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बॉलीवुड के किस्से: एक गुमनाम फिल्मकार 'किशोर साहू' की कहानी

आजादी से पहले फिल्मकार के रूप में स्थापित हो चुके किशोर साहू को याद रखने वाली आखिरी पीढ़ी की संख्या भी तेजी से कम हो रही है।

आजादी से पहले फिल्मकार के रूप में स्थापित हो चुके किशोर साहू को याद रखने वाली आखिरी पीढ़ी की संख्या भी तेजी से कम हो रही है।

आजादी से पहले फिल्मकार के रूप में स्थापित हो चुके किशोर साहू को याद रखने वाली आखिरी पीढ़ी की संख्या भी तेजी से कम हो रही है।

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नई दिल्ली। उनका नाम लिया जाए तो सिनेमा के शौकीन भी पूछते हैं कौन किशोर साहू। दरअसल आजादी से पहले फिल्मकार के रूप में स्थापित हो चुके किशोर साहू को याद रखने वाली आखिरी पीढ़ी की संख्या भी तेजी से कम हो रही है। हांलाकि साहू उन बिरले फिल्मकारों में थे जिन्होंने साहित्य रचते हुए फिल्में भी बनाई और उन फिल्मों से हिंदी साहित्कारों को भी जोड़ा। ये अलग बात है कि उनकी फिल्मों को याद कर लिया जाता है, लेकिन उनके साहित्यिक योगदान पर चर्चा कभी नहीं हुई।

22 अक्टूबर 1915 को छत्तीसगढ़ के राजननंद गांव में जन्मे किशोर ने स्कूल के ज़माने से ही नाटकों का साथ पकड़ लिया। नाटकों की दुनिया में प्रवेश लेने के बाद उन्हें लगता था कि वे अभिनय करने के लिये ही पैदा हुए थे। नागपुर के मॉरिस कालेज में प्रवेश लेने के बाद साहू नाटकों को इतनी गंभीरता से लेने लगे कि पढ़ाई के बेहद शौक़ीन साहू परीक्षा में पास होने लायक नंबर ही ला पाते थे।

तब तक किशोर साहू की लेखनी मुखर हो कर सामने आने लगी थी। लिखने की प्रेरणा उन्हें घर से ही मिली उनके पिता कन्हैया लाल साहू हिंदी के लेखक थे। स्कूली दिनों से ही किशोर साहू कहानियां लिखने लगे। नागपुर में उहोंने ना सिर्फ नाटकों में अभिनय किया बल्कि नाटक लिखे भी।

किशोर साहू की लेखन की प्रतिभा ने उन्हें फ़िल्मी दुनिया में अपनी जगह मज़बूत करने में बहुत मदद की। कॉलेज से निकलने के बाद उन्होंने नाटक करने का ही फ़ैसला किया। इस बीच सुंदर और प्रभावशाली साहू को उनके दोस्तों ने राय दी कि वो मुंबई जाकर फ़िल्मों में भाग्य आज़माएं। उन्होंने मुंबई का रूख़ किया। दूसरे बहुत से लोगों की तरह साहू को भी काम ढूंढने के लिए कड़ा संघर्ष करना पड़ा।

संघर्ष के दौर ने ही उनकी मुलाक़ात अशोक कुमार से करवायी। साहित्य में रूचि और अभिनय की बारीकियों पर साहू की बेबाक बातों ने अशोक कुमार को काफ़ी प्रभावित किया। अशोक कुमार की सिफ़रिश पर बॉम्बे टाकीज़ के मालिक हिमांशु राय साहू से मिलने पर राजी हो गए और इस मुलाकात के बाद साहू की किस्मत बदल गयी।

हिंमांशु राय ने साहू को अपनी फ़िल्म जीवन प्रभात (1938) में हीरो का रोल दे दिया। साहू की नायिका थीं हिमांशु राय की पत्नी देविका रानी। किशोर साहू की पहली ही फ़िल्म हिट हो गयी।  इस फ़िल्म में साहू ने एक रईस ज़मींदार के बेट का रोल निभाया था। उन्होंने हिरोइन के साथ बाग़ में गाने गाए और शिकार के एक दृश्य में मचान पर चढ़ कर शेर भी मारा। लेकिन  साहू को इस फ़िल्म की सफ़लता ने कहीं से भी उत्तेजित या उत्साहित नहीं किया।

वो कुछ ऐसा करना चाहते थे जिससे उनके अंदर के कलाकार को संतुष्टि मिल सके। लेकिन किसी कलाकार की संतुष्टि के लिये कोई फाइमेंसर अपना पैसा क्यों खर्च करेगा। इस बात का एहसास किशोर साहू को फ़िल्म हिट होने के बाद जल्द ही हो गया। उनके सामने एक ही रास्ता था कि अपनी ख़्वाहिश को पूरा करने के लिये वे खुद ही फ़िल्म बनाएं। मगर उनके हालात ऐसे नहीं थे।

