीं, और पांच एकड़
कटाई और बुआई सब वहीं तो थी

ज्वारी, धान, मक्की, बाजरे सब.
वो बँटवारे, चचेरे और ममेरे भाइयों से
फ़साद नाले पे, परनालों पे झगड़े
लठैत अपने, कभी उनके.

वो नानी, दादी और दादू के मुक़दमे.
सगाई, शादियाँ, खलियान,
सूखा, बाढ़, हर बार आसमाँ बरसे न बरसे.

मरेंगे तो वहीं जा कर जहां पर ज़िंदगी है.
यहाँ तो जिस्म ला कर प्लग लगाए थे !

निकालें प्लग सभी ने,
‘ चलो अब घर चलें ‘ – और चल दिये सब,
मरेंगे तो वहीं जा कर जहां पर ज़िंदगी है !

– गुलज़ार



इससे पहले हाल ही में उन्‍होंने ड्यूटी पर लगे पुलिसवालों पर भी कुछ लाइनें ल‍िखी थीं.

आपसे एक ज़रूरी बात कहना है, कि पुलिस-मैन एक मुहाफ़िज़ का नाम है, हिफ़ाज़त करने वाले का.. वो एक मददगार है, मदद करता है..

उस मुहाफ़िज़ की, उस मददगार की, उस पुलिस-मैन की इज़्ज़त करना, एहतराम करना, हर शहरी का फ़र्ज़ बनता है

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First published: May 28, 2020, 1:41 PM IST
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