जन्मदिनः 'मिडल सिनेमा' अगुवा थे हृषिकेश मुखर्जी, अमिताभ बच्चन हैं मुरीद

हृषिकेश मुखर्जी.
हृषिकेश मुखर्जी.

हृषिकेश मुखर्जी (Hrishikesh Mukherjee) बायोकेमिस्ट बनना चाहते थे लेकिन बिमल रॉय उन्हें मुंबई ले आए और वह फिल्मों की एडिंटिंग करने लगे. उन्होंने 'दो बीघा जमीन' की एडिटिंग की है.

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  • Last Updated: September 30, 2020, 6:08 AM IST
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मुंबई. हिंदी फिल्मों के मशहूर डायरेक्टर हृषिकेश मुखर्जी (Hrishikesh Mukherjee) अगर आज जीवित होते तो 98 साल के होते. लेकिन उनका मानना था कि 'जिंदगी लंबी नहीं बड़ी होनी चाहिए'. उनकी ये बात राजेश खन्ना (Rajesh Khanna) अभीनीत फिल्म 'आनंद' का मशहूर डायलॉग भी थी. जैसी हृषिकेश मुखर्जी की फिलॉसफी थी वैसा ही उनका जिंदगी जीने का तरीका और वैसी ही उनकी फिल्में.

हृषिकेश मुखर्जी बायोकेमिस्ट बनना चाहते थे लेकिन बिमल रॉय उन्हें मुंबई ले आए और वह फिल्मों की एडिंटिंग करने लगे. उनकी एडिटिंग स्टाइल बेहद शानदार मानी जाती थी और जब वो फिल्में डायरेक्ट करने लगे तब उनकी इस खूबी की झलक उनकी फिल्मों में भी दिखाई देती थी. हृषिकेश मुखर्जी ने बिमल रॉय की क्लासिक फिल्म 'दो बीघा जमीन' की कहानी लिखी थी. ये फिल्म इटैलियन फिल्म 'बाइसाइकिल थीफ' से प्रभावित थी.

हृषिकेश अपनी फिल्म 'सत्यकाम' (1969) को अपनी सबसे बेहतरीन फिल्म मानते थे. हृषिकेश मुखर्जी की फिल्मों में आर्ट फिल्मों जैसी संजीदगी भी होती थी और कमर्शियल सिनेमा के लिए जरूरी माने जाने वाले रंग-ढंग भी इसलिए उन्हें भारत में 'मिडल सिनेमा' अगुवा माना गया. मिडल सिनेमा यानी एक ऐसा सिनेमा जिसमें आर्ट और कमर्शियल सिनेमा का संतुलन हो.



हृषिकेश मुखर्जी की फिल्में 'आनंद', 'गोलमाल', 'चुपके-चुपके', 'अनुपमा', 'अभिमान', 'गुड्डी', 'बावर्ची', 'किसी से न कहना' और 'नमक हराम' जैसी फिल्मों को उनकी सर्वश्रेष्ठ फिल्मों में से एक माना जाता है. ये फिल्में न सिर्फ मुखर्जी की सबसे बेहतरीन फिल्में थीं बल्कि इनमें से कई फिल्मों को भारतीय सिनेमा की भी सबसे अच्छी फिल्मों में गिना जाता है.
कई लोग ये भी कहते थे कि हृषिकेश मुखर्जी पढ़े लिखे मध्यवर्ग के लिए फिल्में बनाया करते थे लेकिन उनकी फिल्मों की कहानी साधारण हुआ करती थी और दिल को छू लिया करती थी. दरअसल सिनेमा में फिल्मों को सिंपल तरीके से कहने की कला ही सबसे जटिल मानी जाती है और यही जटिलता हृषिकेश मुखर्जी की खासियत थी.
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