साहू वापस नागपुर लौट गएऔर लेखन में जुटे गए तभी  उनके मुंबई के अनुभवों की ख़बर पाकर उनके दोस्त द्वारका दास डागा उनसे मिलने आ पहुंचे। वो लखपति व्यवसायी थे। मुंबई में उनके भाई का अपना व्यवसाय था। साहू ने डागा को बताया कि अपनी मर्ज़ी की फ़िल्म में काम किए बिना उन्हें संतुष्टि नहीं मिल सकती और ऐसा करने के लिए उन्हें अपनी फ़िल्म कंपनी खोलनी होगी जिसकी हैसियत उनमें नहीं है। डागा फ़िल्म प्रभात देख चुके थे और किशोर साहू की प्रतिभा का पहले से ही अंदाज़ था इसलिए वो साहू के साथ मिल कर फ़िल्म कंपनी खोलने पर राज़ी हो गए।

इस तरह अस्तित्व में आयी इंडिया आर्टिस्ट लिमिटेड नाम की फ़िल्म निर्माण संस्था। इस बैनर की पहली फ़िल्म थी बहुरानी। साहित्य के प्रति गहरा अनुराग रखने वाले साहू ने इस फिल्म के लिए अनूप लाल मंडल के उपन्यास मिमांसा को आधार बनाया। फ़िल्म बहुरानी, अछूत विषय पर अपने समय की बेहद चर्चित और क्रांतिकारी फ़िल्म साबित हुई। इसके बाद साहू ने बॉम्बे टाकीज़ की फ़िल्म पुनर्मिलन में काम किया। यह फ़िल्म भी सफ़ल रही और इस तरह साहू के खाते में लगातार तीसरी सफल फिल्म आयी।

यहीं पर साहू ने अपने अभिनय का एक और रंग प्रस्तुत किया और 'कुंवारा बाप' नाम की वो फ़िल्म बनायी जो आज भी भारत की बेहतरीन हास्य फ़िल्मों में शुमार की जाती है। किशोर साहू ने अपने मित्र और हिंदी के प्रसिद्ध लेखक अमृतलाल नागर से ‘कुंवारा बाप’ के डायलाग लिखवाए और अभिनय भी कराया।

जब किशोर साहू के हास्य अभिनय के चर्चे हो रहे थे तब साहू ने एंग्री मैन का रोल निभाने का फ़ैसला किया। फ़िल्म का नाम था 'राजा'। इस फिल्म से उन्होंने एक और हिंदी साहित्यकार को जोड़ा। भगवती चरण वर्मा के प्रसिद्ध गीत – 'है आज यहां कल वहां चलो' को किशोर साहू ने ‘राजा’  का प्रमुख गीत बनाया।

फिल्मों से जुड़े रहने के साथ साथ किशोर साहू ने लिखना भी जारी रखा और जमकर लिखा। कहानियां, उपन्यास, नाटक, और कविताएं सभी कुछ उन्होंने लिखा। उनकी कहानियों की एक वड़ी विशेषता ये है कि वो जब तक पूरी नही हो जातीं अपना भेद प्रकट नहीं होने देतीं। सादा और दिलचस्प तर्जे बयां, आम बोलचाल की भाषा और मनवीय संवेदना किशोर साहू के लेखन की खासियत है।

लेखक के रूप में उनके तीन कहानी संग्रह टेसू के फूल, छलावा और घोंसला हिंद पॉकेट बुक से प्रकाशित हुए उन्होंने चार उन्यास भी लिखे। उनके नाटकों का संग्रह शादी या ढकोसला है इसके अलावा उनके गद्य गीतों का भी एक संग्रह है। किशोर की लेखन प्रतिभा को देखते हुए अपने समय की सबसे चर्चित फिल्म पत्रिका फिल्म इंडिया के संपादक बाबू राव पटेल ने किशोर साहू को आचार्य किशोर साहू लिखना शुरू किया था।

किशोर साहू ने फिल्मों में हिंदी को हमेशा महत्व दिया, लेकिन जिस छत्तीसगढ़ में वो पैदा हुए और पले बढ़े वहां की भाषा को भी पूरा सम्मान दिया। दिलीप कुमार और कामिनी कौशल अभिनीत 'नदिया के पार' में पहली बार पर्दे पर पात्र छत्तीसगढ़ी बोलते सुनायी पड़े। 'हेलमेट', 'कालीघटा', 'साजन', 'सिंदूर' और 'वीर कुणाल' सहित किशोर साहू ने करीब 22 फिल्मों का निर्देशन किया। प्रथम उप-प्रधानमंत्री तथा गृहमंत्री सरदार बल्ल्भभाई पटेल ने मुंबई में वीर कुणाल को रिलीज़ करते हुए इसे श्रेष्ठ फिल्म घोषित किया था।

साथ ही साहू ने अभिनय पर्दे पर भी अलग अलग शेड प्रस्तुत किए। फिल्म 'गाइड' में उनके सशक्त अभिनय को भला कैसे भूला जा सकता है। आखिरी सालों में किशोर साहू फिल्मी दुनिया में आ रहे बदलावों को लेकर बहुत क्षुब्द रहने लगे थे। वो उस दौर के थे जब मेहनत ईमानदारी और उसूल बड़ी चीज़ हुआ करते थे, लेकिन सत्तर के दश्क में हालात तेजी से बदलने लगे।

किशोर साहू ने अपनी बेटी नयना को लेकर भी फिल्म 'हरे कांच की चूड़ियां' ( 1967) बनाई, लेकिन तब तक उनके समय के फिल्मकार हाशिये पर पहुंचते जा रहे थे। अगस्त 1980 में अपने निधन से पहले तक किशोर साहू एक भव्य फिल्म की योजना पर काम करते रहे लेकिन तब तक समय लिख चुका था दी एंड।

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