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जॉलीवुड: क्षेत्रीय फिल्मों के लिए सब्सिडी के सवाल पर छलका कलाकारों का दर

कलाकारों के दर्द का आलम यह है कि वे खुद को मौसमी बेरोजगार कलाकार मानते हैं.

कलाकारों के दर्द का आलम यह है कि वे खुद को मौसमी बेरोजगार कलाकार मानते हैं.

झारखंड में स्थानीय भाषा और क्षेत्रीय फिल्मों को बढ़ावा देने की बात हर सरकारी मंच पर की जाती है. लेकिन जमीनी हकीकत किसी से छिपी नहीं है.

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रांची. झारखंड में स्थानीय भाषा और क्षेत्रीय फिल्मों (regional films) को बढ़ावा देने की बात हर सरकारी मंच पर की जाती है, लेकिन जमीनी हकीकत किसी से छिपी नहीं है. सच्चाई यह है प्रदेश का फिल्म उद्योग यानी जॉलीवुड पिछले कई सालों से सरकार की फिल्म नीति की उपेक्षा का शिकार रहा है, जिस कारण क्षेत्रीय फिल्मों और उनसे जुड़े कलाकारों की रोजी रोटी और उनका फिल्मी पैशन भी अब दम तोड़ता नजर आ रहा है..

जॉलीवुड के कलाकार झारखंड की फिल्म नीति, सब्सिडी और इस रंगीन दुनिया की जमीनी हकीकत को बयां करते हुए बताते हैं कि सरकार जिस फिल्म नीति और क्षेत्रीय भाषाओं की फिल्मों को बढ़ावा देने का दावा करती है. उसकी असलियत यह है कि आज तक नागपुरी, खोरठा और हो जैसी स्थानीय भाषा की कुल फिल्मों की संख्या 15 के भी पार नहीं कर पाई है. कलाकारों की मानें तो राज्य सरकार की फिल्म नीति और सब्सिडी जितनी कागज आसान नजर आती है. हकीकत में उसे हासिल करना उतना ही मुश्किल है.

तीन फिल्मों में काम कर चुकीं सलोनी तिर्की बताती हैं कि क्षेत्रीय भाषाओं की फिल्मों को लेकर पूरा सरकारी सिस्टम ही उदासीन है. हाल यह है कि जितने भी नए कलाकार फिल्मों की ओर अपना रुख कर रहे हैं. उन्हें मायूसी झेलनी पड़ रही है. इलाका किशोरगंज फिल्म से चर्चा में आए एक्टर दीपक लोहार बताते हैं कि सरकार को सब्सिडी को लेकर नीति में थोड़ा बदलाव करना चाहिए. 50 फीसदी सब्सिडी की राशि में से 25 फीसदी फिल्म निर्माण की शुरुआत में ही दे देनी चाहिए ताकि आर्थिक तंगी का सामना कर रहे प्रोड्यूसर कम से कम फिल्म का निर्माण शुरू कर सकें,
हालांकि फिल्म डायरेक्टर अनिल सिकदर की मानें तो अभी तक दो से ज्यादा फिल्मों को सब्सिडी का लाभ नहीं मिल पाया है. उन्होंने कहा कि सब्सिडी का लाभ दूसरे प्रदेशों के बड़े बैनर को ज्यादा मिल रहा है.

कलाकारों के दर्द का आलम यह है कि वे खुद को मौसमी बेरोजगार कलाकार मानते हैं. उनकी मानें तो आज तक जॉलीवुड के फिल्म प्रोड्यूसर, डायरेक्टर और लंबे समय से क्षेत्रीय भाषा की फिल्मों में काम कर रहे कलाकार अपनी पहचान नहीं बना पाए हैं. थिएटर में काम कर चुके कई कलाकार यह बताने से भी नहीं चूकते कि सब्सिडी का लाभ तो बाहर से आने वाले बड़े प्रोड्यूसर को मिल जाता है, लेकिन क्षेत्रीय भाषा की फिल्मों से जुड़े कलाकार इसकी पहुंच से दूर रह जाते हैं. सच्चाई यह है कि नागपुरी और खोरठा जैसी क्षेत्रीय भाषा की फिल्में भले ही कम लागत में बन जाए, लेकिन उन्हें सिनेमा हॉल तक पहुंचाना गंगा को धरती पर लाने के बराबर है. कोई भी सिनेमा हॉल और मल्टीप्लेक्स का मालिक इसको लेकर कोई रिस्क नहीं लेना चाहता. ऐसे में अच्छी फिल्में भी दर्शकों से दूर हो जाती हैं.

कोरोना काल में फिल्मों की शूटिंग नहीं के बराबर होने से राज्य भर में हजारों कलाकारों को रोजी रोटी के लिए खासी मशक्कत करनी पड़ रही है. ऐसे में सभी कलाकारों ने आपस में मिलकर आर्टिस्ट वेलफेयर सोसाइटी बनाई है ताकि मुसीबत के वक्त एक दूसरे के काम आ सकें. कलाकारों ने राज्य सरकार से मांग की है कि फिल्म नीति और सब्सिडी के मुश्किल सफर को अगर क्षेत्रीय फिल्मों के लिए आसान बना दिया जाए तो जॉलीवुड के फिल्मी पर्दे के साथ-साथ कलाकारों की दुनिया भी रंगीन हो सकती है.

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