2 अक्टूबर को रिलीज हुई 3 फिल्मों में आपको कौन सी पसंद आई?

खाली-पीली न‍िर्देशक मकबूल खान की फ‍िल्‍म है.
खाली-पीली न‍िर्देशक मकबूल खान की फ‍िल्‍म है.

मल्टीप्लेक्सों पर बड़े प्रोड्यूसर्स और सितारों की फिल्में दादागिरी करती हैं. कंटेंट सिनेमा, छोटे बजट या गैर सितारा फिल्मों को चुनिंदा शो पाने के लिए तक कड़ा संघर्ष करना पड़ता था. लेकिन अब...

  • News18Hindi
  • Last Updated: October 4, 2020, 9:40 AM IST
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मुंबई. दो अक्तूबर को ओटीटी प्लेटफॉर्मों पर तीन हिंदी फिल्में रिलीज हुईं. ओटीटी ने प्रतियोगिता के मैदान को फिलहाल समतल कर दिया है. मल्टीप्लेक्सों पर बड़े प्रोड्यूसर्स और सितारों की फिल्में दादागिरी करती हैं. कंटेंट सिनेमा, छोटे बजट या गैर सितारा फिल्मों को चुनिंदा शो पाने के लिए तक कड़ा संघर्ष करना पड़ता था. अक्सर ही उनके साथ दोयम व्यवहार होता था. मगर ओटीटी पर यह भेदभाव संभव नहीं. बड़े से बड़े सितारे की फिल्म के मुकाबले अब गैर सितारा या छोटे बजट की फिल्म आ सकती है. उनके पास उतने ही दर्शकों तक पहुंचने का मौका है, जहां तक सितारे पहुंच सकते हैं. इसी हफ्ते एक तरफ जहां ईशान खट्टर (Ishaan Khattar) और अनन्या पांडे (Ananya Panday) जैसे स्टार किड्स की फिल्म 'खाली पीली' आई तो उनके मुकाबले नवाजुद्दीन सिद्दीकी (Nawazuddin Siddique) की 'सीरियस मैन' और संजय मिश्रा (Sanjay Mishra) जैसे 56 साल के बुजुर्ग लुक वाले अभिनेता की 'बहुत हुआ सम्मान' मैदान में है. बगैर ओटीटी वाले मल्टीप्लेक्स काल में क्या इन फिल्मों/ऐक्टरों को बराबर प्लेटफॉर्म मिलना संभव था. मैदान अब सबके लिए खुला है. जानिए इन तीनों फिल्मों के बारे और तय कीजिए कि आपको क्या देखना है…

बहुत हुआ सम्मान
कलाकारः संजय मिश्रा, राघव जुयाल, अभिषेक चौहान
प्लेटफॉर्मः डिज्नी+हॉटस्टार
देश के नागरिक सत्ता और व्यवस्था का आजादी के बाद से आज तक सम्मान करते आए मगर बदले में क्या मिला. यह फिल्म क्रांति की बात करती है. मगर कॉमिक अंदाज में. संजय मिश्रा क्रांति का झंडा उठाए हैं. यहां लोग उन्हें पागल समझते हैं. बक** बाबा के रोल में वह खरी-खरी बातें कहते हैं. वह समझाते हैं कि पूंजीवादी व्यवस्था, उपभोक्तावाद, भ्रष्ट नेता और ढोंगी बाबा मिल कर कैसे जनता को कैसे उल्लू बना रहे हैं, यह समझने का समय आ गया है. वाराणसी की एक यूनिवर्सिटी के दो नाकाबिल इंजीनियरिंग छात्रों के बहाने कही गई इस कहानी में आपको अपना समय दिखेगा. निर्देशक आशीष एस. शुक्ला ने कई बातें अंडरटोन रखी हैं. यह जरूर है कि कुछ लोगों को फिल्म में कई जगह इस्तेमाल भाषा से आपत्ति हो सकती है मगर एक तर्क यह भी है कि आज आदमी गली के बगैर कुछ समझता भी तो नहीं है. आप उम्र और दिमाग से एडल्ट हैं, देश-समाज के बारे में सोचते हैं तो यह फिल्म आपके लिए है.



सीरियस मैन
कलाकारः नवाजुद्दीन सिद्दिकी, अक्षत दास, इंदिरा तिवारी
प्लेटफॉर्मः नेटफ्लिक्स

यह एक महत्वाकांक्षी पिता की कहानी है, जो दलित है. उसने जीवन में जो देखा सहा, उससे बेटे को बचाना चाहता है. अतः वह नन्हें बेटे को सिखा-पढ़ा कर एक जीनयस के तौर पर दुनिया के सामने पेश करता है. लेकिन धीरे-धीरे हालात उसके काबू से बाहर हो जाते हैं. यह फिल्म दलितों की बात एक अलग अंदाज में उठाती है. ऐसा दलित किरदार और कहानी पहले आपने नहीं देखी होगी. निर्देशक सुधीर मिश्रा की इस फिल्म में व्यंग्य है. फिल्म जोसफ मनु के अंग्रेजी में इसी नाम आए उपन्यास पर बनी है. यह फिल्म उनको एंटरटेन करेगी जो अर्थपूर्ण फिल्में देखना पसंद करते हैं. नवाजुद्दीन सिद्दिकी का काम बहुत बढ़िया और चाइल्ड आर्टिस्ट अक्षत दास की अदाकारी भी असर छोड़ती है. दोनों की ट्यनिंग और टाइमिंग अच्छी है. ऐसी फिल्में देख कर लगता है कि हिंदी का सिनेमा सोच के स्तर पर भी आगे बढ़ रहा है.

खाली पीली
कलाकारः ईशान खट्टर, अनन्या पांडे
प्लेटफॉर्मः जी प्लेक्स (टिकट 299 रुपये)

दो-दो फ्लॉप फिल्में कर चुके ईशान खट्टर और अनन्या पांडे निर्देशक मकबूल खान की फिल्म में भी निराश करते हैं. यह कहानी ही अपने समय की नहीं लगती. साथ ही कुछ अतार्किक बातें भी हैं. दस साल का बच्चा अपने पिता से सुनार की दुकान में डकैती डलवाता है और पुलिस आने पर भाग कर मुंबई पहुंचता है. वहां उसे हमउम्र लड़की मिलती है जिसे कहीं से उठा कर कमाठीपुरा लाया गया है. दोस्ती के बाद दोनों बिछड़ते है. बड़े होने पर मिलते हैं. लड़का टैक्सी ड्राइवर है. लड़की कोठे से भागी है. गुंडे दोनों के पीछे हैं. बॉलीवुड का यह बासी लव स्टोरी फार्मूला है. फिल्म पर न निर्देशक की पकड़ है और न ऐक्टरों में दम. इसे देखने के लिए आपको जी प्लेक्स पर अनिवार्य रूप से 299 रुपये चुकाने पड़ेंगे. युवाओं के लिए भी इसमें कोई आकर्षण नहीं है. आप हार्डकोर बॉलीवुड फैन हैं और चालू-मसालेदार-अतार्किक फिल्में आपको एंटरटेन करती हैं तभी इसे देखें.
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