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पढ़ें, एक गुमनाम गायक जसपाल सिंह के कामयाबी की कहानी

बचपन में मोहम्मद रफी की आवाज़ क्या सुनी जसपाल तो उस आवाज के दीवाने हो गए।

बचपन में मोहम्मद रफी की आवाज़ क्या सुनी जसपाल तो उस आवाज के दीवाने हो गए।

बचपन में मोहम्मद रफी की आवाज़ क्या सुनी जसपाल तो उस आवाज के दीवाने हो गए।

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नई दिल्ली। 1975 में रिलीज हुई थी फिल्म 'गीत गाता चल'। फिल्म सुपर हिट साबित हुई। फिल्म की कामियाबी में रवींद्र जैन के संगीत के साथ-साथ ताज़गी भरी आवाज के मालिक जसपाल सिंह का बड़ा हाथ था। लंबे समय से गायन के मैदान में अपनी पहचान बनाने को भटक रहे जसपाल सिंह की बरसों की तमन्ना पूरी हो गयी। अपना शहर अमृतसर, पिता का व्यापार और मां की ममता छोड़कर वो सिर्फ गायक बनने की जद्दो जेहद में लगे हुए थे।

दरअसल बचपन में मोहम्मद रफी की आवाज़ क्या सुनी जसपाल तो उस आवाज के दीवाने हो गए। पांच साल की उम्र से लेकर कॉलेज पहुंचने तक जसपाल ने सिर्फ मोहम्मद रफी के गीत ही गाए। हांलाकि उन्होंने लॉ का पढ़ाई पूरी की और घर वाले उन्हें एक सफल वकील के रूप में देखना चाहते थे, लेकिन लोगों की तारीफों से उत्साहित होकर जसपाल सिंह गायक बनने का सपना लिए मुंबई जा पहुंचे। उस समय पुरुष गायकों के मैदान में रफी, किशोर और मुकेश का सिक्का चल रहा था। इसके अलावा मन्ना डे और महेंद्र कपूर जैसे दिग्गजों का अपना अलग स्थान था ऐसे माहौल में नए लोगों के लिये मौक़े कम थे।

जसपाल को कोई मौका देने पर राजी नहीं हुआ। गायकी के लिये जसपाल की बेचैनी और तड़प देख कर उनके बहनोई जसवीर सिंह खुराना ने 'बंदिश' नाम की फिल्म ही बना दी ताकि जसपाल को गाने का मौका मिल सके, लेकिन ये फिल्म और इसका संगीत दोनों नाकाम रहे। इससे जसपाल सिंह को भारी धक्का पहुंचा। फिर भी दिल में एक उम्मीद की किरन बची हुई थी कि एक दिन कोई बड़ा मौका ज़रूर मिलेगा और गीत गाता चल ने जसपाल सिंह को ऐसा मौका दिया जिसकी तमन्ना किसी भी गायक को होती है।

शोहरत और तारीफो ने जसपाल सिंह की उम्मीदों को पंख लगा दिए। उनके सामने था उड़ान भरने को खुला आसमान। जसपाल सिंह की गायकी के सफ़र ने रफ़्तार पकड़ी तो कई ख़ूबसूरत नग़्मे उनके हमसफ़र बनते गए। अभिनेता सचिन से जसपाल सिंह की आवाज़ मेल खाती थी इसीलिये उन्हें उनकी फ़िल्मों में गाने के मौक़े मिले फिल्म नदिया के पार में उनके गाए गीत सांची कहे तोरे आवन से हमरे अंगना में आयी बहार भउजी ने सफलता के नए रिकॉर्ड बना डाले। इस फिल्म के सारे गीत बेहद लोकप्रिय हुए। अपनी कामियाबी में मगन हुए जसपाल को ये एहसास ही नहीं हुआ कि उन पर केवल सचिन के लिये ही बेहतरीन गीत गाने वाले का ठप्पा लग चुका है।

दूसरे युवा अभिनेताओं के लिए गीते गाने के प्रस्ताव उनके पास आने ही बंद हो गए। तब तक किशोर कुमार के बेटे अमित, मुकेश के बेटे नील नितिन मुकेश के साथ-साथ दक्षिण के बाला सुब्रह्मणियम और येसुदास मैदान में उतर चुके थे। मोहम्मद रफी की कॉपी करने वाले अनवर, शब्बीर कुमार और मोहम्मद अजीज को भी मौके मिलने लगे थे। उधर सीधे और सरल जसपाल कोई गॉड फॉदर भी नहीं बना पाए। फ़िल्मी दुनिया के अपने उसूल और क़ानून हैं इसका एहसास जसपाल सिंह को नहीं था।

सुपरहिट गीत देने वाले जसपाल के साथ किस्मत ने भी खासा मजाक किया। नदिया के पार की बेतहाशा सफलता के बाद होना तो ये चाहिये था कि जसपाल के पास गीते गाने के प्रस्तावों की लाइन लग जाती मगर जिन फ़िल्मों में उन्हें गाने का मौक़ा मिला उनमें से ज्यादातर रिलीज़ ही नहीं हुई। इसके अलावा बेहतरीन गीत गाने के बवजूद जसपाल को उस समय के किसी बड़े बैनर की फिल्म भी नहीं मिल पायी। उन्होंने ज्यदातर बी ग्रेड कही जाने वाली फिल्मों के लिये ही गाया।

अस्सी के दशक में फिल्मी संगीत के पतन का दौर शुरू हुआ। फिल्मों में बढ़ती हिंसा ने संगीत के लिए मौके बहुत कम कर दिए ऐसे में जसपाल के लिये काम ढूंढना बेहद कठिन हो गया और कौन सोच सकता था कि इतनी शानदार आवाज़ के मालिक को धीरे धीरे गुमनामी के अंधेरे निगल लेंगे। फिर भी जसपाल को किसी से शिकवा नहीं है। स्टेज शो में अक्सर उन्हें उनके चाहने वाले सुन लेते हैं. उनका रियाज़ बदस्तूर जारी है।

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