FILM REVIEW: 'रात बाकी है', बाकी ही रह जाए तो अच्छा है...

फिल्म की अवधि करीब 90 मिनट्स है.

फिल्म की अवधि करीब 90 मिनट्स है.

Raat Baaki Hai Film Review: मर्डर मिस्ट्री में दर्शकों को समझ आ जाता है कि कत्ल किसने किया है, नहीं समझ आता तो पुलिस को या जांच करने वाले अधिकारी को.

  • News18Hindi
  • Last Updated: April 21, 2021, 12:21 PM IST
  • Share this:
फिल्मः रात बाकी है

डायरेक्टरः अविनाश दास

ड्यूरेशनः 90 मिनट्स

ओटीटीः Zee5
अतुल सत्य कौशिक एक प्रसिद्ध नाट्य-लेखक हैं. अनूप सोनी के साथ उनका एक नाटक 'बालीगंज 1990' बहुत ही सफल नाटक माना जाता है. इस नाटक को आधार मानकर, अनूप सोनी को प्रमुख भूमिका में लेकर निर्देशक अविनाश दास (अनारकली ऑफ आरा) ने ज़ी5 की विचित्र फिल्मों की श्रृंखला में एक और फिल्म जोड़ दी है- रात बाकी है (Raat Baaki Hai).

मर्डर मिस्ट्री की कहानी में दर्शकों को समझ आ जाता है कि कत्ल किसने किया है, नहीं समझ आता तो पुलिस को या जांच करने वाले अधिकारी को. नाटक पर आधारित फिल्मों में विशाल भारद्वाज ने शेक्सपीयर के नाटकों को फिल्मों की भाषा में बखूबी उकेरा है. हिंदुस्तान की पहली बोलती गाती फिल्म 'आलम आरा' भी एक नाटक पर ही आधारित थी और पहले की फिल्मों के संगीत तक नाट्य संगीत से प्रेरणा लेकर बनाया जाता था. रात बाकी है, इसमें से कुछ भी नहीं चुनती बल्कि दर्शकों के मन पर बोरडम का बोझा डाल कर कर्तव्यों की इतिश्री कर लेती है.

अनूप सोनी एक लेखक हैं. संघर्ष के दिनों में इन्हें पाओली दाम से प्रेम होता है और गरीबी की मार इस रिश्ते को खा जाती है. वर्षों बाद अनूप, अपनी नई गर्लफ्रेंड दीपान्निता के साथ राजस्थान के हेरिटेज होटल में सगाई कर लेते हैं. उसी रात दीपान्निता का कत्ल हो जाता है. अनूप वहां से भाग लेते हैं और शहर के राजा की शरण में वो महल पहुंचते हैं जहां पाओली से मुलाकात होती है. पाओली उस महल की महारानी बन चुकी हैं. कत्ल की छानबीन के लिए महल के विश्वसनीय पुलिस वाले राहुल देव को भेजा जाता है. वो कौन से राजस्थान की भाषा बोलते हैं, सिर्फ वो ही बता सकते हैं. थोड़ी देर पुलिस की तफ्तीश के बाद पता चलता है कि कत्ल किसने किया है.



अनूप, बालीगंज 1990 में भी इसी भूमिका में थे, इसलिए उन्हें फिल्म में लिया गया होगा. अभिनय के नाम पर अनूप ने निराश किया है. पाओली दाम को देखकर हमेशा "हेट स्टोरी" की ही याद आती है. अपनी कई बंगाली फिल्मों की तरह, इस बार पाओली ने सुंदर साड़ियां पहनी हैं और राजसी रोल में हैं. अभिनय में कुछ करना था नहीं. एक बात खटकती रही कि पूरी फिल्म में साड़ी पहनकर घूमती लड़की, रात के अंधेरे में जीन्स, टी शर्ट, जैकेट और बूट्स पहन कर क्यों निकलती हैं. राहुल देव शायद जयदीप अहलावत से प्रभावित हो रहे थे. डायलॉग ठीक मिले हैं, मगर जिस तरीके से वो केस सुलझाने का नाटक करते हैं, वो बहुत ही बचकाना लगता है. दीपान्निता और समीर मल्होत्रा का काम बस है.

अनुभवी मनोज सोनी ने कैमरा से 'रात बाकी है' में थोड़ी बहुत जान डालने की कोशिश की है. कुछ दृश्य सच में सुंदर नजर आते हैं. एडिटर अर्चित रस्तोगी ने फिल्म में फ्लैशबैक का इस्तेमाल करके कुछ मिस्ट्री डालने की असफल कोशिश की है, ये डिपार्टमेंट कमजोर रहा. ज़ी5 की प्रसिद्ध वेब सीरीज 'रंगबाज" के लेखक सिद्धार्थ मिश्रा ने इस फिल्म को लिखना क्यों मंजूर किया, ये समझना मुश्किल है. कहानी, नाटक के हिसाब से ठीक होगी लेकिन एक फिल्म के लिए इसको पूरी तरह से नया करके लिखना चाहिए था. गैंग्स ऑफ वासेपुर और अगली जैसी फिल्मों के लेखन डिपार्टमेंट के सदस्य रह चुके अखिलेश जायसवाल ने डायलॉग लिखे हैं, जिसमें से राहुल देव को छोड़ कर बाकी सबको बहुत साधारण डायलॉग मिले हैं. सेट्स अच्छे हैं. फिल्म की अवधि करीब 90 मिनट्स है. इसके बकाया फिल्मों की श्रेणी में रख सकते हैं, जिन्हें देखना जरूरी नहीं है.
अगली ख़बर

फोटो

टॉप स्टोरीज